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संयुक्त राष्ट्र संघ पर मोदी की कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक

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अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के लिए रिक्त एक स्थान के चुनाव के लिए भारत के दलवीर भंडारी और ब्रिटेन के क्रिस्टोफर केनवुड आमने-सामने हैं। भारत की ओर से मनोनीत किये गए दलवीर भंडारी, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश हैं और भारत उन्हें दोबारा हेग स्थित अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के रूप में चाहता है, लेकिन ब्रिटेन के क्रिस्टोफर केनवुड के सामने आने से आमसभा और सुरक्षा परिषद में इसके लिए होने वाला चुनाव, अधिक दिलचस्प हो गया है। आमसभा में अब तक हुए बारह राउंड के मतदान में दलवीर भंडारी को विश्व के 120 देशों का समर्थन मिल चुका है, जबकि केनवुड को मात्र 70 देशों का ही समर्थन मिल सका है। विश्व समुदाय में भारत को मिल रहे इस जबर्दस्त समर्थन से ब्रिटेन घबरा उठा है। अब वह ऐसा कदम उठाने की सोच रहा है, जो संयुक्त राष्ट्र संघ के 70 साल के इतिहास में किसी न्यायाधीश के चुनाव के लिए नहीं उठाया गया है।संयुक्त राष्ट्र संघ में न्यायाधीश का चुनाव कैसे होता है-संयुक्त राष्ट्र संघ एक ऐसी विश्व संस्था है, जो प्रजातांत्रिक मूल्यों के आधार पर विश्व की समस्याओं का समाधान प्राप्त करने का प्रयास करती है, जिससे शांति और सौहार्द के मार्ग पर चलते हुए विश्व के 6 अरब से अधिक लोगों के जीवनस्तर में सकारात्मक बदलाव लाया जा सके। इस पूरी व्यवस्था को लागू करने के लिए विश्व के लगभग 200 देशों की एक आमसभा और 15 देशों की सुरक्षा परिषद की जिम्मेदारी है। संयुक्त राष्ट्र संघ की आमसभा और सुरक्षा परिषद को मिल-जुलकर काम करना होता है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए किसी भी उम्मीदवार को आम सभा और सुरक्षा परिषद में सबसे अधिक मत प्राप्त करने होते हैं। इस बार भारत ने अपने उम्मीदवार दलवीर भंडारी के लिए विश्व स्तर पर जबर्दस्त समर्थन जुटाया और फाइनल राउड से पहले तक आम सभा में 120 और सुरक्षा परिषद में 5 समर्थन प्राप्त कर लिये, जबकि ब्रिटेन के क्रिस्टोफर केनवुड को आम सभा में 70 और सुरक्षा परिषद में 9 समर्थन मिले हैं।ऐसा क्या हुआ कि विश्व की महाशक्तियां परेशान हैं-प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में जिस तरह भारतीय विदेश कूटनीति ने विश्व-मंच पर राष्ट्रहित को साधने के लिए कदम उठाया है, उसमें अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के लिए दलवीर भंडारी का चुनाव एक अहम कदम है। प्रधानमंत्री मोदी ने वर्ष 2014 में अपने पहले संयुक्त राष्ट्र संघ के भाषण में विश्व समुदाय से अपील की थी कि संयुक्त राष्ट्र संघ में, वर्तमान विश्व परिदृश्य के अनुरूप बदलाव की जरूरत है, लेकिन सुरक्षा परिषद के पांच स्थायी सदस्य- अमेरिका, चीन, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन – बदलाव को तैयार नहीं हैं। ये सभी राष्ट्र संयुक्त राष्ट्र संघ में बदलाव की बात तो करते हैं, लेकिन कोई कदम उठाने से डरते हैं। इन राष्ट्रों का यह डर खुल कर सामने आ गया है।

अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में न्यायाधीश के चुनाव के लिए विश्व की पांच महाशक्तियों को विकासशील देशों के बढ़ते प्रभुत्व से जिस तरह चुनौती मिल रही है, उससे सभी सकते में हैं। यदि फाइनल राउंड के मतदान में भारत के दलवीर भंडारी को आम सभा में दो तिहाई से अधिक मत प्राप्त होता है तो सुरक्षा परिषद उन्हें अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय में जाने से नहीं रोक सकेगा। इस तथ्य को ब्रिटेन के साथ-साथ सुरक्षा परिषद के अन्य स्थायी सदस्य समझ चुके हैं और सुरक्षा परिषद में केनवुड को मिले बहुमत का कोई महत्त्व नहीं रह जाएगा । भारत की इस कूटनीतिक सर्जिकल स्ट्राइक से सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य परेशान हैं, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ के इतिहास में पहली बार होगा, जब सुरक्षा परिषद की मर्जी के खिलाफ किसी व्यक्ति का चुनाव अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय के लिए होगा।प्रजातांत्रिक मूल्य बनाम वर्चस्व का संघर्ष-ब्रिटेन ने इस अप्रत्याशित स्थिति से निपटने के लिए सुरक्षा परिषद के अन्य सदस्यों को सुझाव दिया है कि सुरक्षा परिषद आम सभा में हो रहे मतदान को रोकने के लिए प्रस्ताव पारित कर दे। यदि सुरक्षा परिषद ब्रिटेन के समझाने पर यह प्रस्ताव पारित कर देता है तो आम सभा में बहुमत मिलने के बावजूद भी दलवीर भंडारी अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय नहीं जा सकेंगे, जबकि ब्रिटेन के क्रिस्टोफर केनवुड जिन्हें आम सभा में कम मत मिले हैं, वे न्यायाधीश बन जाएंगे, लेकिन भारत ने इस कूटनीतिक संघर्ष को तार्किक परिणति तक ले जाने का मन बना लिया है। यदि आम सभा में होने वाले फाइनल राउंड के मतदान को सुरक्षा परिषद रोक देता है तो इस घटना से विश्व-मंच पर, सुरक्षा परिषद के सदस्यों का प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का दोहरापन सबके सामने आ जाएगा, जो ब्रिटेन और अन्य स्थायी सदस्यों के लिए नैतिक हार होगी।मोदी की धारदार वैश्विक कूटनीति-अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं में जिस तरह विश्व के कुछ विकसित देश कब्जा जमाकर विकासशील देशों के हितों की अनदेखी कर रहे हैं, उसे बदलने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने धारदार वैश्विक कूटनीति को अपना रखा है। उन्होंने अफ्रीका, दक्षिण पूर्व एशिया और अरब राष्ट्रों के साथ संबंधों को मजबूत किया है और विश्व की महाशक्तियों के साथ बराबरी के सिद्धांत पर रिश्तों को परिभाषित किया है।प्रधानमंत्री मोदी ने उन सभी स्थितियों को बदलने का संकल्प ले रखा है, जो भारत की राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षमता को विकसित होने से रोक रही है। इसके लिए वे किसी भी तरह का निर्णय लेने और उसे क्रियान्वित करने से डरते नहीं हैं। प्रधानमंत्री मोदी का साहस और दूरदर्शिता, उन्हें विश्व के तमाम नेताओं से अलग करती है।

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