Home चुनावी हलचल सोनिया-ममता की दोस्ती आखिर मुश्किल क्यों है ?

सोनिया-ममता की दोस्ती आखिर मुश्किल क्यों है ?

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पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का सियासी चरित्र धोखेबाजी से भरा रहा है। अपने पूरे सियासी करियर में वो कभी भी, किसी भी पार्टी की भरोसेमंद साथी नहीं रही हैं। मोदी विरोध में अंधराये हुए कुछ नेता राष्ट्रपति चुनाव के बहाने सियासत में पिटे हुए खिलाड़ियों को एकजुट करने में लगे हैं। इसी कोशिश में वो कांग्रेस-वामपंथियों और ममता बनर्जी को भी एक ही मंच पर लाने की सियासी चालें चल रहे हैं। लेकिन टीएमसी की दीदी का सियासी इतिहास बताता है कि वो तभी किसी गठबंधन का हिस्सा बनने के लिए तैयार होंगी, जब उनकी राजनीतिक महत्वकांक्षाओं की पूर्ति होने की उम्मीद रहे। सबसे बड़ा सवाल है कि जिस गठबंधन की सोच ही अवसरवादिता पर टिकी है, उसमें ममता जैसी अवसरवादी, महत्वाकांक्षी और अहंकारी नेता अपने को कहां फिट कर पाएंगी ? अगर हम कांग्रेस के साथ उनके रिश्तों को गहराई से देखें तो सारा माजरा समझ में आ जाएगा।

सोनिया-ममता में स्वार्थ का टकराव
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नोटबंदी के फैसले ने ममता बनर्जी को निजी तौर पर तिलमिला दिया। उन्होंने नोटबंदी के विरोध में ऐसे तेवर दिखाने शुरू किए मानो लगा कि इससे उन्हें निजी तौर पर बहुत ही बड़ी हानि हुई है। हालांकि नोटबंदी का विरोधी बाकी विपक्षी दल भी कर रहे थे, लेकिन ममता का विरोध कुछ अधिक ही मुखर था। इस मुद्दे पर कांग्रेस ने विपक्षी दलों की एक बैठक बुलाई, जिसमें कई प्रमुख विपक्षी नेता नहीं पहुंचे, लेकिन दीदी कोलकाता से भागी-भागी दिल्ली पहुंच गईं। उन्होंने कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी के साथ प्रेस कांफ्रेंस भी की। लेकिन ये दोस्ती टिकाऊ नहीं थी। ममता ने नोटबंदी के खिलाफ देशभर में रैलियों का सिलसिला शुरू किया, तो कांग्रेस उसमें शामिल नहीं हुई। कांग्रेस को लगा कि उनका साथ दिया तो वो मोदी विरोध की धुरी बन जाएंगी और राहुल गांधी तो उनके पीछे-पीछे घुमते रह जाएंगे। वहीं ममता उम्मीद पाले रहीं कि इन रैलियों के चलते उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर उभरने का मौका मिल जाएगा, लेकिन हुआ उल्टा, उनका विरोध टायं-टायं फिस्स हो गया।

ममता-कांग्रेस में 36 का आंकड़ा!

ममता बनर्जी ने अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा की सिद्धि के लिए ही कांग्रेस छोड़कर तृणमूल कांग्रेस बनाई थी। अगर वो ऐसा नहीं करतीं तो शायद कांग्रेस में रहकर वो आज जहां हैं वहां तक पहुंच भी नहीं पातीं। वो अपनी राजनीति को चलाते रहने के लिए ही मां, माटी, मानुष जैसे मर्मस्पर्शी नारों का सहारा लेती हैं। लेकिन वास्तविकता ये है कि वो अपने आप को एक ऐसी राजनीतिक शक्ति के रूप में उभारना चाहती हैं, जिसका केंद्र की सत्ता पर दबदबा रहे। उनकी ये महत्वाकांक्षा तभी से साफ दिखाई देने लगी जब 2011 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में उन्हें अच्छी सफलता मिली। कुछ समय बाद उन्होंने केंद्र की यूपीए-2 की सरकार को चुनौती देना शुरू कर दिया। उन्होंने किसी न किसी बहाने मनमोहन सरकार को परेशान करना शुरू कर दिया। एनसीटीसी के मामले पर यूपीए सरकार पर सबसे अधिक हमला उन्होंने ही किया। लेकिन इसके पीछे की असलियत कांग्रेस की ओर से मुसलमानों को 27 प्रतिशत के कोटे से आरक्षण दिए जाने के बारे में आए कुछ बयान थे। उन्हें लगा कि इसका सारा लाभ कांग्रेस अकेले उठाना चाहती है। इसी बहाने वो तब कांग्रेस के राष्ट्रपति उम्मीदवार के विरोध करने का रास्ता ढूंढती भी नजर आ रही थीं। 

मनमोहन सरकार को दिया था धोखा
21 सितम्बर 2012 को यूपीए-2 की सरकार से समर्थन वापस लेकर तृणमूल कांग्रेस ने मनमोहन सरकार को अस्थिर कर दिया था। उस समय 19 सांसदों वाली टीएमसी सरकार की सबसे बड़ी सहयोगी दल थी। समर्थन वापसी का बहाना खुदरा व्यापार में 100 प्रतिशत विदेशी निवेश, डीजल के दाम में वृद्धि और गैस सिलिंडर की संख्या छह तक सीमित करने के यूपीए सरकार के निर्णय का विरोध बताया गया था। लेकिन इसके पीछे सिर्फ और सिर्फ ममता की राजनीतिक मंशा थी। वो कांग्रेस और लेफ्ट से बराबर दूरी रखकर आने वाले 2014 के आम चुनाव में अपनी शक्ति बढ़ाकर केंद्र की सत्ता पर वर्चस्व कायम करना चाहती थीं। उनकी सोच थी कि अगर आम चुनाव के बाद एक बार फिर से यूपीए की तरह कमजोर सरकार बनने की नौबत आई तो उनके लिए फायदे का सौदा रहेगा। लेकिन उनकी चाल उल्टी पड़ गई। देश की जनता ने नरेंद्र मोदी को प्रचंड बहुमत देकर यूपीए के 10 साल की भ्रष्ट सरकार से मुक्ति दिला दी और दीदी की दाल नहीं गल पाई।

जब ममता के विरोध में लेफ्ट-कांग्रेस का हुआ गठबंधन
2016 के विधानसभा चुनाव आते-आते पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हवा पूरी तरह बदल चुकी थी। हवाई चप्पल पहनकर ईमानदारी का ढोंग करने वाली ममता बनर्जी की सरकार और उसके नेता शारदा, रोज वैली और नारदा स्टिंग जैसे महाघोटाले में फंस चुके थे। अबकी बार उन्हें सियासी धूल चटाने के लिए सभी विचारधाराओं को ताक पर रखकर लेफ्ट और कांग्रेस ने मधुर-मिलन कर लिया था। इस गठबंधन ने स्वभाव से गुस्सैल दीदी का सियासी पारा और चढ़ा दिया। उन्होंने, 11 फरवरी 2016 को कांग्रेस और लेफ्ट के गठबंधन पर प्रहार करते हुए कहा, “सीपीएम और कांग्रेस गठबंधन करके बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं, यदि भाजपा उन्हें समर्थन दे रही है तब भी वे गलती कर रहे हैं। आप अपनी शर्ट हर रोज बदल सकते हैं लेकिन अपनी विचारधारा हर रोज नहीं बदल सकते हैं। वे गठबंधन करने के लिए अपनी विचारधारा का बलिदान कर रहे हैं।”

जब सोनिया ने किया ममता पर प्रहार
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के दौरान ममता-सोनिया में सियासी कटुता चरम पर पहुंच गई थी। कांग्रेस अध्यक्ष ने राज्य सरकार को तानाशाह की सरकार कहकर हमला किया। उन्होंने रैलियों में ममता की भ्रष्ट और तानाशाह सरकार को उखाड़ फेंकने की अपील की और उनपर जनता से धोखेबाजी का आरोप लगाया।


देश के लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सकारात्मक राजनीति का ही परिणाम है कि नकारात्मक राजनीति करने वाले सभी अवसरवादियों को एक मंच पर लाने की सोच पैदा हो रही है। भ्रष्टाचार के खिलाफ हो रहे एक से एक बड़े एक्शन के बाद भ्रष्ट नेताओं में खलबली मची हुई है। लेकिन इन सबके बावजूद क्या एक-दूसरे के कट्टर सियासी दुश्मन दोस्ती के लिए तैयार हो जाएंगे ये बहुत बड़ा सवाल है। यदि ऐसा हो जाता है तो राजनीति के विद्यार्थियों और शोधार्थियों के लिए सियासत की इस नवीन गंदगी पर रिसर्च करना और भी दिलचस्प होगा।

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