Home नरेंद्र मोदी विशेष इनकी आलोचना से ना पीएम मोदी रुकेंगे ना देश रुकेगा

इनकी आलोचना से ना पीएम मोदी रुकेंगे ना देश रुकेगा

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जबसे केंद्र की सत्ता संभाली है, उनके आलोचकों ने निंदा का ऐसा चश्मा पहन रखा है जिसके चलते उन्हें मौजूदा सरकार का एक भी अच्छा कामकाज दिखता ही नहीं है। देश में मोदी सरकार के निंदा राग में लगे कुछ पत्रकार तो हैं ही विदेशी मीडिया में भी लिखने वाले यहां के कुछ पत्रकार हैं  जिनका काम ही है पीएम मोदी और उनकी सरकार की आलोचना में लगे रहना। लेकिन हैरानी तब होती है जब ये बेदम दलीलों के साथ अपनी बातों को रखते हैं।

स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ पर भी निंदा राग

ये वैसे लोग है जो भारत की स्वतंत्रता की 70वीं वर्षगांठ जैसे मौके पर भी रंग में भंग डालने की कोशिश से बाज नहीं आते। 11 अगस्त को न्यूयॉर्क टाइम्स में पंकज मिश्रा का आलेख “India at 70, and the Passing of Another Illusion” को ऐसी ही कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। इस आलेख में ढेर सारी नकारात्मक शब्दावलियों के सहारे वो लगातार दुखड़ा रोते चले गए हैं। पूरा आलेख ‘धार्मिक और जातिगत टकराव’, ‘रंगभेद करने वाले’ हिंदू, ‘प्रतिक्रियावादी सवर्ण हिंदू’, ‘मुसलमानों की लिंचिंग’, ‘प्रेमी जोड़ों या दंपति पर हमले’, ‘महिलाओं को बलात्कार की धमकियां’, ऐसे ही कई नकारात्मकता ली हुई बातों से भरा हुआ है।  

महज आलोचना के चक्कर में निराधार निशाने

पंकज मिश्रा अपने आलेख में निष्कर्ष ये निकालते हैं कि आजादी के बाद गौरवशाली देश बनाने का आइडिया पीएम मोदी के शासन में धराशायी हो चुका है। लेकिन आलेख में जिस तरह के निराधार तथ्यों के साथ बातें रखी गई हैं उनसे यही जाहिर होता है कि इस आलेख का मकसद सिर्फ पीएम मोदी पर निशाना साधने का रहा है। आलेख में पंकज मिश्रा 1948 के हैदराबाद मामले और 1984 के सिख विरोधी दंगों का संदर्भ भी देते हैं। वो लिखते हैं : ‘’1948 में जवाहरलाल नेहरू के प्रधानमंत्री रहते हैदराबाद में 40,000 मुस्लिम मारे गए’’।  सवाल है, जब वो ये मानते हैं कि नेहरू और कांग्रेस के दौर में देश ने दहशत के दौर देखे तो फिर Idea of India के खात्मे के जिम्मेदार पीएम मोदी कैसे हो गए?

 मोदी विरोध के आलेख कहां से प्रभावित?

वैसे मिश्रा ने हैदराबाद मामले को लेकर जो तथ्य दिये हैं वो भी उनके अपने मन से तय किये लगते हैं क्योंकि मामले पर पंडित सुंदरलाल कमेटी की आधिकारिक रिपोर्ट में मारे गए लोगों के धर्म को लेकर कोई उल्लेख नहीं है जबकि मिश्रा ने सबको मुस्लिम करार दिया है।  सवाल है कि पंकज मिश्रा का ये आलेख कहां से प्रभावित हो सकता है? इस सवाल का जवाब हिंदुस्तान टाइम्स में छपे JNU के प्रोफेसर मकरंद परांजपे के विश्लेषण से अच्छी तरह समझा जा सकता है। 

परांजपे लिखते हैं : ‘’पंकज मिश्रा उस दुनिया में जीते हैं जो यथार्थ से परे है। वो नकारात्मक सोच से भरे उन लोगों में से हैं जिन्हें कुछ भी अच्छा नहीं सूझता और वो अपने अलावा और किसी को मानते भी नहीं।‘’

परांजपे ये भी लिखते हैं : ‘’भारत को जानबूझकर खराब रंग में दिखाने वालों को आईना दिखाने की जरूरत है। मिश्रा को तो “general hater-in-chief of anything Indian” की उपाधि से ‘विभूषित’ किया जाना चाहिए। लेकिन चूंकि वो खुद की अज्ञानता की बात भी करते रहे हैं इसलिए भारत की निंदा करने के उनके प्रयास को भी हम उनकी अज्ञानता से ही जोड़कर देखें।‘’

क्या ये कभी सकारात्मक पक्ष भी देखेंगे?

विदेशी मीडिया में छपने वाला इस तरह का आलेख बताता है देश ही नहीं विदेशी समाचार पत्रों में भी लिखने वाले भारतीय पत्रकारों का एक खास समूह काम कर रहा है जिसका काम किसी भी हाल में मोदी विरोध को हवा देते रहना है। सवाल है क्या इन्हें राष्ट्रपति राम नाथ कोविंद की ‘करुणामय समाज’ बनाने का संदेश या फिर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धार्मिक असहनशीलता या नफरत के खिलाफ किया गया आह्वान सुनाई नहीं देता? मोदी सरकार के दौर में भारत की अनगिनत उपलब्धियों के लिए वो एक भी सकारात्मक बात क्यों नहीं करते?

जितना विरोध उतनी ही बढ़ी पीएम मोदी की लोकप्रियता

मोदी सरकार जहां अगले पांच साल में न्यू इंडिया के निर्माण के संकल्प को देशवासियों के साथ मिलकर सिद्ध करने के रास्त पर चल पड़ी है, वहीं भारतीय मीडिया के भी कुछ ऐसे चेहरे हैं जो हमेशा विकास की गाड़ी पर ब्रेक लगाने के अवसर तलाशते रहते हैं। शेखर गुप्ता, राजदीप सरदेसाई, सागरिका घोष और पुण्य प्रसून वाजपेयी से लेकर राणा अय्यूब और सबा नकवी जैसे कई चेहरों को जनता ने भी मोदी विरोध के एजेंडे पर काम करने वाले पत्रकारों के रूप में पहचान लिया है। एकतरफा और हमेशा निगेटिव रंग में पेश आने वाले इन पत्रकारों की बौखलाहट इस बात को लेकर लगातार बढ़ती जा रही है कि इनकी हर जोर-आजमाइश  के बावजूद पीएम मोदी और उनकी सरकार की लोकप्रियता का ग्राफ लगातार ऊपर की ओर ही जा रहा है।    

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