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स्पेशल है मृणाल पांडे की ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ !

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मृणाल पांडे हिंदुस्तान अखबार की संपादक रही चुकी हैं। मृणाल पांडे प्रसार भारती के अध्यक्ष पद पर भी काम कर चुकी हैं। मृणाल पांडे ने एनडीटीवी और दूरदर्शन के लिए भी काम किया है। मृणाल पांडे को 2006 में पद्म श्री से भी नवाजा जा चुका है। …  मृणाल पांडे के इतने अलंकरण हैं, लेकिन उनकी भाषाई संस्करण तो देखिये….

घोषित रूप से बीजेपी विरोधी पत्रकार दिवंगत गौरी लंकेश के लिए एक ‘मूढ़’ द्वारा ‘कुतिया’ कह देने से जिस तरह का हंगामा तथाकथित पक्षकारों ने किया था, ऐसा लगा था कि मृणाल पांडे जी के आपत्तिजनक ट्वीट पर भी एडिटर्स गिल्ड में कोई हलचल होगी? संपादकों की संस्थाएं कोई बयान जारी करेंगी? लेकिन ऐसा हुआ क्या? क्या उस ‘मूढ़’ द्वारा कही गई उक्ति से अधिक गम्भीर एक वरिष्ठतम पत्रकार द्वारा देश के प्रधानमंत्री को उनके जन्मदिन पर अपशब्द कहना है कि नहीं?

बहरहाल मृणाल की इस हरकत की कई हलकों में निंदा हो रही है। लेकिन उसमें भी बड़ा झोल है। गौरी लंकेश के लिए किसी मूर्ख द्वारा अपशब्द पर बिफरे रवीश कुमार ने जो मृणाल पांडे की आलोचना की है… लेकिन किन शब्दों में जरा समझिये।

रवीश कुमार ने आलोचना की है या गिड़गिड़ा रहे हैं, अंतर देखिये। एक मूर्ख की टिप्पणी पर यही रवीश कुमार इतने भड़के थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री को उसे अनफॉलो करने और खुद को फॉलो करने का आह्वान तक कर डाला था, लेकिन आज क्या हुआ रवीश कुमार को? रवीश ने कितनों से कहा कि मृणाल पांडे को अनफॉलो करें? नहीं न… यही है पक्षकारों की हकीकत!

अब आइये अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर राजनीति करने वाले पक्षकारों और तथाकथित बुद्धिजीवियों की सच्चाई भी जरा जान लीजिए। वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम ने जब मृणाल पांडे को शब्दों की शुचिता का पाठ पढ़ाने का प्रयास किया तो देखिये पद्मश्री मृणाल की हरकत…

पक्षकारों की जुबान नहीं खुल रही है और अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकारों की घिग्घी बंद है। अब यदि मृणाल पांडे को सोशल मीडिया पर ट्रोल किया जाने लगेगा तो “वो” ही कहेंगे “हमें अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है”। तो क्या अजीत अंजुम जैसे वरिष्ठ पत्रकारों की अभिव्यक्ति की आजादी पर ताला लगाने का मृणाल पांडे जैसी ‘पद्मश्री’ को हक है? बहरहाल आप भी देखिये अजित अंजुम ने क्या लिखा था।

मृणाल पांडे जी…आप प्रसार भारती की अध्यक्ष रहीं…हिंदुस्तान अखबार की संपादक… लेखिका के रूप में भी आपकी पहचान है। गौरी लंकेश की हत्या पर ‘प्रोफेशन के Basics’ की बात की…तब इनका एक अलग रूप… और देश के प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर इनके पत्रकारिता के Basics का ये रूप…

मृणाल पांडे के इस दोमुंहे रूप को देखकर यह तो साबित हो गया कि वह भी उसी ‘बौद्धिक आतंकवाद गैंग’ की सदस्य हैं जो देश के टुकड़े करने वालों के पैरोकार हैं। दलील दी जा रही है कि यह तो व्यंग्य बाण था… मृणाल पांडे की ही दलीलों से समझिये जरा

वंशवाद की बेल से बढ़ीं मृणाल को दस साल कांग्रेस की मेहरबानी से प्रसार भारती में रहते उनके मुंह से कोई व्यंग्य न फूटा था। सवाल यह है कि इतनी बड़ी पत्रकार भाषा की सामान्य मर्यादा तक पालन नहीं करती हैं और ‘पद्मश्री’ हैं। जाहिर है ये उपाधि उनकी योग्यता के लिए कम उनकी चाटुकार शैली के लिए अधिक है।

मृणाल पांडे की चाटुकारिता को जरा इस बायोडाटा से जानिये… हिंदी की सम्मानित पत्रकार होने के नाम पर कांग्रेस शासन काल में 21 बार भारत के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री संग विदेश गईं। बेहिसाब पैसा, शराब और पुरस्कार के लाले ने तीन साल में ही मृणाल जैसों को मानसिक दिवालिया घोषित कर दिया, लेकिन इन तथाकथित बौद्धिक पक्षकारों को क्या हो गया? राजदीप सरदेसाई ने तो अब तक नहीं कहा कि मृणाल घटिया मानसिकता से पीड़ित हैं। आखिर बरखा ने यह क्यों नहीं कहा कि देश के पीएम का अपमान मत करिए !… ओम थानवी और विनोद शर्मा जैसे पत्रकारों को तो जैसे सांप सूंघ गया है। तो क्या हम यह मान लें कि आजादी…गाली गलौज और अपमानित करने की आजादी श्रेष्ठ आजादी है। मृणाल पांडे के लिए तो कुछ ‘स्पेशल’ अभिव्यक्ति की आजादी…? किसी ने कुछ सुना क्या ??

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