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गिरगिट की तरह रंग बदलती हैं ममता बनर्जी, जानिये घुसपैठ के साइ़ड इफेक्ट्स

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”ममता बनर्जी आश्वासन देती रही हैं कि जिन्हें असम से बाहर निकाला जाएगा उन्हें वह शरण देंगी, लेकिन उन्होंने बंगाल-असम की सीमा को सील कर दिया है ताकि कोई बंगाल में न आ सके।”

पश्चिम बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी का ये बयान ममता बनर्जी के दोहरे चरित्र की पोल खोलता है। दरअसल बांग्लादेशी घुसपैठियों के मुद्दे पर ममता बनर्जी ने हमेशा ही दोहरा रवैया अपनाया है। राजनीति के लाभ-हानि को देखते हुए वे समय के साथ अपना स्टैंड भी बदलती रही हैं।

2005 में लोकसभा में स्थगन प्रस्ताव लाकर अवैध आप्रवासियों के खिलाफ चेतावनी दे रही थीं। तब उन्होंने ये भी कहा था कि इसके भारत के लिए बेहद खतरनाक नतीजे होंगे अगर उन्हें निकाला नहीं जाएगा। जाहिर है वह गिरगिट की तरह रंग बदलते हुए अब घुसपैठियों के साथ खड़ी होने का दावा कर रही हैं।

पूरे देश को गृह युद्ध की आग में झोंक देने का दावा करने वाली ममता ने असम में सांप्रदायिक आधार पर आग लगाने की भी कोशिश की। धारा 144 लागू होने के बावजूद उनके छह सांसद सिलचर पहुंच गए। उनकी मंशा थी कि वहां वह NRC के तहत अवैध नागरिक घोषित किए गए बंगालियों को भड़का सकें।

बहरहाल ममता बनर्जी का अभियान जारी है और उनकी पार्टी लोगों को भड़काने में लगी है, लेकिन आइये हम नजर डालते हैं इन बांग्लादेशी घुसपैठियों की बढ़ती तादाद के साइट इफेक्ट्स पर।

पश्चिम बंगाल के 8000 गांवों में एक भी हिंदू नहीं
पश्चिम बंगाल के 38,000 गांवों में 8000 गांव ऐसे हैं जहां एक भी हिन्दू नहीं रहता। या तो उन्हें वहां से भगा दिया गया है या फिर उनका धर्म परिवर्तन करवा दिया गया है। बंगाल के तीन जिले जहां पर मुस्लिमों की जनसंख्या बहुमत में हैं, वे जिले हैं मुर्शिदाबाद जहां 47 लाख मुस्लिम और 23 लाख हिन्दू, मालदा 20 लाख मुस्लिम और 19 लाख हिन्दू, और उत्तरी दिनाजपुर 15 लाख मुस्लिम और 14 लाख हिन्दू। दरअसल बंगलादेश से आए घुसपैठिए प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के मुसलमानों से हाथ मिलाकर गांवों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं और हिन्दू डर के मारे अपना घर-बार छोड़कर शहरों में आकर बस रहे हैं।

बंगाल में लगातार बढ़ती जा रही मुस्लिम आबादी
पश्चिम बंगाल में 1951 की जनसंख्या के हिसाब से 2011 में हिंदुओं की जनसंख्या में भारी कमी आई है। 2011 की जनगणना ने खतरनाक जनसंख्यिकीय तथ्यों को उजागर किया है। जब अखिल स्तर पर भारत की हिन्दू आबादी 0.7 प्रतिशत कम हुई है तो वहीं सिर्फ बंगाल में ही हिन्दुओं की आबादी में 1.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है, जो कि बहुत ज्यादा है। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की आबादी में 0.8 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जबकि सिर्फ बंगाल में मुसलमानों की आबादी 1.77 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो राष्ट्रीय स्तर से भी कहीं दुगनी दर से बढ़ी है। प्रदेश में हिंदुओं की आबादी 2001 में 75 प्रतिशत थी, जो 2011 में 70 प्रतिशत हो गई, और आज 2018 में हिंदुओं की आबादी 68 प्रतिशत ही है।

बंगाल में उठने लगी मुगलिस्तान की मांग
कश्मीर के बाद पश्चिम बंगाल में अब गृहयुद्ध होने की आशंका होने लगी है। बड़े पैमाने पर हिंदुओं का कत्लेआम होगा और मुगलिस्तान की मांग की जाएगी। क्योंकि 2013 से पहली बार बंगाल के कुछ कट्टरपंथी मौलानाओं ने अलग ‘मुगलिस्तान’ की मांग शुरू कर दी है। इसकी पृष्ठभूमि भी तैयार होती जा रही है। वर्ष 2017 में हुए दंगों में सैकड़ों हिंदुओं के घर और दुकानें लूट लिए गए और कई मंदिरों को भी तोड़ दिया गया। इन दंगों में सरकार द्वारा पुलिस को आदेश दिये गए कि वो दंगाइयों के खिलाफ कुछ ना करें।

हिंदू बहुल राज्य असम में बिगड़ा आबादी का समीकरण
असम कभी 100 प्रतिशत हिन्दू बहुल राज्य हुआ करता था।  लेकिन 1971 में बांग्लादेश के निर्माण के बाद यहां मुस्लिम जनसंख्या में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है। असम में मुस्लिम आबादी 2001 में 30.9 प्रतिशत थी जबकि 2011 में बढ़कर वह 34.2 प्रतिशत हो गई।

घुसपैठियों से असम के पर्यावरण को नुकसान
असम में फिलहाल 33 प्रतिशत वन क्षेत्र हैं, लेकिन 1971 की तुलना में यह 42 प्रतिशत था। जाहिर है बांग्लादेशी घुसपैठियों के अवैध अतिक्रमण ने हमारे पर्यावरण को भी नुकसान पहुंचाया है। दरअसल उन्हें बसने के लिए जमीन चाहिए इसके लिए वनों की अंधाधुंध कटाई की गई है।

बिहार में भी बदल रहा आबादी का समीकरण
बिहार के चार जिले किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार में 40 प्रतिशत मुस्लिम हैं लेकिन इनका असर 80 सीटों पर पर है। किशनगंज में 68 प्रतिशत, कटिहार में 43 प्रतिशत, अररिया में 41 प्रतिशत और पूर्णिया में 37 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है और इनमें अधिकतर बांग्लादेशी घुसपैठिये हैं। 

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