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संसदीय कार्यवाही के मामले में यूपीए से बेहतर रहा है मोदी सरकार का प्रदर्शन

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देश के कई महत्वपूर्ण मसलों पर चर्चा होनी जरूरी है, जितनी चर्चा होगी उतना ही देश को फायदा होगा। मैं आशा करता हूं कि सभी राजनीतिक दल सदन के समय का सर्वाधिक उपयोग देश के महत्वपूर्ण कामों को आगे बढ़ाने में करेंगे।” संसद का मॉनसून सत्र शुरू होने से पूर्व प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन्हीं शब्दों के माध्यम से सभी राजनीतिक दलों से विधायी कामकाज को सुचारू रूप से चलाने की अपील की। दरअसल संसद को एक घंटे चलाने का खर्च करीब 1.5 करोड़ रुपया बैठता है यानि हर मिनट की कार्यवाही पर 2.5 लाख रुपया खर्च आता है। इसलिए मोदी सरकार चाहती है कि सदन शांति से चले और लोगों की समस्याओं के समधान के लिए काम करे। इसी इरादे से सरकार 22 दिनों तक चलने वाले इस सत्र में 18 विधेयक पेश करने का लक्ष्य रखा है। 

आपको बता दें कि प्रधानमंत्री के प्रयासों के कारण ही उनका कार्यकाल विधायी कार्यों के मामले में पिछली यूपीए सरकार से अधिक प्रभावशाली रहा है। संसदीय कार्य अवधि के उपयोग के मामले में भी सरकार ने अच्छा काम किया है।

2014, 2015, 2016 और 2017 के बजट सत्र,  2015 का शीतकालीन सत्र,  2016 के मानसून सत्र और 2018 के बजट सत्र के पहले चरण में लोकसभा में 100 प्रतिशत कामकाज हुआ है।

          संसद में मोदी सरकार का शानदार प्रदर्शन
मोदी सरकार में 16वीं लोकसभा में 2018 के बजट सत्र के पहले भाग तक की औसत प्रोडक्टिविटी 91.16 प्रतिशत रही।
मनमोहन सिंह सरकार की 15वीं लोकसभा की प्रोडक्टिविटी महज 61 प्रतिशत रही, जो कि आजादी के बाद अब तक की सबसे कम है।
राज्यसभा में 16वीं लोकसभा के कार्यकाल के दौरान 2018 के बजट सत्र के पहले चरण तक 69.83 प्रतिशत प्रोडक्टिविटी रही।
कांग्रेस के नेतृत्व वाली 15वीं लोकसभा में राज्यसभा की प्रोडक्टिविटी पांच वर्षों के 15 सत्रों में औसतन 62.33 प्रतिशत रही।
प्रश्नकाल की सफलता दर 14वीं लोकसभा में 15% और 15वीं लोकसभा में 12% थी, जबकि 16वीं में 21% दर्ज की गई है।
14वीं लोकसभा में 242 और 15वीं में 243 दिन बैठकें हुई थीं, जबकि 16वीं में बजट सत्र, 2018 तक कुल 287 बैठकें हो चुकी हैं।
16वीं लोकसभा में वर्ष 2017 के शीतकालीन सत्र तक 87.27 की औसत प्रोडक्टिविटी के दर से कार्य हुए।
दोनों सदनों की संयुक्त कार्यवाही का औसत प्रोडक्टिविटी दर (2017 के शीतकालीन सत्र तक) 77.36 प्रतिशत प्रति सत्र रही।

 

बीजेपी-एनडीए सांसदों ने पेश की थी मिसाल

बीते बजट सत्र के बाद बीजेपी और एनडीए के सांसदों ने उन 23 दिनों का वेतन लेने से इनकार कर दिया था जिस दौरान कांग्रेस ने सदन की कार्यवाही बाधित रखी थी। दरअसल विपक्षी दलों की नकारात्मक राजनीति के कारण जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बर्बाद हो रहा है। बीते 04 अप्रैल को राज्यसभा की कार्यवाही एक दिन में ही 11 बार स्थगित करनी पड़ गई थी। इसी से आहत होकर एनडीए सांसदों ने ये फैसला लिया था।

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