Home चुनावी हलचल कर्नाटक में सभी दांव फेल, कांग्रेस का एक और किला ढहा

कर्नाटक में सभी दांव फेल, कांग्रेस का एक और किला ढहा

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कांग्रेस का एक और किला ढह गया। कर्नाटक के इस किले को बचाने के लिए कांग्रेस ने सभी तरह के कुचक्र का सहारा लिया। बांटो और राज करो की नीति को अपनाते हुए कांग्रेस ने हिन्दुओं को तोड़ने और दलित, लिंगायत को बांटने की साजिश रची। पार्टी ने कर्नाटक को भाषा के नाम पर लड़ाने और अलग झंडा बनाकर तोड़ने की साजिश रची, लेकिन कर्नाटक के प्रबुद्ध मतदाताओं ने कांग्रेस के सभी दांव नाकाम कर दिए।

मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति
विकास के नाम पर दिखाने के लिए कुछ नहीं होने के कारण मुख्यमंत्री सिद्धारमैया चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस पार्टी के पुराने हथकंडे, मुस्लिम तुष्टिकरण को हवा देने में लगे रहे। कर्नाटक में एक तरफ टीपू सुल्तान को लेकर राज्य सरकार लोगों की भावनाएं भड़का कर मुस्लिमों को अपने पाले में करने का खेल खेला, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस ले लिया। जनवरी, 2018 में कर्नाटक सरकार ने एक अधिसूचना जारी की, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ पिछले 5 सालों में दर्ज सांप्रदायिक हिंसा के केस वापस लिए जाने का आदेश दिया गया। साफ है कि यह ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ की वजह से किया गया। इस सर्कुलर के आधार पर सिद्धारमैया सरकार ने ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का कार्ड खेलने और हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति करने की कोशिश की।

तुष्टिकरण का कोई मौका नहीं छोड़ा
यही नहीं, राज्य की जनता के भारी विरोध को दरकिनार करके भी सिद्धारमैया सरकार ने टीपू सुल्तान का महिमामंडन किया। गौर करने वाली बात है कि कर्नाटक में एक बड़ा वर्ग टीपू को कट्टर और आततायी मानता है। कोडावा समुदाय तो उसे धर्मांध और अत्याचारी बताकर नफरत करते हैं, तो मेलकोट गांव के लोग उसे 800 ब्राह्मणों का हत्यारा मानते आए हैं।

हिंदू-हिंदू को ‘बांटने’ की राजनीति
कर्नाटक में प्रभावशाली लिंगायत समुदाय का वोट पाने के लिए सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। चुनाव में जीत हासिल करने के लिए सिद्धारमैया ने हिंदुओं को बांट कर उन्हें कमजोर करने की भी कोशिश की, लेकिन मतदाताओं ने इनकी मंशा समझने में कोई गलती नहीं की।

लिंगायत-लिंगायत को ‘बांटने’ की राजनीति
सिद्धारमैया सरकार ने एक ही परंपरा से आने वाले वीरशैव लिंगायत और लिंगायत में भी फूट डाल दी है। गौरतलब है कि वीरशैव परंपरागत रूप से भगवान शिव के साथ हिदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं, जबकि लिंगायत समुदाय में भगवान शिव को ईष्टलिंग के रूप में पूजने की मान्यता है। हालांकि ये किसी भी प्रकार से हिंदू समुदाय से अलग नहीं हैं, लेकिन लिंगायत को अलग धर्म और वीर शैव को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर सिद्धारमैया ने दोनों समुदायों में फूट डाल दिया।

उत्तर-दक्षिण को ‘बांटने’ की राजनीति
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा कि- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र केंद्र से जितना पाते हैं उससे ज्यादा का टैक्स केंद्र सरकार को देते हैं। उन्होंने दलील दी है कि उत्तर प्रदेश को प्रत्येक एक रुपये के टैक्स योगदान के एवज में उसे 1.79 रुपये मिलते हैं, जबकि कर्नाटक को 0.47 पैसे। कर्नाटक कांग्रेस के इस ट्विटर अकाउंट पर भी यही बातें लिखी गई।

“For every 1 rupee of tax contributed by UP that state receives Rs. 1.79

For every 1 rupee of tax contributed by Karnataka, the state receives Rs. 0.47

While I recognize, the need for correcting regional imbalances, where is the reward for development?”: CM#KannadaSwabhimana https://t.co/EmT7cY60Q0

— Karnataka Congress (@INCKarnataka) 16 March 2018

हिंदी-कन्नड़ को ‘बांटने’ की राजनीति
पीपीपी पार्टी बनने से बचने के लिए कांग्रेस ने मतदाताओं को बरगलाने की हर वो कोशिश की जिससे चुनाव में जीत हासिल हो सके। कर्नाटक को हिंदी-कन्नड़ में बांटने की कोशिश की गई। इस मुद्दे पर पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी ने सिद्धारमैया को कर्नाटक में खुली छूट दे दी। सिद्धरमैया ने कर्नाटक में हिंदी भाषा के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया। वे कई माध्यमों से दलील देते रहे कि, ‘यूरोप के कई देशों से कर्नाटक बड़ा है, मैं एक कन्नड़ नागरिक हूं और कर्नाटक में हम ज्यादातर कन्नड़ भाषा का इस्तेमाल करते हैं, और हिंदी भाषा के थोपे जाने का विरोध करते हैं।’

कर्नाटक के लिए अलग झंडे की सियासत
विकास के मोर्चे पर फेल मुख्यमंत्री सिद्धारमैया चुनाव जीतने के लिए ऐसी बातों को हवा देने में लग गए, जिनसे राज्य के निवासियों की भावनाओं पर असर हो और वे कांग्रेस के पक्ष में झुक जाएं। चुनाव से पहले सीएम सिद्धारमैया ने कर्नाटक के लिए अलग झंडे का शिगूफा छोड़ा। देश में सिर्फ जम्मू-कश्मीर ही ऐसा राज्य हैं जिसका अपना अलग झंडा है। देश का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता, लेकिन सिद्धारमैया ने प्रदेश के लिए अलग झंडे को मंजूरी देकर विवाद खड़ा कर दिया। कन्नड़ भाषी लोगों की अस्मिता के प्रतीक के लिए अलग झंडा बनाने का फैसला करके सिद्धारमैया ने कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की लेकिन उनका यह दांव भी विफल रहा।

‘बांटने’ की राजनीति
‘बांटने’ की राजनीति को लगातार बढ़ावा देने वाले कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने पहले हिंदू-मुस्लिम को बांटा, फिर हिंदू-हिंदू को बांटा, फिर लिंगायत-लिंगायत को बांटा, फिर हिंदी-कन्नड़ को बांटा, फिर उत्तर-दक्षिण को बांटा, फिर देश से प्रदेश को बांटा… और आखिर में अपने समर्थकों को रिश्वत बांटते भी रंगे हाथों पकड़े गए।


वीडियो में साफ दिख रहा है कि सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मैसूर में चुनाव प्रचार के दौरान महिलाओं को पैसे बांटे। एक मंदिर के बाहर सिद्धारमैया के स्वागत के लिए खड़ी महिलाओं को उन्होंने दो-दो हजार रुपए के नोट देते हुए वे कैमरे में कैद हुए।

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