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केजरीवाल क्यों ठोक रहे हैं चुनाव आयोग को ताल?

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अरविन्द केजरीवाल अब चुनाव आयोग को ताल ठोंक रहे हैं। ऐसा वे उस फटकार के बदले कर रहे हैं जो चुनाव आयोग ने उन्हें ‘रिश्वत के लिए उकसाने’ पर लगायी है। अगर बात उस बच्चे जैसी हो, जो मम्मी की डांट के बाद शिकायती हो जाता है तब तो ठीक है, लेकिन ये उदाहरण उद्दंड बच्चे का लगता है जो अपनी जिद के लिए किसी की सुनने को तैयार नहीं।

उद्दंडता क्यों बर्दाश्त करे आयोग?- चुनाव आयोग अगर इस उद्दंडता को बर्दाश्त करे, तो उसकी आचारसंहिता की धज्जियां उड़ जाएंगी। फिर दूसरे दल और नेता इसी उदाहरण के बूते चुनाव आयोग को आंखें दिखाते नजर आएंगे। एक संस्था के रूप में चुनाव आयोग को अपने अस्तित्व की रक्षा भी करनी है और पवित्रता भी रखनी है ताकि लोकतंत्र की बयार देश में अच्छे वातावरण में बहती रहे।

केजरीवाल पार्टी प्रमुख ही नहीं सीएम भी- अरविन्द केजरीवाल न सिर्फ एक पार्टी के मुखिया हैं बल्कि एक मुख्यमंत्री भी हैं। इसलिए चुनाव आयोग से वे कहीं अधिक जिम्मेदारी से जुड़े हुए हैं। चुनाव निष्पक्ष हो, बिना प्रलोभन के हों- ऐसी अपेक्षा वे चुनाव आयोग से करते हैं तो आयोग की बातें मानने का कर्त्तव्य भी उन्हें आगे बढ़कर निभाना चाहिए। पर, क्या अरविन्द केजरीवाल खुद को समझाएंगे? उनके पूरे राजनीतिक चारित्रिक इतिहास को देखकर ऐसा नहीं लगता।

बेमकसद नहीं है टकराव का रास्ता- केजरीवाल बिना मकसद कदम नहीं बढ़ाते। अगर चुनाव आयोग से टकराव का रास्ता केजरीवाल ने चुना है तो वे उस पर बढ़ेंगे- तबतक, जबतक कि मकसद पूरा नहीं हो जाए। लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि वे अपने कदम वापस नहीं लेंगे। राजनीतिक स्वार्थ की खातिर वो कदम भी बढ़ाते हैं और पलट भी जाते हैं।

उल्टा चुनाव आयोग पर वार- अरविन्द केजरीवाल ने इस बार चुनाव आयोग को ही भ्रष्टाचार बढ़ाने वाला करार दिया है। क्यों? क्योंकि चुनाव आयोग ने केजरीवाल को उस बयान के लिए फटकार लगायी है जिसमें उन्होंने जनता से वोट के लिए रिश्वत देने आए लोगों से रिश्वत रख लेने के लिए कहा था। केजरीवाल खुद से पूछें कि किसी की दी हुई रिश्वत को रख लेना क्या भ्रष्टाचार को बढ़ावा देना नहीं है?- यही सवाल चुनाव आयोग उनसे पूछ रहा है और जवाब से असंतुष्ट होकर उन्हें फटकार रहा है।

सवाल कुछ जवाब कुछ और- जवाब से चुनाव आयोग असंतुष्ट क्यों है? क्योंकि केजरीवाल पूछे गये सवाल का जवाब देने के बजाए कुछ और जवाब देने की कोशिश करते दिख रहे हैं। केजरीवाल ये बताने की कोशिश कर रहे हैं कि वो जो कुछ भी कह रहे हैं उससे वोट खरीदने का भ्रष्टाचार खत्म होगा। इसी जोश में वे चुनाव आयोग से उम्मीद करते हैं कि उन्हें ब्रांड अम्बेसडर बना दे। ऐसा होने पर वे दो साल में भ्रष्टाचार खत्म करने का दावा भी करते हैं।

चुनाव आयोग को दावों से क्या मतलब?- भला चुनाव आयोग क्यों अरविन्द केजरीवाल के दावे पर भरोसा करे, उन्हें ब्रांड अम्बेसडर बनाए? जो व्यक्ति आरोपों पर स्पष्टीकरण तक नहीं दे पा रहा हो, उसके दावों पर चुनाव आयोग काम करने लगे!- ऐसा सोचना भी गलत है। पर, केजरीवाल को इससे कोई मतलब नहीं।

चित भी केजरीवाल की, पट भी- एक ही सांस में वे चुनाव आयोग का ब्रांड अम्बेसडर बनने की तमन्ना भी जाहिर करते हैं और उसी सांस में वे चुनाव आयोग को रिश्वतखोरी बढ़ाने वाला भी बताते हैं। वाह केजरीवालजी। ब्रांड अम्बेसडर बना दिया जाए, तो रिश्वतखोरी खतम हो जाएगी। और, जो न बनाया जाए तो न सिर्फ रिश्वतखोरी जारी रहेगी बल्कि उसके लिए दोषी चुनाव आयोग होगा?

केजरीवाल का अहम बयान- गोवा की अलग-अलग रैलियों में अरविन्द केजरीवाल ने साफ कहा था-

“लोगों को केवल पांच हजार रुपये ही स्वीकार नहीं करना चाहिए, बल्कि रिश्वत देने के इच्छुक नेताओं से दस हजार रुपये की मांग करनी चाहिए। लेकिन वे अपना वोट आम आदमी पार्टी को ही दें।“

क्या है बयान के मायने- जरा गौर कीजिए केजरीवालजी, आप न सिर्फ रिश्वत रख लेने को कह रहे हैं बल्कि दुगना मांगने को कह रहे हैं। बदले में अपने लिए वोट भी मांग रहे हैं। मोटी भाषा में रिश्वत देने वाले की रिश्वत लो, उसे धोखा दो, दुगना वसूलो और फिर वो AAP को वोट दो। आप एक साथ कई अपराध कहने को कह रहे हैं केजरीवालजी…उस पर ये कहते हैं कि इससे भ्रष्टाचार मिट जाएगा? इस चमत्कार पर भोली-भाली जनता भरोसा कर भी ले, तो वो कैसे करेंगे जिन पर कानून की जिम्मेदारी है? आपकी भी है। इसलिए आप बड़े दोषी हैं।

हाईकोर्ट जाएं पर चुनाव आयोग पर हमला क्यों?- केजरीवाल हाईकोर्ट में चुनाव आयोग के फैसले को चुनौती देने की बात कह रहे हैं। लेकिन चुनाव आयोग पर हमला क्यों? ये आक्रामक राजनीति है जिसके साथ केजरीवाल चलते रहे हैं। बात-बात में पीएम को घसीट लेना, एलजी से जंग छेड़ते रहना, कभी शीला को जेल भेजने की बात, कभी अम्बानी-अडानी की रट, कभी गडकरी पर आरोप, कभी गडकरी से माफी- केजरीवाल ऐसी ही राजनीति करते रहे हैं। इससे उन्हें कई फायदे होते हैं

फायदा नंबर 1
बिना खर्च के मीडिया में जबरदस्त पोपुलरिटी मिल जाती है। घंटों नहीं कई दिन तक सुर्खियों में रहते हैं।

फायदा नंबर 2
टकराव की सियासत से अपने फॉलोअर को समझाने में आसानी होती है कि किसी बड़े उद्देश्य के लिए बड़े-बड़ों से लड़ रहे हैं। इसे संघर्ष का नाम देने में आसानी होती है।

फायदा नंबर 3
ऐसे वाद-विवाद के सही या गलत होने को लेकर तुरंत फैसला नहीं होता। लिहाजा वे अपनी संगठित टीम के जरिए अपना मैसेज लोगों तक पहुंचाने का मकसद पूरा कर लेते हैं।

गणतंत्र दिवस का भी किया था बहिष्कार
क्या आप गणतंत्र दिवस या स्वतंत्रता दिवस के बहिष्कार की बात सोच सकते हैं? नहीं ना? ऐसा वही सोच सकते हैं जिन्हें भारतीय लोकतंत्र में भरोसा नहीं है। जैसे- आतंकवादी, नक्सलवादी। लेकिन आपकी सोच गलत है। ऐसा खुद को अराजकतावादी कहने वाले अरविंद केजरीवाल भी कर सकते हैं। वो भी अपने मंत्री सोमनाथ भारती की उस करतूत पर पर्दा डालने के लिए जो उन्होंने खिड़की एक्सटेंशन में युगांडा की महिलाओं के घर में घुसकर अभद्रता की थी। केजरीवाल अपने सहयोगी सोमनाथ भारती को गिरफ्तार करने वाले अफसरों पर कार्रवाई की मांग पर ऐसे अड़े कि उन्हें ये भी ख्याल नहीं रहा कि वो मुख्यमंत्री हैं और गणतंत्र दिवस का बहिष्कार करना देशद्रोह के समान है। जो इंसान मुख्यमंत्री रहते संविधान दिवस तक की परवाह नहीं करे, वो वाकई अराजकतावादी ही हो सकता है।

देशविरोधी काम करके भी केजरीवाल को तब राजनीतिक फायदा हासिल होता दिख रहा था। देखिए क्या थे फायदे-

फायदा नंबर 1
अपने मंत्री सोमनाथ भारती के करतूतों पर पर्दा डालते हुए दूसरी बहस छेड़ देना

फायदा नंबर 2
जबरदस्त प्रचार मिलना, हर दिन सुर्खियों में आना।

फायदा नंबर 3
केंद्र यानी पीएम मोदी से टकराव करते हुए विपक्ष की राजनीति में जगह बनाना

फायदा नंबर 4
अपनी सरकार के लिए सहानुभूति बटोरना ये कहते हुए कि केन्द्र एलजी के माध्यम से उन्हें काम करने नहीं दे रहा है। मंत्रियों को तंग किया जा रहा है।

बहिष्कार भी करेंगे, गणतंत्र दिवस पर न्योता भी चाहिए

न्योता नहीं मिलने की बात कर रहे अरविन्द केजरीवाल गणतंत्र दिवस समारोह के दौरान VVIP गैलरी में

गणतंत्र दिवस का बहिष्कार करने की घोषणा करने वाले मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को केंद्र सरकार से इस बात के लिए लड़ते भी देर नहीं लगी कि उन्हें समारोह के लिए न्योता क्यों नहीं मिला? आप बहिष्कार भी करें, आपको न्योता भी चाहिए। यानी लड़ाई हर हाल में जारी रहनी चाहिए। ऐसी ही शख्सियत का नाम है अरविंद केजरीवाल।

फायदा नंबर 1
ये जताने का प्रयास कि केंद्र की सरकार उनके साथ खराब व्यवहार कर रही है और इस तरह से हमदर्दी पाने की कोशिश।

फायदा नंबर 2
गणतंत्र दिवस के बहिष्कार के बाद जो थू-थू हुई थी, उस पर डैमेज कंट्रोल का प्रयास।

फायदा नंबर 3
बिना खर्च मुफ्त प्रचार, जो केजरीवाल का हथकंडा रहता आया है।

अदालत से भी ऊपर हैं केजरीवाल?

क्या अरविन्द केजरीवाल अदालत से भी ऊपर हैं? क्या वे खुद को जज से भी ऊपर मानते हैं? ये सवाल इसलिए उठे क्योंकि मुख्यमंत्री रहते केजरीवाल ने बॉन्ड भरने से इनकार कर दिया था। बीजेपी नेता नितिन गडकरी की ओर से दायर आपराधिक मानहानि मामले में बॉन्ड भरकर बेल लेने के लिए तैयार नहीं हुए दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल। ऐसा करते हुए उन्होंने संकेत दिया था कि वे न्यायिक प्रक्रिया को नहीं मानते। लेकिन जब जज गोमती मनोचा ने 21 मई 2014 को आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल को जुडिशल कस्टडी में भेजने का आदेश दिया, तो उन्हें अहसास हो गया कि आने वाले समय में उनके दिन तिहाड़ में ही बीतेंगे। फिर तो मानो उन्हें सांप सूंघ गया। सारे क्रांतिकारी विचार धरे के धरे रह गये। फिर उन्होंने 10 हजार रुपये का बॉन्ड भी भरा और न्यायिक प्रक्रिया को कबूल करते हुए जेल में 6 दिन बिताने के बाद केजरीवाल रिहा हुए। इस पूरी कवायद में केजरीवाल की मंशा क्या रही, उस पर नजर डालते हैं-

फायदा नंबर 1
‘व्यवस्था के शहीद’ के तौर पर प्रचार पाने की कोशिश

फायदा नंबर 2
ज्यूडिशियरी से टकराव के साथ अपना कद बढ़ाने की कोशिश

फायदा नंबर 3
नितिन गडकरी से मानहानि के मसले पर ‘हार नहीं मानेंगे’ वाला रुख दिखाकर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश

केजरीवाल ने एलजी जंग से भी छेड़ दी ‘महाजंग’?
मुख्यमंत्री बनते ही केजरीवाल ने अपने दोनों कार्यकाल में तत्कालीन एलजी नजीब जंग से महाजंग छेड़ दी। एलजी को संविधान के तहत मिले अधिकारों को भी मानने को तैयार नहीं दिखे। बार-बार बिना एलजी से पूछे फैसले, उनके फैसलों के उत्तर में नये फैसले, कभी तबादला को लेकर, कभी विधेयक के मसौदे को लेकर टकराव केजरीवाल ने जारी रखा। एलजी से लगातार टकराव से राजनीतिक फायदा लेने की केजरीवाल ने मुहिम जारी रखी। देखिए क्या हुए फायदे-

फायदा नंबर 1
वादों को पूरा नहीं कर पाने की तोहमत एलजी के बहाने केंद्र सरकार पर थोपने की कोशिश

फायदा नंबर 2
ये संदेश देने की कोशिश कि “वो काम नहीं करने दे रहे हैं”

फायदा नंबर 3
मीडिया में लगातार सुर्खियों में बने रहे। इसे ‘अधिकारों का संघर्ष’ बताते रहे।

दिल्ली हाईकोर्ट ने केजरीवाल को दिखाया आईना

एक सरकार के लिए इससे बुरा क्या हो सकता है कि उसके लिए तमाम फैसले ही अदालत रद्द कर दे। ऐसी सरकार को जरा भी शर्म होती, तो एक मिनट भी आगे कुर्सी पर बनी नहीं रहती। अदालत ने एलजी से पूछे बगैर लिए गये दिल्ली सरकार के तमाम फैसलों को अवैध करार दिया। हाईकोर्ट ने ऐसा करते हुए दिल्ली सरकार को कड़ी फटकार लगायी।

जो अरविन्द केजरीवाल दिल्ली हाईकोर्ट से फटकार से प्रभावित नहीं होते, वो चुनाव आयोग की फटकार सुन लें, खुद को बदल लें- ये मान लेना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा। इसलिए केजरीवाल झूठी लड़ाई लड़ेंगे तब तक जब तक कि चुनाव का मौसम खत्म ना हो जाए।

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