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चर्चों-मस्जिदों से निकलते मोदी विरोध के फतवों को समझिये

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विरोध… किसी भी लोकतांत्रिक समाज का हथियार है। मुद्दों के आधार पर विरोध और समर्थन लोकतंत्र की मजबूती हैं, लेकिन सवाल यह कि ऐसे लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच बढ़ते-बनते हमारे समाज के बीच ‘व्यक्ति विरोध’ की राजनीति क्यों परवान चढ़ रही है? यह विषय तब और गंभीर हो जाता है जब इस विरोध के लिए मस्जिदों और चर्चों का इस्तेमाल किया जाता है।   

मीडिया, राजनीतिज्ञों और तथाकथित बुद्धिजीवियों का एक खास वर्ग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति लगातार दुष्प्रचार करता है और घृणा भी फैलाता है। बीते कई वर्षों से इस कार्य में देश के कई मस्जिद और चर्च भी शामिल हो गए हैं। मोदी विरोध में लगातार फतवे जारी किए जा रहे हैं और किसी भी सूरत में उन्हें हराने का आह्वान किया जा रहा है।

दरअसल लोकतांत्रिक व्यवस्था में मुद्दों के आधार पर विरोध हो तो ठीक है, लेकिन जब धार्मिक आधार पर होने लगे तो समझिये यह बड़ी साजिश है। चर्चों और मस्जिदों से निकलते मोदी विरोध के फतवे देश में घृणा की चिंगारी फैला रहे हैं, जो आने वाले समय में राष्ट्र के लिए एक बड़े संकट का सबब बन सकता है। 

ईसाई मिशनरियों की साजिश का पर्दाफाश
08 मई, 2018 को दिल्ली के आर्कबिशप अनिल काउंटो ने मोदी सरकार को देश के धर्मनिरपेक्ष महौल के लिए खतरा बताते हुए देश के सभी चर्च के पादरियों को पत्र लिखा कि 2019 के चुनाव में सरकार बदलने के लिए उन्हें शुक्रवार को प्रार्थना करनी चाहिए। गौरतलब है कि उन्होंने वर्ष 2019 में नरेन्द्र मोदी सरकार नहीं बनेइसके लिए लोगों से दुआ करने की अपील की है। 

21 नवंबर, 2017 को गुजरात में गांधीनगर चर्च के प्रधान पादरी थॉमस मैक्वेन ने लिखा कि – राष्ट्रवादी ताकतें अपने चरम पर हैं, इसलिए हिंदू राष्ट्रवादियों की पार्टी बीजेपी को हरा दो और ईसाई सोनिया गांधी की पार्टी कांग्रेस को जिताओ।

कर्नाटक के बीजापुर लिंगायत डिस्ट्रिक्ट एजुकेशन एसोसिएशन ने भी हिंदुओं को बांटने और मुस्लिमों को एक करने की रणनीति को लेकर 10 जुलाई, 2017 को सोनिया गांधी को भी चिट्ठी लिखी थी। इसका प्रतिफल यह हुआ कि प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने लिंगायतों को हिंदू धर्म से अलग मान्यता दे दी और हिंदुओं को बांटकर राजनीतिक लाभ लेने का कोई मौका नहीं छोड़ा।

मस्जिदों से निकलते मोदी विरोध के फतवे
जनवरी, 2017 में कोलकाता के टीपू सुल्तान मस्जिद के इमाम नूर रहमान बरकती ने प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध फतवा जारी किया। उन्होंने कहा पीएम का सिर और दाढ़ी मुड़ने वाले को 25 लाख रुपये दिए जाएंगे। इसी तरह मई 2017 में बिहार के तत्कालीन मद्य निषेध एवं उत्पाद मंत्री और कांग्रेस नेता अब्दुल जलील मस्तान ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरुद्ध आपत्तिजनक हरकत करने के लिए अपने समर्थकों को उकसाया। एक जनसभा में उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को डकैत कहा और समर्थकों से पीएम की तस्वीर को जूता मारने के लिए उकसाया। आरोप है कि यह प्रेरणा भी उन्हें स्थानीय मस्जिद से ही मिली थी।

तथाकथित बुद्धिजीवियों के फतवों का सबब
वर्ष 2015 में जिस तरीके से अवॉर्ड वापसी गैंग सक्रिय हुआ और तमाम धार्मिक मुद्दों को उठाया, यह भी एक तरह से प्रधानमंत्री मोदी के लिए फतवा ही था।  चुनाव के वक्त ये गैंग सिर्फ इसलिए सक्रिय हुआ ताकि प्रधानमंत्री मोदी के विजय रथ को बिहार और बाकी राज्यों में थामा जा सके।

सहिष्णुता जैसे शब्द सिर्फ इसलिए गढ़े गए ताकि बाकी मुद्दों से लोगों का ध्यान हटाया जा सके। जाहिर है यह तथाकथित बुद्धिजीवियों के एक विशेष वर्ग की साजिश थी।

विश्वविद्यालयों से निकलते भारत विरोध के फतवे
जेएनयू में जिस तरीके से देशद्रोह के बयान का समर्थन किया गया और उसे अभिव्यक्ति की आजादी से जोड़ा गया, ये विचित्र ही नहीं घातक है। उमर खालिद और कन्हैया गैंग के भारत तेरे टुकड़े होंगे के नारे को जिस प्रकार समर्थन मिला, वह भी चिंता की बात है। राहुल गांधी और अरविंद केजरीवाल जैसे नेताओं ने सिर्फ मोदी विरोध के लिए इस जहरीले फतवे का समर्थन किया था। जाहिर है ये फतवे जेएनयू से होते हुए कोलकाता के जाधवपुर और हैदराबाद यूनिवर्सिटी तक पहुंच गए। इसी तरह देश के कई विश्वविद्यालयों में राष्ट्रवादियों का विरोध एक परम्परा सी बनती जा रही है, जो बेहद खतरनाक है।

पत्रकारों-बुद्धिजीवियों की जुबान पर ताला क्यों?
विरोध कायदे से हो तो ठीक है, लेकिन यही विरोध जब अमर्यादित हो जाए तो बखेड़ा हो जाता है। किसी भी समाज, वर्ग, व्यक्ति विशेष को अपनी बात कहने और उस पर जवाब पाने की आजादी होनी चाहिए, लेकिन तरीका क्या हो? मोदी विरोध के लिए जिस तरीके से फतवा जारी किया जा रहा है और देश के पत्रकार और बुद्धिजीवी खामोश हैं, यह वाकई चिंता की बात है। सवाल ये खामोशी क्यों?

एक फतवा ऐसा भी…
भारत की वर्तमान राजनीति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध तो कोई भी कर सकता है, लेकिन उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यही वजह है कि जो मौलना प्रधानमंत्री की आलोचना करते नहीं थकते हैं, वो आज एक स्वर में उनके हर घर में शौचालय बनाने की मुहिम का समर्थन कर रहे हैं। मौलानाओं का फतवा है कि – शौचालय नहीं तो निकाह नहीं। हरियाणा,  हिमाचल प्रदेश और पंजाब के मौलवियों और मुफ्तियों ने फतवा जारी किया है कि वे ऐसे घरों के लड़कों का निकाह नहीं कराएंगे जिनके घरों में शौचालय नहीं हैं।

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