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कर्नाटक को कहीं मुख्यमंत्री के रूप में कांग्रेस का गुलाम तो नहीं मिला?

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कर्नाटक की जनता आज खुद को ठगा हुआ सा महसूस कर रही है। कर्नाटक के लोगों ने इस बार कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल करने के लिए मतदान किया था। चुनाव के बाद कांग्रेस पार्टी ने लोकतंत्र का मजाक उड़ाते हुए तीसरे नंबर की पार्टी जेडीएस से हाथ मिला लिया और एचडी कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बना दिया। सिर्फ 37 विधायकों वाली पार्टी का नेता जब मुख्यमंत्री बनेगा तो उसका क्या हश्र होगा, यह कर्नाटक में देखा जा सकता है। एचडी कुमार स्वामी मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे जरूर हैं, लेकिन वो सिर से पैर तक कांग्रेस पार्टी के एहसान तले दबे हैं। 23 मई को शपथ लेने के बाद से कुमारस्वामी जिस तरह के बयान दे रहे हैं उससे तो यही साबित होता है। अभी तक न तो वो अपना मंत्रिमंडल बना पाए हैं और न ही राज्य की जनता, गरीब किसानों के लिए कुछ कर पाए हैं। कुमारस्वामी खुद कह चुके हैं कि वो कांग्रेस की दया से सीएम बने हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि कहीं कर्नाटक में सीएम की कुर्सी पर कांग्रेस का गुलाम तो नहीं बैठा है?

सीएम कुमारस्वामी ने राहुल को ‘पुण्यात्मा’ बताया
यह सवाल इसलिए भी जायज है, क्योंकि कर्नाटक जैसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री जिस तरह बर्ताव कर रहा है वो एक सीएम के लिहाज से किसी भी मायने में उचित नहीं ठहराया जा सकता है। कुमारस्वामी ने हाल ही में बयान दिया था कि वो कांग्रेस की दया से सीएम बने हैं, कर्नाटक की जनता की वजह से नहीं। इस बयान के बाद कुमारस्वामी ने ताजा बयान में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को पुण्यात्मा बताया है। कुमारस्वामी ने कहा, ‘आज भले ही मुझे लोगों का आशीर्वाद प्राप्त नहीं है, लेकिन पुण्यात्मा राहुल गांधी ने मुझ पर विश्वास जता कर सत्ता दी है। हमें एक अच्छा अवसर मिला है। मैं किसानों की कर्जमाफी करूंगा और वो इसका विरोध नहीं करेंगे, मैं उन्हें समझा लूंगा।‘ कुमारस्वामी ने राहुल गांधी को विश्वास में लेकर ही यह फैसला लेने की बात भी कही।

तो क्या 10 जनपथ के आदेश से ही कोई काम करेंगे ‘दास’ कुमारस्वामी?
कर्नाटक के मुख्यमंत्री कुमारस्वामी ने साफ कहा, ‘’मैं आज कांग्रेस की कृपा पर हूं। मैं राज्य के साढ़े छह करोड़ लोगों के दबाव में नहीं हूं। मुझे कांग्रेस से अनुमति लेनी होगी, उनकी अनुमति के बिना मैं कुछ नहीं कर सकता, उन्होंने मुझे समर्थन दिया है।‘’ कुमारस्वामी के इस बयान को समझा जाए तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि वे कर्नाटक के मुख्यमंत्री नहीं, बल्कि नेहरू-गांधी परिवार के ‘दास’ हैं। दरअसल जिस अंदाज में कुमारस्वामी ने कांग्रेस के आगे घुटने टेके हैं, इससे तो लगता है कि उन्होंने सिर्फ और सिर्फ कुर्सी को ही याद रखा है। क्योंकि यह साफ हो चुका है कि जिस प्रकार से यूपीए सरकार के दौरान 10 जनपथ से आदेश टाइप होकर आते थे, उसी प्रकार कर्नाटक में भी होने वाला है।

कांग्रेस के कर्जदार हैं कुमारस्वामी, जनता के नहीं!
कर्नाटक में जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर जिस अनैतिक आधार पर सरकार बनाई गई है, उससे तो यही जाहिर होता है कि बिना सोनिया-राहुल के पूछे, कुमारस्वामी कोई निर्णय नहीं ले सकते हैं। यह इससे भी जाहिर हो रहा है कि कुमारस्वामी मुख्यमंत्री रहते हुए भी पोर्टफोलियो का बंटवारा नहीं कर सकते, क्योंकि सोनिया गांधी और राहुल गांधी देश से बाहर हैं।

220 सीटों में से 147 सीटों पर हुई थी जमानत जब्त
कर्नाटक में कुमारस्वामी ने 220 सीट पर चुनाव लड़ा था, जिसमें 147 सीटों पर इनकी पार्टी की जमानत जब्त हो गयी थी। यानि 80 प्रतिशत सीटों पर जनता ने इन्हें किसी लायक नहीं माना था। जाहिर है जनादेश इनके विरुद्ध था, लेकिन लोगों के नकारे जाने के बाद और कम सीटें रहते हुए भी कुमारस्वामी ने मुख्यमंत्री बनना स्वीकार किया। जाहिर है कि वे गांधी-नेहरू परिवार की गुलामी करने के लिए मानसिक रूप से तैयार हैं!

कुर्सी के लिए गिरते ही जा रहे सीएम कुमारस्वामी
जिस राज्य के 3,700 किसानों ने 5 साल में खुदकुशी की। इसी को आधार बनाकर जेडीएस ने चुनाव लड़ा। जनता के गुस्से के कारण ही कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया तक को अपनी सीट भी गंवानी पड़ गई, लेकिन वही पार्टी आज सत्ता में हैं। जाहिर है झारखंड के मधु कोड़ा की तरह ही कुमारस्वामी तो महज एक चेहरा हैं, सत्ता तो कांग्रेस के हाथों में है। दरअसल कुमारस्वामी का मुख्यमंत्री बनना उसी संस्कृति का हिस्सा है, जिसको आधार बनाकर कांग्रेस पार्टी ने परोक्ष या अपरोक्ष रूप से हमेशा सत्ता सुख भोगा है।

अपनी ही बात से मुकर गए कुमारस्वामी
कर्नाटक चुनाव के दौरान कांग्रेस और सिद्धारमैया ने जेडीएस को संघी, भ्रष्ट और दलाल कहा था। कुमारस्वामी को पानी पी-पी कर कोसा था। इसी तरह कुमारस्वामी ने भी हासन की जनसभा में कहा था कि- सिद्धारमैया को कुत्ता बनाकर रखूंगा। हालांकि कुमारस्वामी सिद्धारमैया को कुत्ता तो नहीं बना पाए, खुद जरूर 10 जनपथ के गुलाम बन गए हैं। हालांकि मुख्यमंत्री पर इस तरह का दबाव एक लंबे शासन के लिए अच्छे संकेत तो नहीं हैं।

जनता से बदला लेकर चुकाएंगे कांग्रेस का कर्ज!
कर्नाटक में जुगाड़ के आधार पर कुमारस्वामी मुख्यमंत्री तो बन गए हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि वे प्रदेश का शीर्ष पद पाकर भी खुश नहीं हैं। उनके मन में कहीं ना कहीं सबसे छोटी पार्टी होने की टीस है और यह बयान उसी पीड़ा का इजहार भी माना जा सकता है। इस कथन में कड़वाहट भी है, लेकिन यह भी सत्य है कि दोनों पार्टियां 2019 के लिए गठबंधन करने की भी तैयारी कर चुकी हैं।

क्या जनता दल सेक्यूलर का कांग्रेस में विलय होने जा रहा है!
सवाल उठ रहे हैं कि कर्नाटक की जनता ने क्या किसी खास परिवार या पार्टी का दास चुनने के लिए वोट दिए थे? सवाल यह भी कि कुमारस्वामी मजबूरी क्यों व्यक्त कर रहे हैं? वे अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय क्यों नहीं कर देते, जिससे सारा विवाद ही खत्म हो जाए। कांग्रेस में समाहित होने के बाद तो वे सर्व स्वीकार्य हो ही जाएंगे और 10 जनपथ के आदेश से 5 साल तक मौज उड़ाएंगे।

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