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EVM के बाद गुरु को क्यों कोस रहे हैं केजरीवाल?

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लगता है कि दिल्ली के विवादास्पद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने धोखेबाजी और दगाबाजी में रिकॉर्ड बनाने की ठान ली है। इतिहास गवाह है कि कुर्सी के लिए उन्हें अपने मासूम बच्चों की भी झूठी कसमें खाने से परहेज नहीं है। लेकिन अबकी बार उन्होंने सीधे-सीधे समाजसेवी अन्ना हजारे पर अनर्गल आरोप लगा दिए हैं, जो उनके राजनीतिक गुरु माने जाते हैं। दुनिया जानती है कि अगर केजरीवाल ने अन्ना का नाम नहीं बेचा होता और उनके नाम पर जमा किए गए संसाधनों का दुरुपयोग नहीं किया होता तो सियासत के मंच पर उनकी कोई हैसियत नहीं होती।

पहले उन्होंने अपने गुरु अन्ना हजारे की पीठ में छुरा घोंपा, उनकी साख पर आम आदमी पार्टी की नींव तैयार की और अब उन्हीं पर झूठे और मनगढ़ंत आरोप लगाने शुरू कर दिए हैं। वैसे तो जन-लोकपाल आंदोलन के तुरंत बाद ही केजरीवाल का चेहरा बेनकाब हो चुका था। लेकिन उनके पाखंड की सियासत में अभी बहुत कुछ देखना बाकी है। इसबार उन्होंने हिंदी दैनिक जागरण को दिए इंटरव्यू में अन्ना हजारे पर भाजपा के लिए काम करने का आरोप लगा दिया है।

धोखेबाजी दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल के नाम का पर्याय बन चुकी है। ये सिलसिला राजनीति में उनके कुख्यात होने से पहले से चल रहा है। हालांकि, राजनीति में आने से पहले उनकी करतूतों की लिस्ट बनाना तो मुश्किल है, लेकिन कुछ सालों की राजनीति में ही उन्होंने दगाबाजी की जो लंबी फेहरिस्त तैयार की है उसे यहां समेटने की कोशिश की गई है।  

अन्ना हजारे
समाजसेवी अन्ना हजारे 5 अपैल 2011 को केजरीवाल की टीम के साथ दिल्ली के जंतर मंतर पर जनलोकपाल को लागू कराने की मांग लेकर धरने पर बैठे। सरकार ने जनलोकपाल की कई शर्तों को मानने से इनकार कर दिया। बातचीत टूटते ही ऐलान किया गया कि 15 अगस्त से अन्ना हजारे एक बार फिर आमरण अनशन पर बैंठेंगे। अन्ना ने दिल्ली से बाहर मुंबई में आमरण अनशन का एलान किया। एक तरफ अन्ना अनशन पर बैठे और दूसरी तरफ 28 दिसंबर 2011 को लोकसभा में लोकपाल बिल पास हुआ। उधर मुम्बई में अन्ना का आमरण अनशन फ्लॉप हुआ। मुंबई में केजरीवाल ने अन्ना के जन समर्थन में कमी देखकर अपना अलग रास्ता बनाने की तैयारी करने लगे और कहना शुरु कर दिया कि राजनीति का कीचड़ साफ करना है तो कीचड़ में उतरना ही पड़ेगा। अन्ना ने केजरीवाल के साथ राजनीति में आने से मना कर दिया, अन्ना के विरोध के बाद भी केजरीवाल ने 26 नवंबर 2012 को साथियों के साथ मिलकर आप पार्टी गठन कर दिया और चुनावी राजनीति में कूद पड़े। 

प्रशांतभूषण, शांतिभूषण और योगेन्द्र यादव
भ्रष्टाचार आंदोलन में प्रमुख भूमिका निभाने वाले शांति भूषण, प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को पार्टी विरोधी गतिविधियों का आरोप लगाकर केजरीवाल ने बाहर का रास्ता दिखा दिया। 28 मार्च 2015 को हुई दिल्ली के कापसहेड़ा में नेशनल कांउसिल की मीटिंग में जो हुआ उससे साफ पता चलता है कि केजरीवाल कितने तानाशाही प्रवृति के हैं। मीटिंग शुरू होने से पहले योंगेंद्र यादव परिषद के कुछ सदस्यों को ‘भीतर आने की अनुमति नहीं देने’ का दावा करते हुए धरने पर बैठ गए थे। इस बीच बैठक परिसर के भीतर और आसपास बड़ी संख्या में एकत्र हुए पार्टी स्वयंसेवकों के एक बड़े वर्ग ने यादव के खिलाफ लगातार नारेबाजी की। काफी देर बाद वह मीटिंग में शामिल होने के लिए अंदर गए थे। भारी हंगामे के बीच शुरू हुई मीटिंग में सबसे पहले आम आदमी पार्टी चीफ अरविंद केजरीवाल का भाषण हुआ। केजरीवाल के भाषण के बाद मीटिंग की अध्यक्षता गोपाल राय ने की और मनीष सिसोदिया ने प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव, अजीत झा और प्रोफेसर आनंद कुमार को राष्ट्रीय कार्यकारिणी से बाहर निकालने का प्रस्ताव रखा। प्रस्ताव पारित हो गया और इन चारों नेताओं को सभी पदों से हटा दिया गया।


किरण बेदी
लोकपाल आंदोलन के दौरान किरण बेदी को केजरीवाल बड़ी बहन की तरह मानते थे। राजनीति में आने के बाद केजरीवाल और बेदी में दूरियां बढ़नी शुरू हुईं। केजरीवाल राजनीति करने के लिए मैदान में कूद पड़े। दिल्ली की विधान सभा चुनावों के बाद वह 2014 में मोदी के खिलाफ वाराणसी से चुनाव लडने पहुंचे। तब तक किरण बेदी और केजरीवाल के विचारों में दूरियां कितनी बढ़ चुकी थी इसका अंदाज इस एक ट्वीट से लगता है-

केजरीवाल ने किरण बेदी से इतनी दूरियां बना ली कि दिल्ली के 2015 विधानसभा चुनावों में दोनों एक दूसरे के सामने खड़े दिखे। एक-दूसरे के खिलाफ कई बार तल्ख बयान दिए, यहां तक किरण बेदी ने केजरीवाल को अपने ट्विटर पर ब्लॉक कर दिया।

दिल्ली विधानसभा चुनावों के दौरान केजरीवाल ने किरण बेदी को खुले मंच पर बहस तक करने की चुनौती दे डाली, जो कभी उनके सुर में सुर मिलाकर आंदोलन की बातों को जनता के सामने रखते थे।

मेधा पाटेकर
नर्मदा बचाव आंदोलन से जुड़ी समाज सेविका मेधा पाटेकर भी केजरीवाल के आंदोलन वाले व्यक्तित्व से प्रभावित होकर साथ देने के लिए आप पार्टी में शामिल हो गईं। लोकसभा चुनाव 2014 में आप के टिकट पर मुबंई उत्तरी पूर्व से उम्मीदवार भी बनीं लेकिन चुनाव हार गईं। 2015 में जब प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को धक्के मारकर निकाल देने वाला केजरीवाल का ऑडियो टेप बाहर आया तो उससे नाराज होकर 28 मार्च को उन्होंने आप छोड़ दिया। छोड़ते समय उन्होंने कहा कि जिस तरह से आप पार्टी में अन्य राजनीतिक दलों की तरह मूल्यों की कोई कीमत नहीं रह गई है, उसकी वह निंदा करती हैं। अपरोक्ष रूप से केजरीवाल पर आप की विचारधारा से धोखा करने का आरोप लगाया। अपने इस्तीफा पत्र में केजरीवाल को लिखा-

मयंक गांधी
योगेन्द्र यादव, प्रशांत भूषण और अन्य साथियों को जिस तरह से केजरीवाल ने साजिश के साथ नेशनल काउंसिल की मीटिंग से बाहर निकाला था, उसका खुलासा मयंक गांधी अपने ब्लॉग में करते रहे थे, वह जानते थे कि उनकी पारदर्शिता की मांग से एक न एक दिन उन्हें भी केजरीवाल बाहर का रास्ता दिखा ही देंगे। 

अतंतः 11 नवंबर 2015 को मयंक गांधी ने भी केजरीवाल के मनमाने तौर-तरीकों और आप की विचारधारा के साथ धोखा होता देख इस्तीफा दे दिया। मयंक गांधी केजरीवाल के धोखे से इतने दुखी हैं कि वह आप के सभी चुनाव हार जाने की कामना करते हैं।

अंजलि दमानिया
महाराष्ट्र से आप की कार्यकर्ता और केजरीवाल की प्रमुख सहयोगी अंजलि दमानिया ने 11 मार्च 2015 को केजरीवाल का साथ छोड़ दिया। जिस तरह से प्रशांत भूषण और योगेन्द्र यादव को निकालने के लिए केजरीवाल ने स्टिंग ऑपरेशन और अप्रजातंत्रिक हरकतें की थी उससे सभी दुखी थे, उनमें से एक अंजलि दमानिया भी थी।

मधु भादुड़ी
आप के संस्थापक सदस्यों में से एक मधु भादुड़ी ने 3 फरवरी 2014 को दिल्ली विधान सभा चुनावों के बाद आप छोड़ दिया। वो आप की विदेश नीति बनाने वाली समिति की सदस्य थीं। उन्होंने इस्तीफा देते समय कहा कि आप में महिलाओं का सम्मान नहीं होता है। मेरा मात्र एक ही मुद्दा है कि महिलाऐं भी मुनष्य हैं और उनके साथ भी मनुष्य जैसा व्यवहार किया जाना चाहिए। पार्टी की मानसिकता खाप पंचायत जैसी है, इसमें महिलाओं के लिए कोई स्थान नहीं है। उनका केजरीवाल पर सीधा आरोप था कि यह पार्टी वोट के लिए बदल चुकी है और केवल चुनाव जीतना चाहती है।

विनोद कुमार बिन्नी
AAP की दिल्ली में सरकार बनने के बाद विरोध का जो सबसे पहला सुर उठा, वह उठाया पार्टी के विधायक विनोद कुमार बिन्नी ने। बिन्नी ने खुलकर केजरीवाल के खिलाफ आरोप लगाए। सोमनाथ भारती के मुद्दे पर भूख हड़ताल तक की, पार्टी के अंदर सीधे केजरीवाल के साथ इतनी कलह बढ़ गई कि अततः विनोद बिन्नी ने 26 जनवरी 2014 को आप छोड़ दिया।

एमएस धीर
पहली बार बनी आप सरकार के दौरान एमएस धीर को दिल्ली विधआनसभा का अध्यक्ष बनाया गया था, लेकिन दिल्ली में 2015 में दुबारा चुनाव होने से पहले 21 नवंबर को आप से इस्तीफा दे दिया। धीर दिल्ली में आप पार्टी में सिख समुदाय का चेहरा माने जाते थे। इन्होंने भी केजरीवाल पर पक्षपात और अप्रजातांत्रिक होने का सीधा आरोप लगाया।

शाजिया इल्मी
शाजिया इल्मी पत्रकारिता से अन्ना आंदोलन में आई थीं। वो आम आदमी पार्टी के चर्चित चेहरों में से एक थीं। लोकसभा चुनावों में पार्टी की करारी हार के बाद शाजिया ने ना सिर्फ पार्टी छोड़ी बल्कि केजरीवाल पर कई गंभीर आरोप भी लगाए। शाजिया के दो ट्वीट ये साफ बता देते हैं कि किस तरह से केजरीवाल ने आप की विचारधारा के साथ धोखा देकर अपने साथियों को सन्न कर दिया।

एसपी उदय कुमार
विज्ञान के क्षेत्र में बड़े सम्मान से लिया जाने वाला नाम एसपी उदयकुमार के जुड़ने को पार्टी के राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ते प्रभाव से जोड़कर देखा जा रहा था। हालांकि उदयकुमार भी केजरीवाल के साथ ज्यादा दिन तक नहीं रहे, उन्होंने दक्षिणी राज्यों की उपेक्षा की वजह से पार्टी छोड़ दी।

प्रोफेसर आनन्द कुमार
टीम केजरीवाल में थिंकटैंक का हिस्सा रहे प्रोफेसर आनंद कुमार ने लोकसभा का चुनाव भी लड़ा। पार्टी को राष्ट्रीय स्वरूप देने के लिए पार्टी और सरकार में ‘एक व्यक्ति एक पद’ की बात उठायी तो अरविंद केजरीवाल भड़क गये। पार्टी के संयोजक पद से इस्तीफे का दांव खेलकर केजरीवाल ने प्रोफेसर आनन्द कुमार, योगेंद्र यादव और प्रशान्त भूषण को एक झटके में पार्टी से निकाल दिया।

स्वामी रामदेव
अरविंद केजरीवाल ने रामदेव से तभी तक दोस्ती रखी जब तक कि उनका इस्तेमाल हो सकता था। अन्ना आंदोलन से जुड़कर और हटकर भी योगगुरु रामदेव ने कालाधन और भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन जारी रखा, लेकिन केजरीवाल ने उनका साथ देने से हमेशा खुद को पीछे रखा। दरअसल तानाशाही सोच रखने वाले केजरीवाल ने कभी चाहा ही नहीं कि उनसे अलग कोई बड़ा मूवमेंट हो।

जनरल वीके सिंह
अन्ना आंदोलन में खुलकर अरविंद केजरीवाल के साथ रहे। लेकिन जब केजरीवाल ने पार्टी बना ली, तो उन्हें नहीं पूछा। अपनी उपेक्षा से नाराज रहे वीके अन्ना के साथ जुड़े रहे। केजरीवाल की स्वार्थ वाली राजनीति देखने के बाद जनरल वीके ने बीजेपी का साथ देने का फैसला किया।

जस्टिस संतोष हेगड़े
जनलोकपाल का ड्राफ्ट जिन तीन लोगों ने मिलकर तैयार किया था उनमें से एक हैं जस्टिस संतोष हेगड़े। अन्ना आंदोलन में सक्रिय जुड़े रहे। पर राजनीतिक महत्वाकांक्षा जगने के बाद केजरीवाल ने हेगड़े को भी किनारा करना शुरू कर दिया। उपेक्षित और अलग-थलग महसूस करने के बाद जस्टिस हेगड़े ने टीम अन्ना से दूरी बना ली। वो इतने खिन्न हो गये कि केजरीवाल के शपथग्रहण समारोह में बुलाए जाने के बाद भी नहीं पहुंचे।

श्री श्री रविशंकर
आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने अन्ना आंदोलन को अपना समर्थन दिया था। अरविंद केजरीवाल के राजनीतिक दल बनाने को भी उन्होंने गलत नहीं बताया था। लेकिन केजरीवाल ने अपनी गतिविधियों से उनको नाराज कर दिया। श्री श्री रविशंकर ने कहा कि केजरीवाल ने दिखा दिया कि वो अन्य राजनेताओं से अलग नहीं हैं। सस्ती लोकप्रियता, उनकी अतिमहत्वाकांक्षा और तानाशाही ने लोगों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया। केजरीवाल और श्री श्री में ट्विटर पर भी खुली जंग हुई।

एडमिरल रामदास
पूर्व नौसेनाध्यक्ष एडमिरल रामदास तब भौंचक रह गये जब उन्हें उनके पद से हटा दिया गया। एडमिरल रामदास ने कहा कि मैं यह जानकर चकित हूं कि अब पार्टी को मेरी जरूरत नहीं रही। आंदोलन से लेकर राजनीतिक दल बनने तक एडमिरल रामदास ने अरविंद केजरीवाल का साथ दिया, लेकिन मौका मिलते ही उन्होंने उनसे इसलिए किनारा कर लिया क्योंकि लोकपाल के तौर पर उन्होंने किसी किस्म के समझौते से इनकार कर दिया था।

जे एम लिंग्दोह
पूर्व निर्वाचन आयुक्त लिंग्दोह की भूमिका जनलोकपाल बिल को तैयार करने में रही। लिंग्दोह उन चंद लोगों में शामिल रहे जिन्होंने खुलकर जनलोकपाल के लिए समर्थन दिया। राजनीतिक दल बना लेने के बाद केजरीवाल ने उन्हें भी त्याग दिया। दरअसल लिंग्दोह जैसे लोगों के रहते केजरीवाल के लिए पार्टी और सरकार में तानाशाही चलाना मुश्किल होता।

स्वामी अग्निवेश
एक समय अन्ना आंदोलन का चेहरा बन चुके थे स्वामी अग्निवेश। सरकार और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई। बाद में अरविंद केजरीवाल ने उनसे किनारा कर लिया। स्वामी अग्निवेश को पार्टी बनाने से पहले ही केजरीवाल ने त्याग दिया था। टीम केजरीवाल ने उन्हें कांग्रेस का दलाल साबित करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

अजित झा
प्रोफेसर आनन्द कुमार के साथ अजित झा ने भी पार्टी के भीतर लोकतंत्र की आवाज उठायी। आंदोलन और पार्टी में सक्रिय रहे। केजरीवाल ने चर्चित फोन टेप कांड में अजित झा के लिए भी अपशब्द कहे थे। योगेंद्र यादव, आनन्द कुमार, प्रशांत भूषण के साथ-साथ इन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया।

मुफ्ती शमून कासमी
अन्ना हजारे को धोखा देने की वजह से मुफ्ती शमून कासमी आप संयोजक अरविंद केजरीवाल से खफा हो गये। उन्होंने केजरीवाल पर अन्ना के कंधे पर रखकर बंदूक चलाने का आरोप लगाया। दिल्ली विधानसभा चुनाव में मौलाना की शरण में जाने के लिए भी कासमी ने केजरीवाल की निन्दा की और तभी कह दिया कि जरूरत पड़ी तो ये आदमी कांग्रेस से भी हाथ मिला सकता है। कासमी का दावा था कि केजरीवाल की सत्ता के लिए भूख सबसे पहले उन्होंने ही पहचानी।

कैप्टन गोपीनाथ
भारत में कम कीमत के हवाई यातायात में प्रमुख भूमिका निभाने वाले जीआर गोपीनाथ को भी पार्टी छोड़नी पड़ी। पार्टी छोड़ते हुए गोपीनाथ ने अरविंद केजरीवाल की कार्यप्रणाली की आलोचना की। उन्होंने कहा कि पार्टी केजरीवाल के नेतृत्व में रास्ते से भटक गयी है।

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