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राजनीति के स्तर को और कितना नीचे गिराएंगे केजरीवाल ?

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पिछले तीन साल में देश ने जहां सुधारवादी कदमों के साथ क्रांतिकारी बदलाव के दौर देखे हैं…वहीं देश की राजनीति में एक ऐसा चेहरा भी है जो अपने तौर-तरीकों से लगातार राजनीति के स्तर को गिराने पर उतारु है। वो चेहरा और किसी का नहीं, दिल्ली के अति विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का है।

आम आदमी से खिलवाड़ का प्रतीक
केजरीवाल का चेहरा आज आम जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाकर फिर उसके साथ खिलवाड़ करने का प्रतीक बन चुका है। गौर कीजिए कि छह साल पहले अन्ना हजारे के साथ जन लोकपाल आंदोलन के साथ शुरू हुआ केजरीवाल का सफर आज कहां तक पहुंच चुका है। केजरीवाल बिना सबूत के अपने राजनीतिक विरोधियों पर अनाप-शनाप आरोप लगाने से कभी बाज नहीं आते..लेकिन उनकी ये फितरत रही है कि वो अपने गिरेबां में कभी नहीं झांकते।

घूसखोरी के आरोप पर चुप्पी
केजरीवाल के अपने ही सहयोगी रहे कपिल मिश्रा उन पर सत्येंद्र जैन से दो करोड़ रुपये की घूस लेने का आरोप लगा चुके हैं। कपिल मिश्रा के मुताबिक उन्होंने अपनी आंखों से ये होते देखा। ऐसे संगीन आरोप के बावजूद पहले तो केजरीवाल काफी समय तक चुप रहते हैं..और जब बोलते हैं तो बस इतना कहते हैं कि आज तक उन्होंने कोई भ्रष्टाचार नहीं किया..साथ ही ये भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार किया होता तो जेल में होता। क्या अपनी बात से केजरीवाल ये भी कहना चाहते हैं कि भ्रष्टाचार के साये में घिरने के बावजूद जेल नहीं जाने वाले सभी नेता दूध के धुले हैं?

चंदे से चांदी काटते रहे केजरीवाल!
केजरीवाल के खिलाफ पार्टी फंडिंग के नाम पर गड़बड़झाला की शिकायतों का भी अंबार है। दो करोड़ रुपये के एक चंदे के मामले में इनकम टैक्स विभाग आम आदमी पार्टी की एक रिपोर्ट चुनाव आयोग को भी भेज चुका है। बताया जा रहा है कि इनकम टैक्स विभाग ने कम से कम छह चिट्ठियां इस चंदे को लेकर भेजीं..लेकिन पार्टी ने उस पर कोई जवाब नहीं दिया। दरअसल, चंदे के इस फंदे से गर्दन कैसे निकाली जाए…यह केजरीवाल को सूझ ही नहीं रहा तो फिर इनकम टैक्स को जवाब क्या देंगे वो? जानकारियों के मुताबिक केजरीवाल को ये रकम 50-50 लाख रुपये के चार ड्राफ्ट के माध्यम से मिली थी।

कसम खाकर तोड़ना बना सियासी धंधा
राजनीति में जब कभी कसमें खाकर उन्हें तोड़ने वालों का नाम लिया जाएगा तो केजरीवाल उनमें अव्वल रहेंगे। अन्ना के साथ जन आंदोलन पर बैठे केजरीवाल ने राजनीति में नहीं जाने की कसम खाई थी..हवाला दिया था कि ये कुर्सी किसी को भी गंदा कर सकती है..डर जताया था कि कहीं वो भी राजनीति में जाएं तो वैसे ही गंदे ना हो जाएं..ये सब हवाला देकर उन्होंने कुर्सी से तौबा करने की बात कही थी। लेकिन केजरीवाल के सच से गुजरते हुए अब जाकर ये भी पता चल रहा है कि राजनीति से परहेज रखने की केजरीवाल की बात में भी एक राजनीति थी।

अन्ना और आम आदमी से विश्वासघात
जिस अन्ना के चलते केजरीवाल को लोगों ने जाना…उसी अन्ना के साथ विश्वासघात कर केजरीवाल ने सियासत का रास्ता अपना लिया। ये भी अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा के लिए केजरीवाल की एक सुनियोजित चाल थी। दिल्ली तब कांग्रेस के शासन से परेशान थी…केजरीवाल ने जनता को बढ़-चढ़कर सपने दिखाने शुरू कर दिये…जनता कभी-कभी बातों में आ जाती है। 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में उसने केजरीवाल के चेहरे पर पूरा नहीं लेकिन थोड़ा भरोसा जताया। बहुमत से दूर रहे केजरीवाल ने तब अपने बच्चों की कसम खाकर कहा था कि वो कांग्रेस के साथ कभी सरकार नहीं बनाएंगे। लेकिन केजरीवाल तो कसमतोड़ू नेता हैं, अपनी उस कसम को भी तोड़कर दिखा दिया। फरवरी 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा चुनावों में दिल्ली की जनता ने लगभग सारी सीटें केजरीवाल के खाते में डाल दीं…शायद कुछ ऐसा सोचकर कि पहली बार बहुमत ना मिलने के चलते केजरीवाल कुछ ना कर पाए हों…इसलिए अपनी पूरी ही आस्था सौंप दो…लेकिन केजरीवाल ने जनता की उस आस्था का भी कत्ल कर दिया।

जनता के पैसे पर अय्याशी!
खबरों के मुताबिक केजरीवाल की आम आदमी पार्टी के विधायक और मंत्री ही नहीं उनके रिश्तेदारों ने भी जनता के पैसे पर खूब ऐश किये हैं। डेढ़ साल में सवा करोड़ रुपये समोसे-चाय पर उड़ाया जाना आखिर किस बात की तस्दीक करता है? दिल्ली सरकार की एक दावत में 16-16 हजार रुपये की थाली परोसे जाने का मामला भी ऐसा है कि आंखें खुली की खुली रह जाएं। केजरीवाल के पांच मंत्रियों की कम से कम 24 ऐसी विदेश यात्राएं सामने आई हैं जो उप राज्यपाल की अनुमति लिये बगैर की गई। कपिल मिश्रा ने इसको लेकर भी अनशन किया था कि आखिर ये सच सामने आए कि इन यात्राओं पर खर्च कितना हुआ, इनका प्रायोजक कौन था और मकसद क्या था?

केजरीवाल ने दिया भाई-भतीजावाद को बढ़ावा
आरोपों की मानें तो केजरीवाल भाई-भतीजावाद को भी आबाद करने में लगे हैं। मीडिया में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक केजरीवाल के दिवंगत साढ़ू सुरेंद्र कुमार बंसल के स्वामित्व वाली कंपनी रेणु कंस्ट्रक्शन के कामकाज को पीडब्ल्यूडी के इंजीनियरों ने लाल झंडी दिखा दी थी, इसके बावजूद जहांगीरपुरी में एक नाले से जुड़ा प्रोजेक्ट उससे वापस नहीं लिया गया। सरकारी दस्तावेजों के हवाले से ये पता चलता है कि सार्वजनिक परियोजना को अंजाम देने में केजरीवाल के रिश्तेदार की कंपनी की अयोग्यता से अवगत होने के बावजूद सत्ता का बेजा इस्तेमाल कर उसे प्रोजेक्ट सौंपा गया। इस मामले में एसीबी ने केजरीवाल के साढ़ू के घर के साथ दो कंपनियों पर छापेमारी भी की है। पीडब्ल्यूडी विभाग से जुड़ा यह घोटाला करीब 250 करोड़ रुपये का बताया जा रहा जिसे फर्जी बिलों के सहारे अंजाम दिये जाने का आरोप है। अपनों को प्रोजेक्ट सौंपकर पैसों की बंदरबांट का ये बेहद संगीन आरोप है। गौर करने वाली बात ये है कि पीडब्ल्यूडी विभाग का जिम्मा उस सत्येंद्र जैन के हाथ में है…जिनकी केजरीवाल से खूब छनती है। लेकिन केजरीवाल का तो यही रुख है…खाता न बही, जो केजरीवाल कहे वही सही!

अपने काम पर नहीं, सिर्फ दूसरों पर नजर
केजरीवाल अपने काम पर कम बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कामकाज में खमियां निकालने पर ज्यादा समय देते हैं। क्या दिल्ली की जनता ने केजरीवाल को उस पीएम में खामियां निकालने के लिए सत्ता में बैठाया है…जो भारत को आज दुनिया के सबसे ताकतवर देशों की श्रेणी में खड़ा करने में जुटा हुआ है? बदनाम भी हुए तो क्या नाम ना हुआ…केजरीवाल शायद इसी कहावत के साथ अपनी राजनीति को आगे बढ़ाना चाहते हैं। लेकिन इसी चक्कर में वो वित्त मंत्री अरुण जेटली की मानहानि के मामले में दूसरी बार फंस चुके हैं। केजरीवाल पर मानहानि के पहले केस में 10 करोड़ का दावा ठोका गया था तो उसी केस से जुड़ी सुनवाई के दौरान एक और मामले में उन पर 10 करोड़ का दावा ठोका गया है।

केजरीवाल हर तरफ से घिर चुके हैं। खुद से मोल ली हुई मुसीबतों के जाल से बाहर आने का रास्ता उन्हें नहीं सूझ रहा। लाभ के पद के मामले में उनके 21 विधायकों पर सुरक्षित रखा गया फैसला किसी भी दिन आ सकता है। दिल्ली नगर निगम चुनावों में मिली करारी शिकस्त के बाद उन्हें आने वाले समय में दिल्ली में भी सियासी मुश्किलों की गंध मिलने लगी है। ऐसे में ही वो ईवीएम में गड़बड़ी जैसे बेबुनियाद आरोप के साथ हल्ला मचाने लगाते हैं। एक अनावश्यक मुद्दे को उछालकर वो अपने ऊपर भ्रष्टाचार के कई सारे आरोपों को दबाने की कोशिश करते हैं। राजनीति से खुद को दूर रखने की कसमें खाने वाला शख्स आज राजनीति के स्तर को छिछले से छिछले स्तर पर ले जाने में लगा है।

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