Home पश्चिम बंगाल विशेष लोकतांत्रिक मूल्यों को तार-तार कर रहा ममता बनर्जी का राजनीतिक व्यवहार

लोकतांत्रिक मूल्यों को तार-तार कर रहा ममता बनर्जी का राजनीतिक व्यवहार

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कुमारस्वामी के शपथ ग्रहण समारोह के दौरान एक ऐसा वाकया हुआ जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज को शर्मसार करने वाला है। दरअसल पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी ने कर्नाटक की पहली महिला डीजी-आईजीपी को सार्वजनिक तौर अपमानित किया।

आप इस वीडियो में साफ देख सकते हैं कि किस तरह ममता बनर्जी ने नीलमणि राजू को सरेआम फटकार लगाई।

एचडी देवगौड़ा का ममता बनर्जी ने किया अपमान
ममता बनर्जी यहीं नहीं रुकती हैं उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा को भी सार्वजनिक तौर पर डांट लगा दी। वे हाथ जोड़े ममता के सामने खड़े रहे। ममता बनर्जी 90 साल के देवेगौडा को सुनाती रहीं और वे दोनों हाथ जोड़कर खड़े रहे… देवगौड़ा बड़ी शालीनता से ममता बनर्जी को झुक कर कुछ समझाने की कोशिश करते रहे, लेकिन ममता बेहद आक्रामक अंदाज में उन्हें भला-बुरा कहती रहीं।

बहरहाल जब यह पता लगाया गया कि ममता को आखिर हुआ क्या था? वह किस बात से खफा थीं?… तो पता चला कि सीएम महोदया को मंच तक पहुंचने के लिए कुछ दूरी तक पैदल चलना पड़ा, जो उन्हें बिल्कुल पसंद नहीं आया।

ममता के आदेश से नीलमणि राजू के ट्रांसफर के निर्देश!
कर्नाटक में हुए इस वाकये से यह बात साफ है अगर आप लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था में हैं, इसका मतलब यह नहीं है कि आपके विचार भी लोकतांत्रिक हैं। ममता ने थोड़ी दूर पैदल चलने पर एक अधिकारी का अपमान ही नहीं किया बल्कि ऐसी खबरें हैं कि उनका तबादला भी करवा दिया। खबर है कि कुमारस्वामी ने नीलमणि राजू के ट्रांसफर करने के निर्देश दे दिये हैं।
अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये इतनी बड़ी गलती थी कि उन्होंने सार्वजनिक जीवन की सारी मर्यादा तोड़ दी। जाहिर है ममता बनर्जी ने एक ब्यूरोक्रेट को ही अपमानित नहीं किया, बल्कि पूरी लोकतांत्रिक व्यवस्था को ही शर्मसार किया है।

ममता मिटाना चाहती है विपक्षी दलों का नामो निशान
बीते कई वर्षों से ऐसा साफ नजर आ रहा है कि ममता बनर्जी ने राज्य में विपक्ष को खत्म करने की योजना बना रखी है। उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस के गुंडे कई सालों से सीपीएम और बीजेपी के कार्यकर्ताओं के पीछे पड़े हुए हैं। यहां तक कि उनकी हत्या करवा रहे हैं। पंचायत चुनाव में जो कुछ हुआ वह सबके सामने है। एक महिला को ममता की पार्टी के गुंडों ने निर्वस्त्र तक कर दिया। मतदान केंद्र पर जाने से उन्हें रोका गया। बूथों पर कब्जा कर लिया गया। क्या यह सब राज्य की मुखिया की इजाज़त के बिना हो सकता है?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपनी हनक और सनक के लिए कुख्यात हैं। ममता बनर्जी सरकार को अपनी निजी कंपनी की तरह चलाती है। हाल ही में उन्होंने एक ऐसा आदेश दिया है, जो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार ममता बनर्जी सरकार ने राज्य के सभी सरकारी विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थाओं के प्रोफेसरों और शिक्षकों को आदेश जारी किया है कि वे सरकार की आलोचना नहीं करें, और इसके बारे में मीडिया से भी बात नहीं करें।

ममता बनर्जी सरकार के इस आदेश से शैक्षणिक जगत से जुड़े लोग बेहद गुस्से में हैं। ममता बनर्जी ने शिक्षकों को अपने नाम से सरकारी विरोधी लेख लिखने से प्रतिबंधित तो किया ही है, साथ ही किसी और के नाम से भी लिखने पर पाबंदी लगाई है। इसी आदेश में ममता सरकार ने दूसरे कर्मचारियों पर सच्चाई सामने लाने से भी मना किया है। यानी शिक्षण संस्थाओं से जुड़े कर्मचारियों को किसी घपले-घोटाले के बारे में मीडिया को बताने से भी रोका गया है। ममता बनर्जी का यह तुगलकी फरमान उनकी तानाशाही को दिखा रहा है। जाहिर है ममता बनर्जी ने इस आदेश के माध्यम से ना सिर्फ लोगों को अपनी राय प्रकट करने से रोका है, बल्कि सच्चाई को उजागर करने से रोका है।

मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की तानाशाही का यह कोई पहला वाकया नहाीं है, इससे पहले भी राज्य में अपनी मनमानी करती आई है। हमेशा मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदू विरोध की राजनीति करने वाली ममता बनर्जी को अपनी बुराई और आलोचना कतई बर्दाश्त नहीं है। ममता ने अपने खिलाफ उठने वाली हर आवाज को चुप कराने का काम किया है। एक नजर डालते हैं ममता बनर्जी किस तरह सत्ता का दुरुपयोग कर रही हैं।

हिंदुओं की धार्मिक आजादी पर बैन 
पश्चिम बंगाल में एक हिंदू त्योहार बिना हिंसा, बिना दंगा, बिना हमले के नहीं मना सकते। सरस्वती पूजा, होली,  दीपावली,  रामनवमी, हनुमान जयंती, जन्माष्टमी हो या फिर बंगाल के ही परंपरागत पर्व ही क्यों न हो… ममता राज में इन पर्वों पर एक तरह से अघोषित बैन है। हिंदुओं को पूजा-पाठ तक के लिए कोर्ट के दरवाजे खटखटाने पड़ते हैं वहीं अपनी परंपरा को निभाने में सरकारी डंडे खाने पड़ते हैं।

मुसलमानों को दामाद बनाने की नीति
हिंदुओं को अपनी ही धरती पर ही अपने धार्मिक रीति रिवाजों के लिए प्रशासन से परमिशन की जरूरत है, वहीं मुसलमानों को पश्चिम बंगाल में दामाद बनाकर रखा गया है। उनकी धार्मिक ‘आजादी’ पर किसी भी तरह की पाबंदी नहीं है चाहे वह खुलेआम हथियारों का भी प्रदर्शन क्यों न करें। आलम यह है कि हिंदुओं के मंदिर बोर्ड का चेयरमैन तक मुसलमानों को बनाया जा रहा है। मुसलमान लगातार हिंसा कर रहे हैं, लेकिन प्रशासन भी उनके साथ खड़ा है।

दंगे रोकने में विफल ममता बनर्जी   
आंकड़े बताते हैं कि पश्चिम बंगाल में हर आठ दिन में एक दंगा होता है। राज्य के सीमावर्ती इलाकों में जहां हिंदू आबादी कम हो गई है उन्हें हर रोज निशाना बनाया जा रहा है, लेकिन ममता सरकार ने जैसे हिंदुओं से मुंह मोड़ लिया है। बेगुनाहों पर हमले हो रहे हैं, लोगों के घर जलाए जा रहे हैं, हजारों लोग बेघर हो गए हैं लेकिन क्या मजाल कि कोई ममता के सेक्युलरिज्म पर सवाल उठा सके।

बंगाल से हिंदुओं को भगाने की रणनीति
ये जानकर किसी को भी हैरत होगी कि राज्य के करीब 38 हजार गांवों में से 8000 ऐसे गांव हैं जहां एक भी हिंदू नहीं रहता। दरअसल बंगलादेश से आए घुसपैठिए प्रदेश के सीमावर्ती जिलों के मुसलमानों से हाथ मिलाकर गांवों से हिन्दुओं को भगा रहे हैं और हिन्दू डर के मारे अपना घर-बार छोड़कर शहरों में आकर बस रहे हैं।

बंगाल में बिगड़ा आबादी का संतुलन
पश्चिम बंगाल में 1951 की जनसंख्या के हिसाब से 2011 में हिंदुओं की जनसंख्या में भारी कमी आई है। 2011 की जनगणना के अनुसार भारत की हिन्दू आबादी 0.7 प्रतिशत कम हुई है तो वहीं सिर्फ बंगाल में ही हिन्दुओं की आबादी में 1.94 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। राष्ट्रीय स्तर पर मुसलमानों की आबादी में 0.8 प्रतिशत बढ़ गई है, जबकि सिर्फ बंगाल में मुसलमानों की आबादी 1.77 प्रतिशत की दर से बढ़ी है, जो राष्ट्रीय स्तर से दुगनी दर से बढ़ी है।

वंदे मातरम पर प्रतिबंध 
बंकिंम चंद्र चटर्जी ने वन्दे मातरम गीत लिखा तो उन्हें कभी यह अंदेशा नहीं रहा होगा कि उनके ही प्रदेश में इसपर पाबंदी लग जाएगी। लेकिन यह हमारा दावा है कि आप बंगाल के बहुतेरे इलाकों में वंदे मातरम गुनगुना भी देंगे तो आपका सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा। ये ममता का सेक्युरिज्म का मॉडल है जहां आप अपना राष्ट्र गीत तक नहीं गा सकते हैं।

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