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गुजरात के विकास पर बोलने का कांग्रेस को अधिकार है?

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लोकसभा चुनाव 2014 से ही विपक्ष का सारा जोर ‘गुजरात मॉडल’ को फेल बताने पर रहा है, लेकिन इस दांव में विपक्ष लगातार फेल होता जा रहा है। वर्तमान में ‘गुजरात मॉडल’ एक बार फिर सुर्खियों में है और इसपर निशाना साध रहे हैं कांग्रेस के ‘युवराज’ राहुल गांधी। कांग्रेस के सवालों के बीच बीजेपी ने गुजरात चुनाव के लिए नया नारा दिया है।… ‘मैं ही गुजरात हूं, मैं ही विकास हूं’… इस नारे से स्पष्ट है कि गुजरात चुनावी में भी बीजेपी विकास और गुजराती अस्मिता के अपने एजेंडे पर कायम रहेगी।

दरअसल 2001 में जब नरेंद्र मोदी ने गुजरात की कमान संभाली तो उन्होंने गुजरात के छह करोड़ लोगों की अस्मिता को विकास के एजेंडे से जोड़ दिया। विकास के हर पैमाने पर पिछड़े गुजरात की बुनियाद को ठीक करने का उन्होंने संकल्प लिया और जनशक्ति की नींव पर विकास के ऐसे प्रतिमान खड़े किए जो प्रदेश की अस्मिता और पहचान से जुड़कर ‘गुजरात मॉडल’ बन गया।

मोदी मतलब गुजरात का विकास
अपने 12 वर्षों के मुख्यमंत्रित्व काल में नरेंद्र मोदी ने गुजराती स्वाभिमान को ऊंचा करने के साथ विकास की निरंतरता को भी बनाए रखा और अब प्रधानमंत्री बनने के बाद भी गुजरात के विकास को वे तत्पर हैं। पिछले डेढ़ दशक में राज्य का बजट 11 हजार करोड़ रुपए से एक लाख 71 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। योजनाओं पर अधिक धन खर्च होने लगा है और प्रति व्यक्ति आय में दस गुनी वृद्धि हुई है।

सूखे खेतों में पानी पहुंचाया
2003 से पहले सूखे राज्य का तमगा झेलता रहा गुजरात आज जल शक्ति से लबालब है। राज्य के हर गांव, हर खेत में पानी की सहज उपलब्धता है। नरेंद्र मोदी ने कमान संभालने के पहले साल में ही 20 हजार चेक डैम का निर्माण जन सहयोग के बूते किया। नर्मदा से सीधे पाइपलाइन के जरिये घर-घर में पानी पहुंचाई गई। 2005 तक गुजरात में छह लाख चेक डैम बना दिए गए।

मृत नदियों में डाली जान
प्रदेश में सरकारी और निजी सहभागिता मॉडल के तहत 6 लाख से ज्यादा चेक डैम, खेत, तलावड़ियां और बोरीबांधों का निर्माण किया गया है। नर्मदा नदी पर शुरू की गई सरदार सरोवर परियोजना दुनिया का सबसे बड़ा सिंचाई नेटवर्क है। इसके तहत दस सालों में 10 लाख से ज्यादा कुएं और बोरवेल फिर से भर दिए गए हैं। इन योजनाओं से 33 लाख हेक्टेयर भूमि तो सिंचित हुई ही भू-जल स्तर में भी तीन मीटर की बढ़ोतरी हो गई है। साबरमती जैसी नदियों में सालों भर पानी का बना रहना इन्हीं प्रयासों का फल है। 

हरा भरा हो गया रेगिस्तान
2001 में सौराष्ट्र और कच्छ सूखे की जद में था। 2001 तक ड्रिप तकनीक केवल 10,000 हेक्टेयर भूमि पर ही उपलब्ध थी, लेकिन आज सात लाख हेक्टेयर भूमि से अधिक इस तकनीक से सिंचित हैं। सदियों से पेयजल संकट से जूझ रहे सौराष्ट्र-कच्छ के कई गांवों को नर्मदा नहर से पेयजल उपलब्ध कराया गया।

ग्राम ज्योति से गांव-गांव रोशन
2001 में नरेंद्र मोदी जब गुजरात के सीएम बने थे तो उनसे मिलने वाले लोग कहते कि मोदीजी कुछ करो या न करो कम से कम डिनर के समय बिजली न जाए इसकी व्यवस्था कर दो। तब तत्कालीन सीएम ने गुजरात के छह करोड़ लोगों की इस पीड़ा को दूर करने का प्रयास शुरू किया। ग्राम ज्योति योजना ने तो जैसे क्रांति ही ला दी। अब राज्य के 18, 066 गांवों में भी 24 घंटे बिजली है।

गुजरात में सरप्लस बिजली
विद्युत ऊर्जा उत्पादन के क्षेत्र में प्रदेश ऐसी स्थिति में है जिससे सिर्फ गुजरात रोशन हो रहा है, बल्कि दूसरे राज्य भी गुजरात की बिजली से अपना अंधेरा दूर कर रहे हैं। आज गुजरात लगभग 29 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन कर रहा है और सरप्लस बिजली हरियाणा और मध्यप्रदेश जैसे राज्यों को बेच भी रहा है।

सशक्त बनीं पंचायतें
कई क्षेत्रों में देश को दिशा दिखा रहे गुजरात की समरस पंचायतें भी मॉडल बन गईं हैं। 13,693 पंचायतों में 28 प्रतिशत समरस पंचायतों का दर्जा पा चुकी हैं। नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में विकसित इन पंचायतों में गांव के लोग मिल-जुलकर सर्वसम्मति से अपना सरपंच चुन लेते हैं। इससे गांव के लोगों को मन मुताबिक मुखिया तो मिल ही जाता है, चुनाव करवाने का सरकारी खर्च भी बच जाता है।

ई-पंचायतों से आया बदलाव
गुजरात ऐसा राज्य है जहां स्थानीय चुनाव भी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानि ईवीएम से करवाए जा रहे हैं। ई पंचायतों के जरिये अब जन्म-मृत्यु प्रमाण पत्र, आय या जाति प्रमाण पत्र जैसी चीजों के लिए लोगों को तालुका या जिला जाने की जरूरत नहीं होती है। भूमि रिकॉर्ड के लिए बनाई गई ई-धरा योजना से भी लोगों को अपनी जमीन सुरक्षित रखने में मदद मिल रही है।

गांव-गांव में पहुंचा ब्रॉड बैंड
गुजरात की सभी पंचायतें ब्रॉडबैंड सेवा से जुड़ी हुई हैं। लगभग सभी गांवों में इंटरनेट की सुविधा पहुंची हुई है। स्वागत ऑनलाइन जैसे कार्यक्रमों के जरिये जनसुनवाई जैसे कार्य अब ऑनलाइन ही हो जाते हैं और आम लोगों को शहरों तक आने-जाने के लिए पैसे खर्च नहीं करने पड़ते हैं।

प्रदेश में सड़कों का जाल
गुजरात की ग्रामीण सड़कें पूरे देश में सबसे अच्‍छी मानी जाती हैं। नरेंद्र मोदी के 12 वर्षों के कार्यकाल में राज्‍य के 98.7 प्रतिशत गांवों को पक्‍की सड़कों के जरिए जोड़ा जा चुका था। आज प्रदेश में सड़कों से 100 प्रतिशत कनेक्टिविटी हो गई है।

सड़कों का डिजिटल कंट्रोल
सड़क प्रबंधन प्रणाली को कंप्यूटरीकृत किया गया जिससे सड़कों के रखरखाव में बेहतरीन सुधार हुए। रखरखाव में 80/20 का प्रावधान किया गया है यानि जिन 20 प्रतिशत रास्तों पर 80 प्रतिशत से ज्यादा लोग आते जाते हैं उसके रखरखाव पर ज्यादा ध्यान दिया गया। विश्व बैंक ने भी कई बार गुजरात के सड़कों के प्रबंधन की तारीफ की है। आज गुजरात का 68 हजार 900 किलोमीटर सड़कों का नेटवर्क भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले बहुत अच्छा है।

शहरों में फ्लाईओवर्स का जाल
गुजरात के तमाम शहरों में कई फ्लाईओवर्स का निर्माण किया है। अहमदाबाद में पचास लाख की आबादी और पचास से ज्यादा फ्लाईओवर और करीब इतने ही अंडर पास बनाए गए हैं। 101 फ्लाईओवर के साथ सूरत ने तो फ्लाईओवर सिटी ऑफ गुजरात के तौर पर पहचान बना ली है। शहरी परिवहन ढांचे को मजबूत बनाने के लिए मल्टी मॉडल अफोर्डेबल ट्रांसपोर्ट अथोरिटी (एमएटीए) का गठन किया है।

सशक्त हुई महिला शक्ति 
गुजरात का बेटी बचाओ जैसा अभियान तो अब देशव्यापी बन गया है। आज गुजरात में संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं की संख्या देश में सबसे ज्यादा 57.47 है, जबकि देश में यह प्रतिशत 53.26 प्रतिशत है। वहीं गुजरात के प्राइवेट सेक्टर में काम करने वाली महिलाओं का प्रतिशत 42.53 प्रतिशत है।

उद्योगों के लिए अनुकूल माहौल
2008 में जब पश्चिम बंगाल के सिंगूर में टाटा को अपने नैनो प्लांट को बंद करने के लिए मजबूर होना पड़ा, तो टाटा समूह के तत्कालीन चेयरमैन रतन टाटा निराश हो चुके थे, लेकिन गुजरात के तत्कालीन रतन टाटा को ‘स्वागतम’ लिखकर एसएमएस किया और इस एक शब्द से प्रभावित होकर उन्होंने साणंद में टाटा नैनो की प्लांट लगा दी। यह सिर्फ एक नजीर है कि गुजरात में उद्योगों के लिए कितना सकारात्मक माहौल है।

दुनिया भर में गुजरात की धमक
2001 से पहले का वो दौर याद कीजिए जब गुजरात में निवेशक नहीं आ रहे थे। औद्योगिक विकास के मानकों पर प्रदेश पिछड़ता जा रहा था, लेकिन तत्कालीन सीएम नरेंद्र मोदी ने इसे चैलेंज माना और 2003 से वाइब्रेंट गुजरात की शुरुआत कर दी। फिर तो वाइब्रेंट गुजरात के सफल आयोजन ने दुनिया के सामने गुजरात की ऐसी तस्वीर पेश कर दी जो ये राज्य आकर्षक इनवेस्टमेंट डेस्टिनेशन बन गया। आज हर छोटा-बड़ा उद्यमी गुजरात में निवेश करना चाहता है।

खेती में नजीर बना गुजरात
नरेंद्र मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल के 12 सालों में राज्य में खेती का ग्रोथ रेट केंद्र से दोगुनी और तीन गुनी रही है। औसतन 2002-06 तक औसतन 6 प्रतिशत विकास दर, वहीं 2007-09 तक औसतन 8 प्रतिशत वहीं 2009-12 में औसतन 10 प्रतिशत से ज्यादा रहा है। गुजरात के कृषि विकास की तारीफ भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने भी की थी।

श्वेत क्रांति से फैला विकास का उजियारा
गुजरात में ‘श्वेत क्रांति’ ने 2003 के बाद राज्य में दूध उत्पादन 68 प्रतिशत बढ़ा है। आज गुजरात की डेयरियां दिल्ली के लिए 20 लाख लीटर, मुंबई के लिए 8 लाख लीटर और कोलकाता के लिए 5 लाख लीटर दूध रोजाना भेजती हैं। इसके अलावा देश की सेनाओं के लिए मिल्क पाउडर भी भेजा जाता है। 2003 से 2013 के बीच डेयरी उद्योग का व्यापार 2,400 करोड़ रुपये से बढ़कर 12,250 करोड़ रुपये हो गया।

‘केस स्टडी’ बन गया कच्छ
कच्छ के भयंकर भूकंप में 20,000 लोग मारे गए, पचास हजार से ज्यादा लोग घायल थे और 6 लाख लोग बेघर हो गए थे। मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ पुनर्वास एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन नरेंद्र मोदी ने पुनर्वास के लिए जहां कॉरपोरेट्स को जोड़ा वहीं लोगों में भरोसा जगाया। महज छह महीने में ही उस इलाके की तस्वीर बदल गई और आज उसी भरोसे की बदौलत कच्छ का इलाका देश ही नहीं पूरी दुनिया में पुनर्वास की सफलता की केस स्टडी बन गया है।

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