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प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में सैन्य महाशक्ति के तौर पर स्थापित हुआ भारत

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आप अक्सर सुनते होंगे की फलाने जगह अमेरिका के सैन्य अड्डे हैं, फलाने जगह रूस के सैन्य अड्डे हैं। पर क्या आप जानते हैं कि मोदी राज में भारत ने कहां-कहां सैन्य अड्डे बना लिए हैं?  मिलिट्री बेस बना लिए हैं तो नीचे लगा हुआ ये नक्शा देख लीजिये। यह साबित करने को काफी है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अब एक आर्थिक महाशक्ति के साथ सैन्य महाशक्ति भी हो गया है।

दरअसल आप जो नक्शा देख रहे हैं, इसमें जहां-जहां भी लाल लाल डॉट आपको दिखाई दे रहे हैं, ये तमाम वो जगह हैं जहां पर भारतीय सेना के बेस अब बन चुके हैं। इन जगहों पर भारतीय सेना अपने हथियारों के साथ तैनात हैं।

तजाकिस्तान, मोजाम्बिक,  ओमान,  क़तर,  नेपाल,  विएतनाम, भूटान, मालदीव, मॉरीशस, मेडागास्कर, सेशेल्स,  सबांग के साथ अभी और 2 बेस सामने आने वाले हैं।

गौरतलब है कि इन सब जगह भारतीय सेना हथियारों के साथ तैनात हैं, तजाकिस्तान अफगानिस्तान से ऊपर, यहां पर भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान तैनात हैं। आपको बता दें कि भूटान और मालदीव में भारत के सैन्य अड्डे पहले से हैं। हालांकि 60 साल में ये 2 ही बने थे, पर पीएम मोदी ने 4 साल में इसे बहुत विस्तार दे दिया है।

अजम्पशन आइलैंड पर सैन्य अड्डा बनाने की अड़चनें हुईं दूर

सेशेल्स के अजम्पशन द्वीप पर भारतीय नौसैनिक अड्डे की स्थापना की अड़चनें दूर हो गयी हैं। दरअसल इस सैनिक अड्डे की स्थापना के लिए भारत और सेशेल्स में समझौता हुआ था, लेकिन मई, 2018 में सेशेल्स सरकार इस समझौते से मुकर गयी थी। इसे भारत के लिए बड़ा कूटनीतिक झटका माना गया था, लेकिन पीएम मोदी की कूटनीति का ही नतीजा है कि अब यह अड़चन दूर हो गई है। दरअसल भारत ने सद‍्भावना के मद्देनजर सेशेल्स के राष्ट्रपति के भारत आने पर उन्हें ससम्मान एक विमान तटीय निगरानी के लिए उपहार में दिया।

मोदी जी की सदाशयता, सेशेल्स के प्रति सम्मान और बराबरी के भाव ने सेशेल्स के राष्ट्रपति डैनी फॉरे को खासा प्रभावित किया जिसका परिणाम यह निकला कि भारत अब अजम्पशन द्वीप पर अपना नौसैनिक अड्डा बना सकेगा। गौरतलब है कि सेशेल्स की सेना की 50 प्रतिशत सामरिक जरूरतों को भारत ही पूर्ण करता है। उसकी सेना को प्रशिक्षण भी भारत ही देता है। भारत वहां पर उसी प्रकार के एक अड्डे की स्थापना करना चाहता है, जैसा उसने मॉरीशस के अगलेगा द्वीप में किया है।

दरअसल भारत हिंद महासागर में 30 से 40 राडार सेंटर स्थापित करके उस क्षेत्र में नौसैनिक निगरानी को मजबूत करना चाहता है, क्योंकि इधर चीन ने म्यांमार, श्रीलंका और मालदीव में अपने नौसैनिक अड्डे स्थापित कर लिये हैं।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जब से देश की कमान संभाली है उन्होंने सैन्य शक्ति को मजबूती देने के लिए कई प्रयास किए हैं। इसी का परिणाम है कि आज अमेरिका जैसी बड़ी रक्षा शक्ति भी भारत की सहायता के लिए आतुर है। सैन्य शक्ति के लिहाज से आज भारत अपने सर्वोच्च दौर में है। जल-थल और नभ, तीनों ही क्षेत्रों में सैनिक शक्ति को सशक्त किया गया है। समुद्र में भारत ने अपनी ताकत को और मजबूती प्रदान करने के लिए कई तरह के कदम उठाए हैं जिससे भारत का महत्व विश्व बिरादरी में बढ़ा है। आइये हम नजर डालते हैं कुछ ऐसी ही कुछ खास बातों पर जिससे ये साबित होता है कि भारत समुद्र में अब एक बड़ी शक्ति के तौर पर सामने आया है।  

Asia-Pacific से Indo-Pacific बनना भारत की उपलब्धि

अमेरिका ने पैसिफिक कमान का नाम इंडो-पैसिफिक कमान कर दिया है। दरअसल इस कमान के नाम में बदलाव भारत के बढ़ते सैन्य महत्व को दर्शाता है। अमेरिका का ये कदम रणनीतिक सोच में हिंद महासागर और भारत की बढ़ती शक्ति को भी बताता है। दरअसल इस कमान का गठन दूसरे विश्व युद्ध के बाद हुआ था। गौरतलब है कि सत्ता में आने के तुरंत बाद ट्रंप प्रशासन ने एशिया प्रशांत का नाम बदल कर भारत-प्रशांत कर दिया था और क्षेत्र में भारत को एक विशिष्ट दर्जा दिया था। जून, 2018 के पहले सप्ताह में अमेरिका ने इसका नाम बदलकर भारत को एक गौरवपूर्ण उपबल्धि का अवसर दिया है। गौरतलब है कि यह अमेरिका का मुख्य लड़ाकू कमान है जिसके तहत करीब आधी दुनिया आती है।

इंडोनेशिया का सबांग बंदरगाह : अंडमान में अतिक्रमण का चीनी मंसूबा नाकामयाब

इंडोनेशिया का सबांग बंदरगार बेहद महत्वपूर्ण है। इसकी अंडमान निकोबार से निकटता इसे और खास बना देता है, क्योंकि यह सीधे भारत के रक्षा तंत्र से जुड़ा है। दरअसल ‘सबांग’ अंडमान निकोबार द्वीप समूह से 710 किलोमीटर की दूरी पर है। महत्वपूर्ण इसलिए भी है कि चीन इसे लेना चाहता था, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी की कूटनीति के कारण इस मसले पर चीन को मात मिली। इंडोनेशिया ने सामरिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण इस ‘सबांग’ बंदरगाह के आर्थिक और सैन्य इस्तेमाल की स्वीकृति भारत को दे दी है।

ओमान के दुक्म बंदरगाह : गल्फ देशों तक पहुंची भारतीय सेना

1950 के दशक में ग्वादर बंदरगाह ओमान के सुल्तान के अधीन था। ओमानी सुल्तान ने भारत को ग्वादर पोर्ट से जुड़ने का प्रस्ताव भी दिया था। लेकिन उस समय नेहरू सरकार ने पाकिस्तान के भय से ओमानी सुल्तान के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था। हालांकि इस गलती को प्रधानमंत्री मोदी ने सुधार लिया है। दरअसल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया ओमान दौरे पर भारत और ओमान के बीच एक अहम रणनीतिक समझौते पर हस्ताक्षर हुए, जिसके तहत भारतीय नौसेना को ओमान के दुक्म पोर्ट तक पहुंच हासिल हो जाएगी। हिंद महासागर के पश्चिमी भाग में भारत के रणनीतिक पहुंच के लिए यह समझौता महत्वपूर्ण है। गौरतलब है कि चीन जिस तरह पाकिस्तान के ग्वादर पोर्ट को विकसित कर रहा है, उसे देखते हुए दुक्म में भारत की मौजूदगी रणनीतिक तौर पर काफी अहम है। इसके जरिए चीन को गल्फ ऑफ ओमान के मुहाने पर रोकने में भारत सक्षम हो जाएगा।

ईरान का चाबहार बंदरगाह : अफगानिस्तान और मध्य पूर्व देशों की राह आसा

23 मई 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान दौरे पर गए तो भारत के लिए बड़ी रणनीतिक उपलब्धि हासिल की। उन्होंने चाबहार बंदरगाह के विकास के संबंध में ईरान से द्विपक्षीय अनुबंध किए। गौरतलब है कि चाबहार दक्षि‍ण पूर्व ईरान के पाकिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत में स्थि‍त एक बंदरगाह है, इसके जरिए भारत अपने पड़ोसी पाकिस्तान को बाइपास करके अफगानिस्तान के लिए रास्ता बनाया है। आपको बता दें कि अफगानिस्तान की कोई भी सीमा समुद्र से नहीं‍ मिलती और भारत के साथ इस मुल्क के सुरक्षा संबंध और आर्थिक हित हैं। फारस की खाड़ी के बाहर बसे इस बंदरगाह तक भारत के पश्चिमी समुद्री तट से पहुंचना आसान है। इस बंदरगाह के जरिये भारतीय सामानों के ट्रांसपोर्ट का खर्च और समय एक तिहाई कम हो जाएगा। अरब सागर में पाकिस्तान ने ग्वादर पोर्ट के विकास के जरिए चीन को भारत के खिलाफ बड़ा सामरिक ठिकाना मुहैया कराया है। इसके जरिए सामरिक नजरिये से भी पाकिस्तान और चीन को करारा जवाब मिल सकेगा क्योंकि चाबहार से ग्वादर की दूरी महज 60 मील है।

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