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मेडिकल शिक्षा में मोदी सरकार का क्रांतिकारी सुधार, निजी कॉलेजों की उगाही पर लगेगी रोक

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मोदी सरकार सबको गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है और 2014 से लगातार इस दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। हाल ही में सरकार ने लोकसभा में नेशनल मेडिकल कमीशन बिल-2019 पेश किया था, जो लोकसभा में पास हो गया। इस बिल की सबसे बड़ी खासियत ये है कि इससे मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता आने के साथ ही निजी मेडिकल कॉलेजों की उगाही पर रोक लगेगी।

अब काबिल छात्रों को मिलेगा प्रवेश

अभी तक प्राइवेट मेडिकल कॉलेज मैनेजमेंट कोटे की सीटों को एक-एक करोड़ रुपये में अयोग्य छात्रों को बेच देते थे। ये कॉलेज साढ़े चार वर्षीय एमबीबीएस के लिए हर साल करीब 15 से 25 लाख रुपये तक सालाना की फीस वसूलते थे लेकिन अब इस बिल के पास होने के बाद ऐसा नहीं हो पाएगा, क्‍योंकि अब प्राइवेट कॉलेजों की 20 हजार सीटों की फीस सरकार तय करेगी। इससे अब कॉलेज अंधाधुंध फीस नहीं वसूल पाएंगे।

कुल 60 हजार सीटों की फीस तय करेगी सरकार 

देश भर में मेडिकल की करीब 80 हजार सीटें हैं। इनमें आधी सीटें सरकारी कॉलेजों के पास तो आधी निजी मेडिकल कॉलेजों के पास हैं। मगर एनएमसी बिल के कानून बनने पर निजी कॉलेजों के अधीन आने वाली 40 हजार सीटों का 50 प्रतिशत यानी 20 हजार सीटों की फीस सरकार निर्धारित करेगी। इस तरह सरकार के पास 60 हजार सीटों के निर्धारण का अधिकार होगा।

निजी मेडिकल कॉलेजों में भी NEET जरूरी

अब अखिल भारतीय स्तर पर आयोजित NEET (नेशनल एलिजिबिलिटी कम एंट्रेस टेस्ट) पास करने के बाद ही किसी का दाखिला होगा। निजी मेडिकल कॉलेजों में दाखिले के लिए भी नीट देना जरूरी है। सिर्फ डोनेशन के दम पर ही अब डॉक्टर नहीं बन पाएंगे।

नेशनल एक्जिट टेस्ट का प्रावधान

इस विधेयक में परास्नातक (पीजी) मेडिकल पाठ्यक्रमों में प्रवेश और मरीजों का इलाज करने का लाइसेंस हासिल करने के लिए नेशनल एक्जिट टेस्ट (नेक्स्ट) का प्रस्ताव किया गया है। यह कॉमन टेस्ट एमबीबीएस के चौथे वर्ष में होगा। यह परीक्षा विदेशी मेडिकल स्नातकों के लिए स्क्रीनिंग टेस्ट का भी काम करेगी।

केंद्र सरकार बनाएगी एडवाइजरी काउंसिल

केंद्र सरकार एक एडवाइजरी काउंसिल बनाएगी जो मेडिकल शिक्षा और ट्रेनिंग के बारे में राज्यों को अपनी समस्याएं और सुझाव रखने का मौका देगी। ये काउंसिल मेडिकल कमीशन को सुझाव देगी कि मेडिकल शिक्षा को कैसे सुलभ बनाया जाए।

निहित स्वार्थी तत्वों का विरोधी और लोकोन्मुखी विधेयक

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डा. हर्षवर्धन ने कहा कि NMC विधेयक निहित स्वार्थी तत्वों का विरोधी और लोकोन्मुखी है। यह इंस्पेक्टर राज को कम करने में मदद करेगा। इसमें हितों का टकराव रोकने की व्यवस्था की गई है। डाक्टरों के डाटाबेस से शुचिता सुनिश्चित की जा सकेगी।

चिकित्सा क्षेत्र में भ्रष्टाचार पर लगेगी रोक

केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री ने सोमवार को लोकसभा में कहा कि राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग विधेयक-2019 का मकसद चिकित्सा क्षेत्र में भ्रष्टाचार पर रोक लगाना है। इसमें भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) की जगह राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के गठन का प्रावधान है। उन्होंने कहा कि भारतीय चिकित्सा परिषद (एमसीआई) में लंबे समय से भ्रष्टाचार की शिकायतें आ रही थीं। इस मामले में सीबीआई जांच भी हुई। ऐसे में इस संस्था में बदलाव करना जरूरी है। उन्होंने कहा कि विधेयक में राज्यों के अधिकारों का पूरा ख्याल रखा गया है। राज्यों को इसमें संशोधन करने का अधिकार होगा।

मोदी सरकार ने हमेशा लोगों के स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखा है, एक नजर डालते हैं बीते पांच वर्षों में चिकित्सा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार के लिए उठाए गए कदमों पर-

मेडिकल संस्थानों में सीटें बढ़ीं, नए संस्थानों की भी स्थापना
देश के कई हिस्सों में विशेषकर गांवों में जो डॉक्टरों की कमी महसूस की जा रही है उसे दूर करने के लिए सरकार ने मेडिकल की सीटें बढ़ाई हैं। 2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई थी तो मेडिकल में 52 हजार अंडरग्रैजुएट और 30 हजार पोस्ट ग्रैजुएट सीटें थीं। अब देश में 85 हजार से ज्यादा अंडरग्रैजुएट और 46 हजार से ज्यादा पोस्ट ग्रैजुएट सीटें हैं। इसके अलावा देश भर में नए एम्स और आयुर्वेद विज्ञान संस्थान की स्थापना की जा रही है। जाहिर है सरकार के इन प्रयासों का सीधा लाभ युवाओं के साथ ही देश की गरीब जनता और उनके बच्चों को भी मिलेगा।

हर तीन लोकसभा क्षेत्र में एक मेडिकल कॉलेज की योजना

देश में मेडिकल कॉलेजों की बेहद कमी है और दूरदराज के लोगों को इलाज के लिए शहरों में आना पड़ता है। इस समस्या को दूर करने के लिए मोदी सरकार ने देश में हर तीन लोकसभा क्षेत्र में एक मेडिकल कॉलेज और अस्पताल खोलने की घोषणा की है। प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि इन मेडिकल कॉलेजों में जहां स्थानीय बच्चों को पढ़ने का अवसर मिलेगा, वहीं लोगों को भी उन्हीं के क्षेत्र में इलाज की सुविधा मिलेगी।

पाठ्यक्रम के बाद ग्रामीण क्षेत्र में सेवा देना अनिवार्य
ग्रामीण और दुर्गम क्षेत्रों में अच्छे डॉक्टर उपलब्ध हों, इसके लिए केंद्र सरकार के अनुमोदन पर भारतीय चिकित्सा परिषद ने चिकित्सा शिक्षा नियमों में कुछ सुधार किए। अब स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त करने वाले सभी चिकित्सकों को अनिवार्य रूप से दो साल दुर्गम क्षेत्रों में सेवा देनी होगी।

दुर्गम क्षेत्र में सेवा देने वाले चिकित्सकों को मिलेगी वरीयता
भारतीय चिकित्सा परिषद ने चिकित्सा शिक्षा नियमों में बदलाव करके स्‍नातकोत्‍तर डिप्‍लोमा पाठ्यक्रमों में 50 प्रतिशत सीटें सरकारी सेवारत ऐसे चिकित्‍सा अधिकारियों के लिए आरक्षित कर दी हैं, जिन्होंने कम से कम 3 वर्ष की सेवा दुर्गम क्षेत्रों में की हो। वहीं, स्‍नातकोत्‍तर मेडिकल पाठ्यक्रमों में नामांकन कराने के लिए प्रवेश परीक्षा में दुर्गम क्षेत्रों में सेवा के लिए प्रति वर्ष के लिए 10 प्रतिशत अंक का वैटेज दिया जाएगा, जो कि प्रवेश परीक्षा में प्राप्त अंकों का अधिकतम 30 प्रतिशत प्रोत्‍साहन अंक दिया जा सकेगा। इसके अतिरिक्‍त एनएचएम के तहत, ग्रामीण क्षेत्रों में सेवा देने के लिए एमबीबीएस तथा स्‍नातकोत्‍तर डॉक्‍टरों को वित्तीय प्रोत्‍साहन भी दिया जाता है।

जीडीपी का 2.5 फीसदी स्वास्थ्य पर खर्च का लक्ष्य
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के लोगों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए लगातार नीतियों में बदलाव कर रहे हैं। सरकार ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के तहत स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च को 2025 आते-आते जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा है। सभी सरकारी स्‍वास्‍थ्‍य केन्‍द्रों में दवा और निदान मुफ्त निर्बाध रूप में मिले, इसके लिए राष्‍ट्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मिशन नि:शुल्‍क औषध एवं नि:शुल्‍क नैदानिक पहल का कार्यान्‍वयन कर रहा है।

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