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विपक्षी एकजुटता की कांग्रेसी मुहिम को झटका, राहुल का नेतृत्व स्वीकार करने से ममता का इनकार

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अगले वर्ष होने वाले लोकसभा चुनाव से पहले कांग्रेस पार्टी समूचे विपक्ष को एकजुट करने की कवायद में जुटी है, लेकिन राहुल गांधी की अनुभवहीनता और विपक्षी नेताओं के बीच गैरस्वीकार्यता इसमें आड़े आ रही है। तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने साफ कह दिया है कि उन्हें किसी भी सूरत में राहुल गांधी का नेतृत्व स्वीकार नहीं हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार एक निजी टीवी चैनल के कार्यक्रम में ममता बनर्जी ने कहा कि वह राहुल की अगुवाई में काम नहीं कर सकती हैं। उन्होंने कहा कि वह बीजेपी के खिलाफ एक फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिश में जुटी हैं, इस फ्रंट में कोई भी दल छोटा या बड़ा नहीं होगा, बल्कि सभी की बराबर भागीदारी होगी।

महाभियोग का नोटिस कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती
ममता बनर्जी कांग्रेस के खिलाफ काफी हमलावर नजर आईं। उन्होंने कहा कि देश कांग्रेस या फिर किसी और पार्टी की जमींदारी नहीं है। ममता ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के खिलाफ महाभियोग के नोटिस के लिए भी कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की अलोचना की। उन्होंने कहा कि महाभियोग का नोटिस कांग्रेस की सबसे बड़ी गलती है, न्यायिक व्यवस्था के खिलाफ आवाज उठाना गलत है।

यह सिर्फ ममता बनर्जी की ही बात नहीं, शरद यादव, नवीन पटनायक, वाम दलों के नेता, मायावती जैसे नेता भी राहुल की अगुवाई में कोई मोर्चा बनाने को तैयार नहीं दिख रहे हैं। एक नजर डालते हैं पूर्व में किस तरह ये नेता राहुल के नेतृत्व से किनारा कर चुके हैं। यह बताते हैं अखिर इन्हें राहुल का नेतृत्व स्वीकार क्यों नहीं है।

विपक्ष के एकजुट होने में संदेश 
जैसे-जैसे 2019 के आमचुनाव की समय नजदीक आता जा रहा है, विपक्ष को एकजुट करने की कोशिशें भी तेज होती जा रही है। सवाल यह उठता है कि क्या वास्तव में विपक्ष एकजुट है? विपक्ष में कांग्रेस और लेफ्ट को छोड़ दें तो बाकी सभी क्षेत्रीय पार्टियां हैं, जिनकी पहुंच सिर्फ अपने राज्यों में ही है। इन सभी दलों के अपने मकसद हैं और अपने लक्ष्य। बीजेपी के बढ़ते प्रभाव से घबराकर ये पार्टियां मजबूरी में एक साथ आना चाहती हैं, सच्चाई यह है कि इनमें से कई दल एक दूसरे के खिलाफ भी चुनाव लड़ते रहे हैं।

राहुल की अगुवाई में विपक्षी क्षत्रपों का जुटना मुश्किल
यूपीए सरकार के कार्यकाल में सोनिया गांधी कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष थीं और यूपीए की चेयरपर्सन भी। सोनिया के नेतृत्व में विपक्षी दलों के एक साथ आने में नेताओं का स्वाभिमान आड़े नहीं आता था, क्योंकि एक-दो को छोड़कर ज्यादातर विपक्षी नेता उनसे उम्र और अनुभव में छोटे थे। जब से राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बने हैं, विपक्षी दलों के कद्दावार नेताओं को राहुल की अगुवाई में एक साथ आने में दिक्कत हो रही है। जाहिर है राहुल को कोई प्रशासनिक अनुभव नहीं है, न ही देश के अहम मुद्दों पर उनकी कोई स्पष्ट राय है। अपने बयानों से मजाक का पात्र बनने वाले राहुल गांधी के नीचे काम करना इन नेताओं को मंजूर नहीं है। यही वजह है कि समय-समय पर सोनिया गांधी विपक्षी नेताओं की बैठकों को बुलाती रही हैं। विपक्षी नेताओं के सामने मुश्किल है कि सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी होने के नाते उन्हें कभी न कभी राहुल के साथ करना पड़ेगा और इसके लिए वो तैयार नहीं है।

विपक्ष की अगुवाई को लेकर मची है मार
विपक्षी दलों के नेताओं के बीच यह भी एक बड़ा सवाल है कि उनकी अगुवाई कौन करेगा? राहुल गांधी अगुवाई इन्हें स्वीकार नहीं, सोनिया गांधी सक्रिय राजनीति से सन्यास ले चुकी हैं, ऐसे में विपक्षी दलों के नेताओं के सामने नेतृत्व का धर्मसंकट पैदा हो गया है। कुछ दिनों पहले टीएमसी के नेताओं ने कहा था कि विपक्ष की अगुवाई वही नेता करे, जिसे प्रशासनिक अनुभव हो और वरिष्ठ भी हो। यानी उनका मतलब साफ था कि राहुल गांधी तो कम से कम विपक्ष की अगुवाई के लिए काबिल नहीं है। शरद पवार, ममता बनर्जी, सीताराम येचुरी, नवीन पटनायक, चंद्रशेखर राव सरीखे नेता दशकों से राजनीति में हैं, इनकी अपने-अपने राज्यों में जनता पर पकड़ भी है, लेकिन एक दूसरे के तहत काम करने को कोई राजी नहीं है। मतलब साफ है कि विपक्ष में नेतृत्व कौन करेगा इसका जवाब किसी के पास नहीं है।

ममता की फेडरल फ्रंट की कवायद बनी विपक्षी एकता की कोढ़ में खाज
बीजेपी विरोधी फ्रंट बनाने की कोशिशों के बीच कई विपक्षी पार्टियां ऐसी हैं जो फेडरल फ्रंट की संभावनाएं भी तलाश रही हैं। फेडरल फ्रंट बनाने में वो ही पार्टियां दिलचस्पी दिखा रही हैं, जो बीजेपी को अपना दुश्मन मानती हैं और कांग्रेस के बैनर तले आना नहीं चाहती हैं। टीएमसी अध्यक्ष ममता बनर्जी फेडरल फ्रंट बनाने की कोशिशों में सबसे आगे हैं। जाहिर है कि कई राज्यों में कांग्रेस ही क्षेत्रीय दलों की मुख्य प्रतिद्वंदी है। यानी केंद्र की राजनीति के लिए लिए बीजेपी का विरोध और राज्य की सियासत के लिए कांग्रेस का विरोध इनके लिए जरूरी है। एनसीपी के शरद यादव, टीएमसी की ममता बनर्जी और टीआरएस के नेता चंद्रशेकर राव फेडरल फ्रंट बनाने में जुटे हैं। इसके लिए एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी से मिल चुके हैं, वहीं चंद्रशेखर राव भी ममता से मुलाकात कर चुके हैं। एनडीए से अलग हुए चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी भी इस फ्रंट की तरफ जा सकती है। अगर मान लो इन दलों के साथ कुछ और पार्टियां भी जुड़ गईं और फेडरल फ्रंट बन गया तो फिर विपक्षी एकता का क्या होगा? इसके लिए पिछले दिनों ममता बनर्जी ने दिल्ली में सोनिया गांधी से भी मुलाकात की थी, लेकिन विपक्षी मोर्चे में सभी दलों को बराबरी की भागीदारी पर बात नहीं बन पाई थी।

डिनर डिप्लोमेसी से नहीं मिली कामयाबी
विपक्षी दलों को एक जुट करने की कवायद के तहत ही 13 मार्च को कांग्रेस पार्टी की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अपने आवास पर 20 विपक्षी दलों के नेताओं को डिनर पर बुलाया था। इसके माध्यम से वो संदेश देना चाहती थीं कि विपक्ष एकजुट है। सोनिया गांधी के बाद अब एनसीपी के अध्यक्ष शरद पवार ने विपक्षी दलों को डिनर पर बुलाया। अगर विपक्षी दल एकजुट हैं तो फिर उन्हें यह बार-बार साबित करने की जरूरत क्यों पड़ रही है? कभी इसके घर तो कभी उसके घर जुट कर विपक्षी दलों के नेता क्या बताना चाह रहे हैं? मतलब साफ है कि अभी यह शुरुआती दौर है, इनमें एकजुटता हो पाएगी इस पर संदेह है।

पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद सिमट गए क्षेत्रीय दल
देश में कांग्रेस पार्टी, वाम दल, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल जैसी तमाम विपक्षी पार्टियां, जो पहले कभी देश की सत्ता का केंद्र हुआ करती थीं। आज इन दलों को कोई पूछने वाला नहीं है। 2014 के बाद जिस तरह से ज्यादातर राज्यों में बीजेपी और एनडीए की सरकारें बनती जा रही हैं उसके फलस्वरूप इनमें से कई दल अपने-अपने प्रभाव वाले राज्यों तक ही सीमित हो कर रह गए हैं। और तो और कुछ दलों की अपने राज्यों में भी पकड़ ढीली हो चुकी है। ऐसे में सवाल उठता है कि हांफते-कराहते ये क्षेत्रीय दल क्या प्रधानमंत्री मोदी और बीजपी के लिए चुनौती बन पाएंगे?

बीजेपी के सामने विपक्षी दलों की हालत पतली
2014 में जब पीएम मोदी देश के प्रधानमंत्री बने थे, तब एनडीए की कुल 7 राज्यों में सरकार थी और उनमें से 4 मुख्यमंत्री बीजेपी के थे। आज 21 राज्यों में एनडीए की सरकार है और 15 राज्यों में बीजेपी के मुख्यमंत्री है। बीजेपी और सहयोगी दलों की देश के 75 प्रतिशत भू-भाग सत्ता है और 68 प्रतिशत से ज्यादा आबादी पर एनडीए की राज्य सरकारों का शासन है। यह आंकड़े साबित करने के लिए काफी हैं कि देश में किस तरह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की लोकप्रियता बढ़ रही है। यही लोकप्रियता कांग्रेस समेत सभी विपक्षी दलों की चिंता का सबब बनी हुई है। विपक्षी दल पीएम मोदी के करिश्माई नेतृत्व के सामने हताशा की मुद्रा में हैं।

बिखरा है विपक्षी कुनबा, सबकी अपनी ढपली-आपना राग
विपक्षी एकजुटता की राह में यह भी बड़ा कांटा है, कि उनके विचारों में एकरूपता नहीं है। दरअसल, विपक्षी दल भानुमती के कुनबे की तरह हैं, यहां हर किसी का लक्ष्य अलग है, मकसद अलग और विचार भी अलग है। हालांकि इन सभी का उद्देश्य प्रधानमंत्री मोदी और बीजेपी को चुनौती देना है, लेकिन सामूहिक तौर पर चुनौती देने से पहले ये लोग खुद ही एक दूसरे के लिए चुनौती बन जाते हैं।

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