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झूठे प्रचार तंत्र से लोकतंत्र के मूल स्वरूप पर आघात कर रहा एजेंडा मीडिया!

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राजनीति और मीडिया एक दूसरे को काफी हद तक प्रभावित करते हैं। ऐसे में मीडिया कौन-सी खबरों को प्रमुखता देता है, किस खबर का न्यूज वेल्यू किस तरह आंकता है, इस पर राजनीति का एजेंडा भी तय होता है। पाठकों-दर्शकों की रुचि मायने तो रखती हैं, लेकिन आम लोगों की राय को दिशा देने में मीडिया अपना प्रभाव अवश्य डालता है।

दरअसल देश में मीडिया को पूरी स्वतंत्रता है, लेकिन कुछ पत्रकार इस आजादी का गलत इस्तेमाल करते हुए फर्जी, झूठी, भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से गलत खबरें फैलाने में जुटे हैं।

सही समाचारों को छिपा कर हल्की खबरों से खेल रहा मीडिया
मीडिया का एक धड़ा सही खबरों को छिपा कर हल्की खबरों को तवज्जो दे रहा है। बीते हफ्ते सलमान खान को जेल या जमानत पर टेलीविजन चैनल्स पर चर्चा और बहस होती रही। सलमान को 20 साल जेल होगी या 5 साल से लेकर तमाम चैनलों ने जजों के रूटीन ट्रांसफर तक के मामले को खूब चटकारे लेकर दिखाया। इसी तरह कॉमेडियन कपिल शर्मा द्वारा अपशब्दों के इस्तेमाल और आइपीएल मैच को लेकर तमाम मीडिया चैनल्स चर्चा करते रहे। कई चैनलों ने तो ये खबर भी दिखाई कि सैफ और करीना के बेटे तैमूर को पाचन प्रक्रिया में कुछ गड़बड़ी हो गई।

एजेंडा सेटिंग के कारण लोकहित की खबरों को छिपा रहा मीडिया
आइये हम नजर डालते हैं बीते हफ्ते की कुछ ऐसी खबरों पर जो आम लोगों के जानने योग्य हैं, लेकिन एजेंडा मीडिया ने एक विशेष रणनीति के तहत सामने आने ही नहीं दिया। 20 प्रतिशत की वृद्धि के साथ डायरेक्ट टैक्स कलेक्शन 10,05,000 करोड़ तक पहुंचा। नये बैंकरप्सी कोड के कारण यूपीए सरकार के कार्यकाल में 9 लाख करोड़ रुपये एनपीए में से 4 लाख करोड़ वसूले गए। स्वर्ण आयात योजना की सीबीआई जांच शुरू हो गई। 2017-18 में 10 हजार किलोमीटर नए राष्ट्रीय राजमार्ग बनाए गए। सामरिक और रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण दिल्ली के काठमांडू ब्रॉड गेज रेल लाइन की घोषणा की गई। फरवरी माह के दौरान कोर सेक्टर में 5.5 प्रतिशत की वृद्धि हुई और ई-वे बिल की शुरुआत हो गई। इन खबरों के अतिरिक्त विपक्ष के अलोकतांत्रिक रवैये के कारण संसद के बजट सत्र में काम काज नहीं होने से जनता के 360 करोड़ रुपये बर्बाद हो गए।

 

देश में ‘आग’ लगाने वाली खबरों को तवज्जो दे रहा एजेंडा मीडिया
20 मार्च को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि एससी/एएसटी केस में बिना जांच के किसी की गिरफ्तारी नहीं होगी। कोर्ट ने संविधान के मूल भाव की रक्षा की, लेकिन एजेंडा मीडिया ने भ्रामक खबरें फैलाई और संदेश यह दिया कि एससी/एसटी एक्ट को ही खत्म कर दिया गया। हैरत वाली बात ये रही कि किसी भी चैनल, न्यूज वेबसाइट या अखबार ने इस मुद्दे को सही संदर्भ में नहीं उठाया। यही नहीं, 2 अप्रैल को दलित संगठनों के भारत बंद का आह्वान किसी विशेष दलित संगठन ने नहीं किया था, लेकिन सोशल मीडिया पर चल रही झूठी खबरों को एक साजिश के तहत जानबूझ कर बड़ा बना दिया गया, परिणामस्वरूप पूरा देश हिंसा की चपेट में आ गया।

किसी के एक ट्वीट या पोस्ट पर भेड़चाल में क्यों पड़ जा रहा मीडिया?
देश में 10 अप्रैल को जेनरल और ओबीसी समुदाय की तरफ से आरक्षण के विरोध में भारत बंद का मैसेज सोशल मीडिया पर शेयर किया गया। हैरानी की बात यह थी कि मैसेज में किसी भी संगठन और पार्टी का नाम नहीं था। जाहिर है जब किसी संगठन का नाम नहीं हो तो उसकी प्रामणिकता संदिग्ध रहती है। इतना ही नहीं 10 अप्रैल को भारत बंद के संदेश को बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की फोटो के साथ भी शेयर किया गया। साफ है कि इस मैसेज के पीछे उन ताकतों का हाथ था, जो देश के लोगों को जातियों के आधार पर लड़ाना चाहते हैं। लेकिन एजेंडा मीडिया ने जानबूझ कर सही बात सामने नहीं आने दी और यह नहीं बताया कि भारत बंद का आह्वान ‘फर्जी’ है।

झूठी और भ्रामक खबरें फैलाकर चौथे स्तंभ को नुकसान पहुंचा रहा एजेंडा मीडिया
सोशल मीडिया हो या फिर मेन स्ट्रीम मीडिया, हर तरफ झूठी और भ्रामक खबरों का बोलबाला है। हैरत की बात ये है कि एशियन एज, इंडियन एक्सप्रेस, जनसत्ता और एनडीटीवी जैसे बड़े मीडिया हाउस भी ऐसी फर्जी खबरें फैलाते हैं। गुजरात में लड़की छेड़ने वाले की हत्या को दलित एंगल दे दिया गया। इसी तरह स्मृति ईरानी द्वारा 10 हजार गायें बांटने की झूठी खबरें छापी गईं। केंद्र सरकार द्वारा दलाईलामा के ‘थैंक्यू इंडिया’ कार्यक्रम का बहिष्कार करने और राहुल गांधी से एनसीसी के बारे में सवाल पूछने वाली छात्रा को एबीवीपी से जोड़ देने जैसी खबरें बढ़ा चढ़ाकर प्रकाशित की गईं।

असहिष्णुता पर उतर आया है मोदी विरोधी एजेंडा मीडिया
हैरानी की बात यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के केंद्र की सत्ता संभालने के बाद उन्हें बदनाम करने के लिए झूठी खबरों का सहारा लिया जा रहा है। दरअसल केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा करने की मीडिया की प्रवृति बन गई है। जैसे ही समाज के कमजोर तबके या फिर अल्पसंख्यकों के विरुद्ध कोई घटना घटती है, उसे भारतीय जनता पार्टी की ओर मोड़ दिया जाता है। स्पष्ट है कि कि ये न केवल सांप्रदायिक सद्भाव को बिगाड़ने वाला है, बल्कि असहिष्णुता का बड़ा उदाहरण है।

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