Home नरेंद्र मोदी विशेष मोदी-शासन बना भारतीय संस्कृति का उत्थान काल

मोदी-शासन बना भारतीय संस्कृति का उत्थान काल

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पारंपरिक भारतीय जीवन-मूल्य अपनाने से, भजन-कीर्तन करने से मानसिक तनाव अर्थात डिप्रेशन दूर करने में आश्चर्यजनक रूप से सहायता मिलती है।‘

यह बात किसी पार्टी-विशेष, किसी संघ या शाखा अथवा किसी व्यक्ति-विशेष ने नहीं कही है, बल्कि यह निष्कर्ष उस शोध का है, जो अभी हाल ही में ‘जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय’ के ‘सेंटर फॉर स्टडी संस्कृत’ में हुई है। हालांकि किसी भी भारतीय के लिए यह कोई नई बात नहीं है। हां, यह और बात है कि कई बार सर्वविदित सत्यों को भी नए समय, नए परिवर्तनों और नई चुनौतियों के चलते नए सिरे से, नए रूप में कहने की आवश्यकता होती है। इस शोध में, एक बार फिर से यह तथ्य उभरकर सामने है कि भारतीय संस्कार, नैतिक मूल्य, योग और भजन-कीर्तन आदि डिप्रेशन दूर करने में पूरी तरह से सहायक हैं। इस विषय में कोई भी दवा शरीर का उपचार कर सकती है, मन के विकार का नहीं।

ऐसे में इन्हीं मूल्यों की पुनर्स्थापना के लिए मोदी सरकार ने अपने सत्ता में आते ही अनेक प्रयास किए हैं। योग, आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा और पारंपरिक भारतीय नैतिक मूल्यों आदि के महत्त्व को संसार के सामने पुनर्स्थापित करने के लिए मोदी सरकार आरंभ से ही कटिबद्ध रही है।

योग-दिवस से दिया योग को प्रोत्साहन

भारतीय पुरातन चिंतन में योग नियमित जीवनशैली का अभिन्न भाग रहा है। केवल आसन-प्राणायाम तक ही सीमित समझ लिया जाने वाला योग वास्तव में एक संपूर्ण जीवनशैली है। यम, नियम, आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार इसके आधार-स्तंभ हैं। मान भी लिया जाए कि वर्तमान समय में योग को इसके संपूर्ण रूप में अपनाना सब के लिए संभव नहीं है, परंतु यदि इसके कुछ आसन जैसे शवासन, शशांक आसन और प्राणायाम की कुछ विधियां ही, जैसे- शीतली, भ्रामरी, उज्जायी, कपालभाति, लोम-अनुलोम-विलोम आदि को ही अपनी नियमित दिनचर्या में शामिल कर लिया जाए तो तनाव-अवसाद से पूरी तरह से बचाव संभव है। जहां अन्य व्यायाम के माध्यम केवल शारीरिक सौष्ठव पर ही केंद्रित रहते हैं, वहीं योग शरीर को भी लचीला बनाता है और मन को भी।

ध्यान के शाश्वत महत्त्व को भी इस शोध में प्रमुखता से दर्शाया गया है। ओम ध्वनि, शवासन और योगनिद्रा जैसी विधियों द्वारा तीव्र मानसिक तनाव तक में त्वरित लाभ पहुंचाया जा सकता है। इस विषय में यदि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों को देखा जाए तो उन्होंने हमेशा उदाहरण देने की बजाय, स्वयं उदाहरण बनने में विश्वास किया है। योगाभ्यास उनकी नियमित दिनचर्या का भाग है। तीन साल पहले सत्ता में आने के बाद मोदी सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर योग के महत्त्व को रेखांकित करते हुए विश्व का आह्वान किया था, जो अब प्रतिवर्ष नियमित रूप से मनाया जाता है।

प्राकृतिक-चिकित्सा और सात्त्विक जीवनशैली

मोदी सरकार द्वारा आयुर्वेद, प्राकृतिक चिकित्सा को भी हमेशा प्रोत्साहन मिला है। इस दिशा में मोदी सरकार के द्वारा किए गए प्रयासों के अंतर्गत कई ऐसे चिकित्सा-संस्थानों की स्थापना की गई है, जहां प्रत्येक रोग का उपचार देशीय रूप में आयुर्वेदिक पद्धतियों द्वारा, प्राकृतिक उपायों द्वारा किया जाता है। इन उपचारों का लक्ष्य दर्द का उपचार करना नहीं, बल्कि उस रोग के समूल नाश पर केंद्रित होता है। यह अवश्य है कि इस विधि में लगने वाला समय कुछ अधिक होता है, जिसमें धैर्य की बहुत आवश्यकता होती है। आज तो देखने को मिलता है कि भारतीयों की तुलना में विदेशियों का इस चिकित्सा पद्धति पर गहरा विश्वास बन रहा है।  

संयुक्त परिवार संस्कार का पहला आधार

इस शोध में यह भी कहा गया है कि वर्तमान समय में न्यूक्लियर फैमिली के चलते परिवार में एक ही बच्चे के जन्म को प्राथमिकता दी जाती है, जिससे युवाओं में आरंभ से ही तनाव पाया जा रहा है। यहां इस तथ्य को ध्यान में रखा जा सकता है कि भारत में सदैव से संयुक्त परिवार की अवधारणा रही है। सर्वविदित होने के बावजूद इन तथ्यों को वर्तमान परिप्रेक्ष्य में या तो भुला दिया गया या अनदेखा कर दिया गया, जिसके दुष्परिणाम आए दिन चिंता का विषय बने रहते हैं। आज जिन छोटी-छोटी बातों, आदतों और तौर-तरीकों को ‘प्ले स्कूल’ में सिखाया जाता है, संयुक्त परिवार में वे बच्चों को खेलते-कूदते सहज रूप में ही सिखा दिए जाते थे। अनेक रिश्तों के बीच संयुक्त परिवार में पलता बच्चा अनेक नैतिक मूल्यों, संस्कारों के बीच पलता हुआ आत्मकेंद्रित नहीं होता था, बल्कि उसे बांटना और बंटना आता था। परस्पर सहयोग, सहभागिता, सहनशीलता उसके सामान्य गुण होते हैं। आज भी जो बच्चे संयुक्त परिवारों में पलते हैं, अन्य बच्चों की तुलना में वे भावनात्मक रूप से अधिक खुले हुए और टीम-भावना में विश्वास करने वाले होते हैं। अतिथि देवो भव, वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा वाली भारतीय संस्कृति में स्वयं के भोजन में एक रोटी कम आने, मगर घर के भोजन में एक रोटी अधिक बनाने की परंपरा रही है, जो न्यूक्लियर फैमिली में सिरे से गायब है। इन परिवारों में सफलता-असफलता जीवन का एक भाग होते हैं, जीने-मरने का प्रश्न नहीं। जैसा कि आज देखने को मिलता है कि छोटे-छोटे बच्चे तक तनाव का शिकार होकर आत्महत्या जैसे कदम उठा रहे हैं।

भारतीय संस्कृति की ग्रहनशील परंपरा

चाहे भारतीय कलाएं हो, संस्कृति हो या फिर भारतीय समाज, ग्रहनशीलता इसका पहला गुण रही है। इसी लचीलेपन के कारण कितनी संस्कृतियां आईं-गईं, मगर चिर-पुरातन मूल भारतीय संस्कृति ने प्रत्येक संस्कृति के अनेक गुणों को अपने में समाहित करने के बावजूद अपने मूल स्वरूप को बनाए रखा। परस्पर समन्वय द्वारा यहां आई अनेक संस्कृतियां यहीं पर रच-बस गईं। भारतीय संस्कृति में योग और भोग का अद्भुत संगम है। इसके चार आश्रम व्यक्ति को ज्ञान आधारित पुरुषार्थ, सांसारिक भोग और फिर उत्थान और उसके बाद परमार्थ का लक्ष्य देते हैं। मानवीय नैतिकता इसके प्रत्येक भाग का मूल आधार रही है।

संगीत भारतीय संस्कृति के कण-कण में व्याप्त है, चाहे वह पूजा-आराधना हो या सामान्य जनजीवन। इसकी व्यापकता तो इतनी अधिक है कि इस विषय पर पूरा एक वेद- सामवेद ही लिखा गया है। संगीत के द्वारा संभव उपचारों में केवल तनाव तो क्या, मानसिक अस्थिरता तक संभव है।

यदि प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहा जाए तो “कला और संस्कृति का भारतीय समाज में सर्वोच्च स्थान है। इसके अभाव में लोग रोबॉट समान हैं।“

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