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जान जोखिम में डालकर आपातकाल से लड़े थे नरेंद्र मोदी

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43 साल पहले जब देश पर इमरजेंसी यानी आपातकाल थोपा गया, उस वक्त मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 25 वर्ष से भी कम उम्र के थे। गुजरात में आपातकाल विरोधी मुहिम में नरेंद्र मोदी बढ़-चढ़कर सक्रिय हो गए। देश में लोकतंत्र की दोबारा बहाली के लिए जान जोखिम में डालकर वो आंदोलन में कूद पड़े थे। नरेंद्र मोदी सरकारी निरंकुशता के विरोध के लिए गठित की गई गुजरात लोक संघर्ष समिति (GLSS) का हिस्सा थे। संगठन संभालने के उनके कौशल को देखते हुए उन्हें इस समिति का महासचिव बनाया गया जहां उनकी मुख्य भूमिका थी राज्यभर के आंदोलनकारियों को एकजुट करना। गैर कांग्रेसी चेहरों पर पुलिस की पैनी निगरानी को देखते हुए ये एक बेहद कठिन काम था लेकिन नरेंद्र मोदी शुरू से विपरीत परिस्थितियों को हैंडल करना बखूबी जानते थे। ऐसे में ये जानना जरूरी भी है और दिलचस्प भी कि जिस शख्सियत के नेतृत्व में आज विश्व में भारत का डंका बज रहा है, उसने आपातकाल के विरोध में कितनी सक्रिय भूमिका निभाई थी।

आपातकाल में कांग्रेस ने चलाया दमनचक्र
आपातकाल की कहानी शुरू होती है 12 जून 1975 से, जिस दिन चुनावों में भ्रष्ट तरीका अपनाने का आरोप साबित होने के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रायबरेली संसदीय सीट से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का निर्वाचन रद्द कर दिया था। इस फैसले के बाद अपनी सांसदी बचाने के लिए इंदिरा गांधी ने देश पर इमरजेंसी थोपने का ज्यादती भरा कदम उठा लिया। 25-26 जून की आधी रात आपातकाल लागू होने के साथ सर्वोदय नेता जयप्रकाश नारायण के अलावा मोरारजी देसाई, अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी और जॉर्ज फर्नांडीस समेत विपक्ष के हजारों नेताओं और कार्यकर्ताओं को जेलों में बंद कर दिया गया। अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोंटते हुए प्रेस पर कड़ी सेंसरशिप लागू कर दी गई।

तब गुजरात में एक ना चली थी इंदिरा गांधी की
गौर करने वाली बात है कि जिस 12 जून 1975 को इंदिरा गांधी के खिलाफ अदालती आदेश आया था, उसी दिन ये जानकारी भी आई कि गुजरात में सत्तारूढ़ कांग्रेस विधानसभा चुनावों में हार गई है। गुजरात चुनावों में इंदिरा गांधी ने तब खुद को गुजरात की बहू बताकर भी वोट मांगे थे लेकिन गुजरात की जनता उनके भ्रामक प्रचार में नहीं आई। ऐसे में इंदिरा गांधी की बौखलाहट क्या रही होगी, इसे आज भी कोई समझ सकता है।

आपातकाल के खिलाफ कई मोर्चों पर डटे थे नरेंद्र मोदी
जब आपातकाल लागू किया गया था, तब केवल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ही था जिस के पास सत्ता की भूखी कांग्रेस की ज्यादतियों को विफल करने के लिए संगठनात्मक तंत्र था और आरएसएस के सभी प्रचारक इस मकसद में सक्रिय हो चुके थे। आपातकाल लगाए जाने के फौरन बाद कांग्रेस को महसूस हुआ कि आरएसएस में कांग्रेस के अन्यायपूर्ण तरीकों पर उंगली उठाने की क्षमता है। इससे परेशान केन्द्र की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने का फैसला कर लिया। प्रतिबंध के तुरंत बाद वरिष्ठ आरएसएस नेता केशव राव देशमुख को गुजरात में गिरफ्तार कर लिया गया। यही वो प्वाइंट था जहां से नरेंद्र मोदी ने आपातकाल के खिलाफ जोरशोर से मोर्चा थामा। सरकारी दमन के खिलाफ नरेंद्र मोदी ने कई तरह की भूमिकाओं को अंजाम दिया। एक तरफ वो पुलिस के लिए वॉन्टेड चल रहे संघ के एक वरिष्ठ नेता नाथा लाल जागडा को स्कूटर पर सुरक्षित ठिकाने ले जा रहे थे तो दूसरी तरफ उन्हें गिरफ्तार हुए नेता केशव देशमुख के पास से उन दस्तावेजों को हासिल करना था जो पुलिस थाने जा चुके थे। नरेंद्र मोदी ने इसे एक चुनौती की तरह लिया और एक स्वयंसेवक बहन की मदद से दस्तावेजों को हासिल करने की योजना बनाई। योजना के अनुसार यह महिला देशमुख से मिलने के लिए पुलिस स्टेशन गई और सही समय पर, नरेंद्र मोदी की योजना के साथ उन दस्तावेजों को पुलिस स्टेशन से ले लिया गया। नरेंद्र मोदी के पास जिम्मेदारी ये भी थी कि कैसे एंटी इमरजेंसी आंदोलनकारियों के गुजरात आने और वहां से बाहर जाने के लिए यात्रा प्रबंध किये जाएं?  मोदी इस स्तर पर सक्रिय हो चुके थे कि उनके पकड़े जाने का खतरा भी हो सकता था। ऐसे में उन्होंने कई बार अपने वेश भी बदले ताकि पहचान में ना आ सकें। कभी वो एक सीधे-सादे सरदार बन जाते थे तो किसी दिन एक दाढ़ी वाले बुजुर्ग।

नरेंद्र मोदी ने निकाला सूचना भिजवाने का नायाब तरीका
आपातकाल के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता छीनी जा चुकी थी। कई पत्रकारों को मीसा और डीआईआर के तहत गिरफ्तार कर लिया गया था। सही और सच्ची जानकारी को पूरी तरह से ब्लैकआउट करने की कोशिश की जा चुकी थी। ऐसे में सूचना के प्रसार के लिए नरेंद्र मोदी और कुछ आरएसएस प्रचारकों ने इस कठिन कार्य को पूरा करने की जिम्मेदारी ली। नरेंद्र मोदी ने सूचना के प्रसार और साहित्य को वितरित करने के लिए एक नायाब तरीके को अपनाया। संविधान, कानून, कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों के बारे में जानकारी देने वाले साहित्य गुजरात से दूसरे राज्यों के लिए जाने वाली ट्रेनों में रखे गए। यह एक जोखिम भरा काम था क्योंकि रेलवे पुलिस बल को संदिग्ध लोगों को गोली मारने का निर्देश दिया गया था। लेकिन नरेंद्र मोदी और अन्य प्रचारकों द्वारा इस्तेमाल की गई तकनीक कारगर रही।

भूमिगत होकर कई नेताओं के संपर्क में आए नरेंद्र मोदी
जब पुलिस से आरएसएस की गतिविधियों के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए कहा गया था नरेंद्र मोदी ने भूमिगत रहकर आंदोलन आयोजित किया। इस समय गोपनीय बैठकें पुलिस जानकारी के बिना मणिनगर में आयोजित की जाती थीं। कांग्रेस सरकार की ज्यादतियों के खिलाफ भूमिगत आंदोलन में शामिल रहते हुए मोदी, प्रभुदास पटवारी के संपर्क में आए जिन्होंने उन्हें अपने आवास पर आने के लिए कहा। यह प्रभुदास पटवारी का निवास था जहां नरेंद्र मोदी की मुलाकात जॉर्ज फर्नांडिस से हुई जो खुद आपातकाल के खिलाफ आंदोलन में बढ़-चढ़कर शामिल थे। तब एक मुसलमान के वेश में रहे जॉर्ज फर्नांडिस ने नरेंद्र मोदी से मुलाकात में अपनी आगे की योजना के बारे में विस्तार से बताया। इसके बाद मोदी ने जॉर्ज फर्नांडिस की मुलाकात नानाजी देशमुख से करवाई। नरेंद्र मोदी और नानाजी के साथ हुई इस बैठक में जार्ज फर्नांडिस ने इंदिरा गांधी की ज्यादतियों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष शुरू करने के लिए अपनी योजना के बारे में चर्चा की, लेकिन नानाजी और नरेंद्र मोदी ने इस योजना के लिए अपनी सहमति नहीं दी। हालांकि इंदिरा गांधी की ज्यादतियां बढ़ रही थीं फिर भी नानाजी और नरेंद्र मोदी चाहते थे कि यह आंदोलन अहिंसक ही रहना चाहिए।

आपातकाल के दौरान बहुत कुछ सीखा
नरेंद्र मोदी इमरजेंसी के दौरान के अपने सबसे खास अनुभव में से एक ये भी बताते हैं कि इस दौरान उन्हें कई पार्टियों के नेताओं के साथ काम करने का मौका मिला। जून 2013 में अपने ब्लॉग में उन्होंने लिखा था: ‘’आपातकाल मेरे जैसे युवाओं के लिए अलग-अलग नेताओं और संगठनों के साथ काम करने का मौका लेकर आया, जो सभी लोकतंत्र को दोबारा बहाल करने के एक ही लक्ष्य को हासिल करने की लड़ाई लड़ रहे थे। इसने हमें अपनी-अपनी संस्थाओं से ऊपर उठकर काम करना सिखाया। ये मेरा सौभाग्य था कि इस दौरान मुझे कई प्रख्यात लोगों से बहुत कुछ सीखने को मिला। ‘’

आपातकाल में बड़ी भूमिका के बाद बढ़ीं जिम्मेदारियां
21 महीने के आपातकाल के बाद 1977 में हुए संसदीय चुनावों में इंदिरा सरकार का पतन हो चुका था। लोगों ने परिवर्तन के लिए वोट किया और केंद्र में जनता पार्टी की सरकार बनी जिसमें अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी सरीखे तत्कालीन जनसंघ के नेता महत्वपूर्ण मंत्री बनाये गए थे। आपातकाल के दौरान अपनी जबरदस्त संगठनात्मक क्षमता का परिचय कराने वाले नरेंद्र मोदी को दक्षिण और मध्य गुजरात का प्रभार सौंपते हुए संभाग प्रचारक बनाया गया। इसी दौरान उन्हें दिल्ली बुलाकर संघ के लिए आधिकारिक तौर पर आपातकाल के इतिहास को लिपिबद्ध करवाने की विशेष जिम्मेदारी भी दी गई। यानी यहीं से नरेंद्र मोदी के लिए क्षेत्रीय जिम्मेदारी के साथ राष्ट्रीय जिम्मेदारी निभाने का दौर शुरू हो चुका था।

सत्ता के लोभ में कांग्रेस ने अपनों को भुलाया
आपातकाल के दिनों में आरएसएस समर्थित संघर्ष समिति ने ‘मुक्ति ज्योति’ यात्रा का भी आयोजन किया। यह एक साइकिल यात्रा थी जिसमें कई प्रचारकों ने भाग लिया और लोकतंत्र के संदेश को एक जगह से दूसरी जगह ले गए। बहुत कम लोग जानते हैं कि इस यात्रा को नाडियाड में जिसके द्वारा झंडी दिखाकर रवाना किया गया वो और कोई नहीं बल्कि सरदार वल्लभ भाई पटेल की बेटी मणी बेन पटेल थीं। यह एक विडंबना ही है कि इस देश में नेहरू गांधी परिवार की हर पीढ़ी के बारे में लोग जानते हैं वहीं स्वतंत्रता आंदोलन के अन्य दिग्गजों के परिवार वालों को जान-बूझकर किनारे रखा गया। जो कांग्रेस स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ी पार्टी होने का दावा करती है, उसी ने मणी बेन पटेल जैसों को नजरअंदाज कर दिया।

इंदिरा ने आपातकाल में आकाशवाणी को बनाया प्रचार तंत्र
आपातकाल में इंदिरा गांधी ऑल इंडिया रेडियो यानी आकाशवाणी का अपनी प्रचार मशीन के रूप में अधिक से अधिक इस्तेमाल कर रही थीं। कांग्रेस के द्वारा यह सत्ता का दुरुपयोग ही था जब इंदिरा गांधी ने गुजरात के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बाबूभाई पटेल को, 15 अगस्त के अवसर पर ऑल इंडिया रेडियो में प्रसारित होने जा रहे उनके संभावित भाषण को सेंसर करने के लिए कहा था। उन दिनों मुख्यमंत्री ऑल इंडिया रेडियो के माध्यम से 15 अगस्त को अपने राज्यों के लिए संदेश भेजते थे।

आपातकाल नहीं अब रेडियो पर देशवासियों से मन की बात
दमन के दौर चलाने वाली पार्टी आज लोकसभा में 44 के आंकड़े पर सिमट चुकी है। कभी जिस रेडियो पर इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल लगाने का एलान किया था..आज उसी रेडियो पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देशवासियों से मन की बात करते हैं। आपातकाल के खिलाफ संघर्ष के पथ से तपकर निकले नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश आज लोकतंत्र की खुली हवा में विकास की नई गाथाएं लिख रहा है।

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