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देश में तानाशाही तो आपके परिवार और कांग्रेस पार्टी ने चलाई है राहुल जी!

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कांग्रेस पार्टी देश की सबसे पुरानी पार्टी है और करीब 60 वर्षों तक इसी पार्टी ने देश में राज किया है। कांग्रेस पार्टी का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है देश की सत्ता हासिल करना। नेहरू-गांधी परिवार के सदस्य हों या दूसरे कांग्रेसी नेता इनके डीएनए में है, किसी भी तरह से सत्ता हथियाओ और फिर अपनी तानाशाही चलाओ। कांग्रेस के डीएनए में है, चाहे दंगे भड़काओ, चाहे विरोधियों को जेल में डालो, चाहे देश के लोगों को आपस में लड़ाओ, किसी भी कीमत पर सत्ता पर कब्जा करो।

राहुल गांधी ने भारत की पाकिस्तान से तुलना की
हाल ही में कर्नाटक के विधानसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने भारत के राजनीतिक हालात की तुलना पाकिस्तान से की। उन्होंने कहा कि भारत में पाकिस्तान की तरह तानाशाही की जा रही है। राहुल गांधी ने कहा ‘पहली बार 70 साल में आपने देखा होगा, आम तौर से जनता सुप्रीम कोर्ट की ओर जाती है, न्याय के लिए, कानून की जरूरत होती है, तो जनता कोर्ट जाती है। पहली बार आपने देखा होगा कि सुप्रीम कोर्ट के जज जनता के बीच जाकर खड़े होकर कहते हैं कि हमें डराया और धमकाया जा रहा है, शायद ये पहली बार डेमोक्रेटिक देश में हुआ है। ऐसा डिक्टेटरशिप में जरूर होता है। पाकिस्तान में हुआ है। अफ्रीका के अलग -2 देश में हुआ है।’

कांग्रेस के गुनाहों को भूल गए राहुल गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने जब ये बयान दिया तो वो अपने परिवार और अपनी पार्टी के काले कारनामों को भूल गए। राहुल गांधी यह भूल गए कि किस तरह पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी और यूपीए चेयरपर्सन रही सोनिया गांधी ने अपने स्वार्थों के लिए मनमानी की। भारत एक लोकतांत्रिक देश है और पूरी दुनिया में भारतीय लोकतंत्र की मिसाल दी जाती है, लेकिन राहुल गांधी ने ऐसा बयान देकर देश की अस्मिता के साथ खिलवाड़ किया है। कोई बात नहीं राहुल गांधी इन बातों को जरूर भूल गए, लेकिन देश उन बातों को नहीं भूल पाया है। आज भी देशवासियों के जेहन में इमरजेंसी की यादें ताजा हैं। हम आपको बताते हैं कांग्रेस और नेहरू-गांधी परिवार के एक-एक गुनाह, जो सत्ता पाने के लिए किए गए।

कांग्रेस ने देश की अखंडता को दांव पर लगाया
कश्मीर को धारा 370 के जरिये देश की मुख्यधारा से जुड़ने नहीं देने का गुनाह कांग्रेस पार्टी पर है। वहीं दक्षिण में द्रविड़नाडु जैसे आंदोलन, जो देश को उत्तर और दक्षिण भारत को अलग करने की मंशा से चलाए गए थे, कांग्रेस ने शह दी थी। अभी कर्नाटक में अलग झंडे को कांग्रेस ने मंजूरी देकर देश में अलगावाद की नई आवाज को हौसला दिया है। इसी तरह पूर्वोत्तर क्षेत्रों में आबादी का संतुलन बिगाड़कर देश के टुकड़े-टुकड़े करने की मंशा से कांग्रेस ने लगातार राजनीति की है।

1975 में इमरजेंसी लगाई थी इंदिरा गांधी ने
कांग्रेस पार्टी और उसके नेता अपनी मनमानी के लिए किस हद तक जा सकते हैं, उसकी सबसे बड़ी मिसाल है 1975 में लगाई गई इमरजेंसी। तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने अपने तानाशाही दिखाते हुए 25 जून, 1975 की रात को इमरजेंसी लगा दी थी। फ्रीडम ऑफ स्पीच पर रोक लगाते हुए उस वक्त जनता की आवाज उठाने वाले साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी, राजनेता, समाजसेवियों को जेल में डाल दिया गया था। उस दौर को भारतीय राजनीति के काले अध्याय के रूप में याद किया जाता है। शायद राहुल गांधी को अपनी दादी के इस कारनामे की याद नहीं है, अगर उन्हें यह सब याद होता तो कभी भी भारत की मौजूद राजनीति की तुलना पाकिस्तान से नहीं करते।

न्यायपालिका को अपने मुताबिक चलाया कांग्रेस ने
कांग्रेस पार्टी ने अपने फायदे के लिए न्यायपालिका की स्वतंत्रता से भी खिलवाड़ किया है। अतीत पर नजर डालें तो कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकारों ने हर मौके पर सर्वोच्च न्यायालय के इस अधिकार को कमजोर करने का प्रयास किया है। नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी तक सभी ने जब मौका मिला सर्वोच्च न्यायालय की गरिमा को ठेस पहुंचाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का प्रयास-
• पहली बार प्रयास उस समय किया जब सर्वोच्च न्यायलय के प्रमुख न्यायधीश हरीलाल कानिया की मृत्यु 6 नवंबर 1951 को पद पर रहते ही हो गई, और उस समय सर्वोच्च न्यायलय के सबसे वरिष्ठ न्यायधीश पंतजलि शास्त्री को प्रधानमंत्री नेहरू मुख्य न्यायधीश नहीं बनाना चहते थे। इस बात का पता चलते ही, सर्वोच्च न्यायलय के सभी वरिष्ठ न्यायधीशों ने ऐसा किए जाने पर प्रधानमंत्री नेहरू को इस्तीफा देने की धमकी दी तब पंतजलि शास्त्री को मुख्य न्यायधीश बनाया गया।
• दूसरी बार प्रयास नेहरू ने उस समय किया जब मुख्य न्यायाधीश पंतजलि शास्त्री 3 जनवरी 1954 को रिटायर होने वाले थे । न्यायाधीश शास्त्री के बाद न्यायाधीश मेहर चंद महाजन सर्वोच्च न्यायलय में वरिष्ठ न्यायाधीश थे, लेकिन प्रधामंत्री नेहरू चाहते थे कि महाजन के बाद के वरिष्ठ न्यायाधीश बिजन कुमार मुखर्जी मुख्य न्यायाधीश बनें। प्रधानमंत्री नेहरु ने मुखर्जी से मुख्य न्यायाधीश बनने का कई बार आग्रह किया लेकिन आखिर में न्यायाधीश मुखर्जी को प्रधानमंत्री नेहरू को जवाब देना पड़ा कि अगर वह अधिक दबाब डालेंगे तो उन्हें इस्तीफा देना पड़ेगा। आखिर में मेहर चंद महाजन को मुख्य न्यायाधीश बनाना पड़ा।

इंदिरा गांधी का प्रयास– प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, कई बार अपने मनमाफिक सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीश की नियुक्ति करने में असमर्थ रहे थे, लेकिन उनकी बेटी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ऐसा करने में सफल रहीं। उन्होंने अपने मनमाफिक सर्वोच्च न्यायलय के न्यायाधीशों और मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्तियां कीं। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने कई बार सर्वोच्च न्यायलय की स्वतंत्रता का हनन किया-
• पहली बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अपनी मनपसंद के न्यायाधीश ए एन रे को सर्वोच्च न्यायलय का मुख्य न्यायाधीश बनाया। ए एन रे उन 13 न्यायाधीशों की संविधानपीठ के सदस्य थे, जिसने केशवानंद भारती मामले में 24 अप्रैल 1973 को संसद को संविधान संशोधन करने की शक्ति वापस की थी। इस मामले में निर्णय आने के ठीक एक दिन बाद ए एन रे को तीन वरिष्ठ न्यायधीशों को नजरदांज करते हुए मुख्य न्यायाधीश बना दिया गया।
• दूसरी बार प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान 29 जनवरी 1977 को न्यायाधीश एम.एच.बेग को वरिष्ठ न्यायाधीश एच आर खन्ना को नजरदांज करके मुख्य न्यायाधीश बनाया। प्रधामंत्री इंदिरा गांधी के इस कदम के बाद न्यायाधीश खन्ना ने इस्तीफा दे दिया।
• इंदिरा गांधी ने न्यायाधीश एच आर खन्ना को इसलिए यह सजा दी कि उन्होंने जबलपुर एडीएम के मामले में 28 अप्रैल 1976 को यह फैसला दिया था कि आपातकाल के दौरान भी नागरिकों के मौलिक अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते हैं। मुख्य न्यायाधीश ए एन रे, एम एच बेग, वाई वी चंद्रचूड़ और पी एन भगवती ने कहा कि आपातकाल के दौरान नागरिकों के अधिकार भी समाप्त हो जाते हैं। सर्वोच्च न्यायलय के इस निर्णय के बल पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल के दौरान जबरदस्त मनमानी की

राजीव गांधी का प्रयास– प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी जब प्रधानमंत्री बने तो उन्होंने ने भी अपने प्रचंड बहुमत का उपयोग करते हुए, सर्वोच्च न्यायलय के निर्णय को पलट दिया।
• अप्रैल 1985 में सर्वोच्च न्यायलय ने शाहबानो मामले में निर्णय दिया कि तलाक के बाद मुस्लिम महिला को अपने पूर्व पति से गुजारा भत्ता मिलना, महिला का अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय को मुस्लिम वोट बैंक के दबाब में आकर 1986 में कानून बनाकर पलट दिया गया।
• राजीव गांधी की सरकार के दौरान एडीएम जबलपुर मामले में इंदिरा गांधी सरकार के हक में फैसला देने वाले तीनों न्यायाधीश एम एच बेग, वाई वी चंद्रचूड और पी एन भगवती ही मुख्य न्यायाधीश बने।
6 अक्टूबर 1993 में Second Judges मामले में आए फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायाधीशों के नियुक्ति और स्थानांतरण की सभी शक्तियां एक कॉलेजियम के हाथों में दे दी।इस देश में, सर्वोच्च न्यायालय के अधिकारों के साथ खिलवाड़ करने का काम सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस की सरकारों ने किया है, जिसका बुरा प्रभाव आज तक देश भुगत रहा है।

अपने फायदे के लिए देश में दंगा करवाती रही है कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी के दामन पर अपने फायदे के लिए देश में कई दंगे करवाने के दाग हैं। सियासी फायदे के लिए कांग्रेस पार्टी और उसकी सरकारें कभी गोवध के नाम पर तो कभी धार्मिक जुलूस के नाम पर कांग्रेस देश में दंगा करवाती रही हैं।
• 1964 के राउरकेला और जमशेदपुर के दंगे में 2000 मासूम लोगों ने अपनी जान गंवाई और उस समय कांग्रेस की सरकार थी।
• 1967 के रांची दंगे में 200 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया यहां भी कांग्रेस की सत्ता|
• 1980 में मोरादाबाद के दंगा में 2000 लोग मारे गए, वहां भी कांग्रेस की सरकार थी।
• 1984 में दिल्ली में सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2733 लोगों को मौत के घाट उतारा गया।
• 1985 में अहमदाबाद में 300 लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया, यहां भी कांग्रेस शासन में थी।
• 1989 में भागलपुर दंगा तो अभी भी लोगों के जेहन में है, जहां 1000 से अधिक लोग मारे गए और कांग्रेस की सरकार के नाक के नीचे नरसंहार किए गए।

धर्म के नाम पर भेदभाव करती रही है कांग्रेस
यह हमेशा देखा गया है कि कांग्रेस की सरकारों ने धर्म के आधार पर हिंदुओं के साथ भेदभाव करती है।
• 2005 में सोनिया गांधी के दबाव में मनमोहन सिंह सरकार ने संविधान में 93वें संशोधन के जरिए अनुसूचित जाति और जनजाति को भी यह छूट दिलवा दी।
• इस संशोधन का मतलब था कि सरकार किसी हिंदू के शिक्षा संस्थान को कब्जे में ले सकती है, लेकिन अल्पसंख्यकों और हिंदुओं की अनुसूचित जाति और जनजाति के संस्थानों को छू भी नहीं सकती।
• आम संस्थानों को 25 प्रतिशत गरीब छात्रों को दाखिला देना जरूरी कर दिया गया, जबकि अल्पसंख्यक संस्थानों पर ऐसी कोई बाध्यता नहीं है। यहां तक कि उन्हें अनुसूचित जाति और जनजातियों को आरक्षण देना भी जरूरी नहीं किया गया।
• सोनिया-मनमोहन की सरकार ने जब शिक्षा का अधिकार लागू किया तो उसके नियमों में ऐसी चालबाजी की गई कि देश में हिंदुओं के शिक्षा संस्थान धीरे-धीरे पूरी तरह खत्म हो जाएं। आज हालत ये है कि केरल में 14 में से 12 प्राइवेट मेडिकल कॉलेज मुस्लिम संस्थाओं के हैं।

हिंदुओं को अपमानित करती रही है कांग्रेस
हिंदू समुदाय को जातियों में बांटने के साथ ही कांग्रेस ने हमेशा बहुसंख्यकों को अपमानित करने का काम भी किया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी अपनी किताब ‘द कोलिशन इयर्स’ में ये खुलासा किया है कि 2004 में शंकराचार्य की गिरफ्तारी के पीछे सोनिया गांधी हाथ था और इसके मूल में हिंदू विरोध की साजिश रही है।
• इसी तरह समझौता ब्लास्ट केस में भगवा आतंकवाद शब्द का गढ़ा जाना भी कांग्रेस की साजिश है।
• प्रभु राम के अस्तित्व को ही नहीं मानने का हलफनामा सुप्रीम कोर्ट में देकर कांग्रेस ने 100 करोड़ हिंदुओं की आस्था पर आघात किया।
• तीन तलाक के मामले में सुनवाई के दौरान प्रभु राम की आस्था की तुलना कर कांग्रेस के वकील कपिल सिब्बल ने हिंदुओं का अपमान किया।

हिंदुओं को जाति में बांटती रही है कांग्रेस
कांग्रेस की ‘कुटिल’ राजनीति का सबसे अधिक खामियाजा हिंदू समुदाय को भुगतना पड़ रहा है। दरअसल कांग्रेस ने इस समुदाय को जातियों के जंजाल में इतना उलझा दिया है कि वह इससे छुटकारा नहीं पा रहा है। जाट, यादव, बाल्मीकि, जाटव, खटीक, पंडित, कुम्हार, राजपूत, ठाकुर, जैन, बौद्ध, सिख, भूमिहार, नाई, कायस्थ, तेली, लोहार, निषाद, बनिया जैसी जातियों को आपस में बांटकर हमेशा हिंदू समुदाय को कमजोर करने का काम किया है। समाज में इन जातियों को एक दूसरे के पूरक होने की सनातन परंपरा को तार-तार कर कांग्रेस ने हमेशा बांटकर रखा है और अपनी राजनीति चमकाई है। हाल में ही देखें तो गुजरात में पटेल, राजस्थान में गुर्जर, महाराष्ट्र में मराठा, हरियाणा में जाट और यूपी में दलितों के नाम पर साजिशें रचीं।कर्नाटक सरकार द्वारा लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया जाना और वीर शैव को अल्पसंख्यक का दर्जा दिया जाना कांग्रेस की हिंदुओं को बांटने वाली राजनीति का ही हिस्सा है।

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