Home बिहार विशेष कांग्रेस शासन में कर्नाटक का हुआ विनाश, बेंगलुरु की पहचान हुई खत्म!

कांग्रेस शासन में कर्नाटक का हुआ विनाश, बेंगलुरु की पहचान हुई खत्म!

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कर्नाटक में विधानसभा चुनाव नजदीक आने के साथ ही सिद्धारमैया सरकार की पोल खुलती जा रही है। चुनाव में कांग्रेस सरकार की साख कसौटी पर है और लोग प्रचार में विकास का दावा करने वाले कांग्रेसी नेताओं से सवाल पूछ रहे हैं। अब कांग्रेस सरकार ने कोई विकास का काम किया हो तो बताएं, इसलिए वहां सिर्फ आरोप की राजनीति हो रही है। हकीकत ये है कि पांच वर्षों में कर्नाटक विकास में काफी पिछड़ गया है। चाहे उद्योग धंधों की बात हो, या फिर कृषि की, हर क्षेत्र में राज्य पिछड़ रहा है। सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार चरम पर पहुंच गया है और राज्य पर कर्ज बढ़ता जा रहा है। कभी सिलिकॉन वैली के तौर पर मशहूर बेंगलुरु शहर आज अपनी पहचान खो रहा है। राज्य में अपराध का ग्राफ बढ़ा है। सिद्धारमैया सरकार की मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं को बांटने की राजनीति की वजह से राज्य में भेदभाव बढ़ा है। कह सकते हैं कि कांग्रेस पार्टी की सरकार ने कर्नाटक को विनाश के रास्ते पर धकेल दिया है।

बेंगलुरु शहर का किया सत्यानाश
बेंगलुरु शहर पूरी दुनिया में सिलिकॉन वेली के रूप में विख्यात है। पांच साल पहले यहां के आईटी उद्योग की पूरी दुनिया में धाक थी, लेकिन कांग्रेस सरकार के आने के बाद इसकी पहचान धूल में मिल गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बेंगलुरु की चुनावी रैली में इसका जिक्र किया था। बेंगलुरु की जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि कांग्रेस ने बेंगलुरु को पांच ‘तोहफे’ दिए हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि कर्नाटक के युवकों ने बेंगलुरु को ‘Silicon Valley’ बनाया, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसे ‘Valley of Sin’ बना दिया। बेंगलुरु की पहचान ‘Garden City’ की है, लेकिन कांग्रेस ने इसे ‘Garbage City’ बना दिया। बेंगलुरु के युवाओं ने इसे ‘Computer Capital’ बनाया, लेकिन यहां की सरकार ने इसे ‘Crime Capital’ में बदल दिया। बेंगलुरु शहर की पहचान एक ‘Cosmopolitan Culture’ के रूप में है, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसे ‘Culture of Chaos’ बना दिया। यहां के युवाओं ने बेंगलुरु को ‘Start-up Hub’ हब बनाया, लेकिन कांग्रेस सरकार ने इसे ‘Pothole Club‘ बनाकर छोड़ दिया है।

इतना ही नहीं लेक सिटी के रूप में पहचाना जाने वाला बेंगलुरु शहर इस पहचान को भी खोता जा रहा है। आज प्रदूषण की वजह से झील में केमिकल का प्रवाह हो रहा है, इसलिए झील के बड़े हिस्से में आग लगी रहती है, यानी यह बर्निंग लेक सिटी बनता जा रहा है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बेंगलुरु में करीब 900 एकड़ में फैली बेलंदूर झील में करीब 50 करोड़ लीटर सीवर का पानी रोज गिरता है। प्रदूषण बोर्ड का कहना है कि इस झील में जलीय जीवन पूरी तरह खत्म हो चुका है। शहर की ज्यादातर दूसरी झीलों का हाल इससे जुदा नहीं। कांग्रेस सरकार में हो रहे विनाश का यह एक उदाहरण है।

बेंगलुरू शहर में अपराध बढ़ा
बेंगलुरु शहर का कल्चर पहले ऐसा था कि दिन हो या रात कभी भी सड़क पर निकलने में डर नहीं ता। लेकिन 2013 में कांग्रेस की सरकार आने के बाद से शहर में अपराध लगातार बढ़ता जा रहा है। चाहे महिलाओं के प्रति अपराध की बात हो,या फिर हत्या की, साइबर क्राइम की बात हो या फिर अपहरण की, हर मामले में यह शहर अनसेफ हो गया है।

एक सर्वे ने खोली सीएम सिद्धारमैया के विकास की पोल
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु अर्बन गवर्नेंस के मामले में काफी पिछड़ा हुआ है। गैर सरकारी संगठन जनाग्रह सेंटर फोर सिटीजनशिप एंड डेमोक्रेसी का सर्वे कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विकास के दावों की पोल खोलने वाला है। 2017 के लिए भारत में शहरी प्रणाली के वार्षिक सर्वेक्षण में देश के 20 राज्यों के जिन प्रमुख 23 शहरों को शामिल किया गया था, उनमें बैंगलुरू सबसे निचले स्थान पर है।

सौजन्य

सर्वेक्षण के मुताबिक शहरी प्रशासन के मामले में पुणे सबसे बेहतर और देश की आईटी कैपिटल के रुप में विख्यात बैंगलुरु सबसे खराब शहर है। इस सर्वेक्षण में सभी शहरों को 10 में 3 और 5.1 के बीच अंक आए हैं। हैरानी की बात यह है कि बैंगलुरू को 3 अंक मिले हैं जो सबसे कम हैं। जबकि टॉप रहने वाले पुणे को 5.1 अंक मिले हैं।

सौजन्य

सर्वेक्षण के मुताबिक बैंगलुरू में में बृहत बैंगलुरू महानगर पालिका यानी बीबीएमपी द्वारा नागरिक सुविधाओं पर कुछ भी खर्च नहीं किया जा रहा है। बीबीएमपी में भारी वित्तीय अनियमितिताएं हैं और इन गड़बड़ियों से निपटने के लिए सरकार कोई प्रभावी कदम नहीं उठा रही है। सर्वे के अनुसार बैंगलुरू में प्रति नागरिक के हिसाब से स्वच्छता पर सबसे कम पैसा खर्च किया जाता है। यही वजह है कि 2017 में बैंगलुरू सबसे निचले स्थान पर आ गया।

आपको बता दें कि कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया हमेशा यह दावा करते रहे हैं कि उन्होंने बेंगलुरु में बहुत विकास किया है। ताजा सर्वे इन दावों को खोखला साबित कर रहा है। बेंगलुरु के लोग भी सिद्धारमैया के दावों को झूठा बताते हैं।

किसानों के नाम पर सिद्धारमैया ने किया सिर्फ छलावा
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव के लिए प्रचार चरम पर है। सत्ताधारी कांग्रेस पार्टी के नेता और मुख्यमंत्री सिद्धारमैया राज्य में किसान कल्याण के नाम पर वोट मांग रहे हैं। सिद्धारमैया का दावा है कि उनकी सरकार ने ‘कृषि भाग्य’ जैसी योजनाओं के माध्यम से किसानों के हित में काफी काम किए हैं, लेकिन सच्चाई इसके उलट है। पांच वर्षों के सिद्धारमैया सरकार के कार्यकाल में किसानों की हालत बद से बदतर हुई है। सूखे की मार और कर्ज में डूबे किसानों ने बड़ी संख्या में खुदकुशी की है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि किसानों की इतनी दुर्दशा के बाद भी मुख्यमंत्री सिद्धारमैया पांच वर्षों तक ऐशोआराम में जीते रहे और जनता की गाढ़ी कमाई जरूरतमंदों पर खर्च करने के बजाए अपनी शानोशौकत में उड़ाते रहे।

कर्नाटक में आत्महत्या को मजबूर किसान
राज्य के किसानों की माली हालत मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। कर्नाटक के किसानों द्वारा आत्महत्या के आंकड़ों में बढ़ोतरी इस बात की गवाह है कि कांग्रेस सरकार ने राज्य के किसानों के लिए कुछ भी नहीं किया है। राज्य के कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक कर्नाटक में अप्रैल 2013 से नवंबर 2017 के बीच 3,515 किसानों ने खुदकुशी की है। इनमें से 2,525 मामलों में किसानों ने सूखा और फसल के उचित दाम नहीं मिलने के चलते आत्महत्या की है।

लोकसभा में किसानों की आत्महत्या से जुड़े एक सवाल के जवाब में कर्नाटक में 2013 से 2016 के बीच खुदकुशी के जो आंकड़े बताए गए थे, उनके मुताबिक कर्नाटक में खेती-किसानी से जुड़े करीब 6 हजार लोगों ने खुदकुशी की है।

              कर्नाटक में किसानों की खुदकुशी
वर्ष आत्महत्या करने वाले किसान
2013 1403
2014 768
2015 1569
2016 2079
स्रोत- लोकसभा में दिया गया जवाब

 

             2016 में किसानों की खुदकुशी
राज्य आत्महत्या करने वाले किसान
कर्नाटक 2079
आंध्र प्रदेश 804
तेलंगाना 645
तमिलनाडु 381
स्रोत- लोकसभा में दिया गया जवाब

उपरोक्त आंकड़ों से साफ है कि यदि 2014 को छोड़ दें तो कर्नाटक में किसानों की खुदकुशी के मामले साल दर साल बढ़ते गए। किसानों की खुदकुशी के लिए सिर्फ बारिश की कमी और सूखे को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। ऐसा इसलिए, क्यों कि दक्षिण भारत में कर्नाटक के पड़ोसी राज्यों में किसानों की खुदकुशी की संख्या बेहद कम है, जबकि इन राज्यों में भी मौसम का हाल कमोबेश कर्नाटक की तरह ही रहता है।

कर्नाटक में कृषि सेक्टर की ग्रोथ कम हुई
कर्नाटक में खेती-किसानी को लेकर सिद्धारमैया सरकार के लचर रवैये के कारण कृषि और इससे जुड़े क्षेत्रों की वृद्धि नहीं हो सकी है। 2017-18 के कर्नाटक के इकोनॉमिक सर्वे के मुताबिक कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत रही, जबकि 2016-17 में यह 5.7 प्रतिशत थी। बताया जा रहा है कि कर्नाटक सरकार की नीतियों की वजह से ही वहां के किसान ने तूर और धान के रकबे में कमी कर दी थी। 2016-17 में जहां 3 लाख हैक्टेयर में खरीफ की फसल की बुआई हुई थी वहीं 2017-18 में यह घटकर करीब 2 लाख हैक्टेयर ही रह गया।

कृषि सुधार में भी कर्नाटक फिसड्डी
2016 में नीति आयोग ने “Agricultural Marketing and Farmer Friendly Reforms Index” जारी किया था, जिसमें कृषि बाजार सुधार, लैंड लीज सुधार और निजी भूमि पर वन लगाने से जुड़े सुधारों पर फोकस किया गया था। इस सूची में जहां महाराष्ट्र, गुजरात और राजस्थान पहले तीन स्थानों पर थे वहीं कर्नाटक का नंबर आठवां था।

किसान कर्जमाफी के नाम पर दिखावा
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने 2017 में किसानों के लिए 8,165 करोड़ की कर्जमाफी का ऐलान किया था, लेकिन इसमें शर्त थी कि उन्हीं किसानों की कर्जमाफी की जाएगी, जिन्होंने सहकारी बैंकों से फसलों के लिए कर्ज लिया था। अब आपको बताते हैं किस तरह सिद्धारमैया ने किसान कर्जमाफी के नाम पर सिर्फ दिखावा किया है। महाराष्ट्र ने किसान कर्जमाफी के लिए 30,500 करोड़ रुपये का ऐलान किया है, इससे 30 लाख किसानों को फायदा हुआ। वहीं उत्तर प्रदेश में योगी सरकार ने 36,359 करोड़ की कर्जामाफी का ऐलान किया है, इससे 80 लाख से अधिक किसानों को फायदा होगा। मतलब साफ है कि मुख्यमंत्री सिद्धारमैया किसानों के कल्याण का जो दावा कर रहे हैं, वह खोखला है। सिद्धारमैया सरकार में किसानों की हालत बद से बदतर हुई है, यही सच्चाई है।

झूठे दावे करना और लोगों को बरगलाना मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की फितरत है। इससे पहले भी अधूरी परियोजनाओं का लोकार्पण कर जनता की आंखों की धूल झोंक चुके हैं। चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के नेता हर हथकंडा अपनाने को तैयार है, फिर चाहे वो हिंदुओं को बांटना हो या फिर मुस्लिम तुष्टिकरण। एक नजर डालते हैं सिद्धारमैया सरकार के कारनामों पर।

कर्नाटक में लोगों की जान जोखिम में डालते सिद्धारमैया
कर्नाटक में विधानसभा चुनाव से पहले सिद्धारमैया सरकार ने जबदस्त तरीके से शिलान्यास और उद्घाटन का खेल खेला। पांच वर्षों में कर्नाटक में क्या हुआ यह किसी से छिपा नहीं है। सिद्धारमैया के शासन में आम आदमी बेहाल हुआ है, किसानों की हालत खराब हुई है। चुनाव सिर पर खड़े थे तो सीएम सिद्धारमैया और उनके मंत्रिमंडल के सहयोगी धड़ाधड़ा अधूरी परियोजनाओं का उद्घाटन करने में लगे रहे। अधूरी परियोजनाओं को शुरू करने की वजह से राज्य के लोगों की जान पर बन आई। इतना ही नहीं कर्नाटक सरकार कई नई योजनाएं भी लांच की। चुनाव से पहले कर्नाटक के सभी शहरों में उद्घाटन और शिलान्यास कर जनता को गुमराह करने की कोशिश की गई।

अधूरे सिग्नल फ्री कॉरिडोर का उद्घाटन
एक मार्च 2018 को सीएम सिद्धारमैया ने बैंगलुरू में ओकलीपुरम-यशवंतपुर सिग्नल फ्री कॉरिडोर का उद्घाटन किया था। बताया जा रहा है कि यह प्रोजेक्ट अभी सिर्फ 65 प्रतिशत ही पूरा हुआ है।

बैंगलुरू में निर्माणाधीन फ्लाईओवर का उद्घाटन
4 मार्च, 2018 को सीएम सिद्धारमैया ने बैंगलुरू में करीब एक किलोमीटर लंबे Hennur flyover का उद्घाटन किया था। 920 मीटर लंबे इस फ्लाईओवर का काम अभी पूरा नहीं हुआ है और 9 सालों से लटका हुआ है।

सीएम ने किया अधूरी सड़क का उद्घाटन
4 मार्च को ही मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने बेगुर से केंपेगौडा अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे के लिए वैकल्पिक सड़क का भी उद्घाटन किया था। यह सड़क भी अभी पूरी तरह नहीं बनी है।

केंगेरी में अधूरे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का उद्घाटन
14 मार्च को सीएम सिद्धारमैया ने बैंगलुरू के केंगेरी में 60 एमएलडी क्षमता वाले सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का उद्घाटन किया था। बताया जा रहा है कि यह प्लांट अभी बन ही रहा है और इसे शुरू करने में कई महीने लग सकते हैं।

कारवर में अर्धनिर्मित रॉक गार्डन का उद्घाटन
सिर्फ बैंगलुरू ही नहीं, अधूरी परियोजनाओं के उद्घाटन का सिलसिला पूरे राज्य में जारी है। हाल ही में कर्नाटक के उद्योग मंत्री आर वी देशपांडे ने कारवर शहर में रवींद्रनाथ टैगोर बीच पर निर्मित रॉक गार्डन का उद्घाटन किया था। इस रॉक गार्डन का निर्माण अभी जारी है।

उत्तर कन्नड़ जिले में ‘canopy walk’ का उद्घाटन
18 फरवरी, 2018 को उत्तर कन्नड़ जिले के कुवेशी क्षेत्र में देश के पहले ‘canopy walk’ का उद्घाटन किया गया था। यह परियोजना भी अभी पूरी तरह नहीं बनी है। यहां पर्यटकों के लिए पानी और टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधाएं भी अभी उपलब्ध नहीं हैं।

कालाबुर्गी में तालुका का उद्घाटन
कर्नाटक सरकार में मंत्री शरन प्रकाश पाटिल ने 10 मार्च को कालाबुर्गी जिले में नवगठित कालागी और कमालपुर तालुका और 11 मार्च को यदरामी और शाहाबाद तालुका का उद्घाटन किया था। हकीकत यह है कि इन तालुकाओं के ऑफिस में अभी पर्याप्त संसाधन नहीं है, कई विभागों में कर्मचारियों की तैनाती भी नहीं हुई है।

कालाबुर्गी में निर्माणाधीन ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन
कालाबुर्गी जिले में ही 28 फरवरी, 2018 को राज्य के मंत्री शरन प्रकाश पाटिल ने अधूरे बने ट्रॉमा सेंटर का उद्घाटन किया था।

मंगलुरू में मोटर बोट का उद्घाटन
हाल ही में राज्य सरकार में खाद्य और नगरिक आपूर्ति मंत्री यू टी खादर ने मंगलूरू जिले में पवूर उलिया द्वीप के निवासियों के लिए मोटर बोट का उद्घाटन किया था। बताया जा रहा है कि आधी-अधूरी सुविधायों के साथ इस मोटर बोट को चला दिया गया है, जो कभी भी बड़े हादसे का सबब बन सकती है

उडुपी में सीता नदी पर बने पुल का दो बार उद्घाटन
चुनाव से पहले उद्घाटन की जल्दबादी में लगी कर्नाटक सरकार ने उडुपी जिले में सीता नदी पर बने पुल का डेढ़ महीन के भीतर दो बार उद्घाटन कर दिया। यह पुल दिसंबर 2017 में बनकर तैयार हुआ था।

उडुपी में भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम का शिलान्यास
अधूरे प्रोजेक्ट का उद्घाटन ही नहीं, कर्नाटक सरकार धड़ाधड़ शिलान्यास करने में भी जुटी है। इसी वर्ष 8 जनवरी को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उडुपी शहर में भूमिगत ड्रेनेज सिस्टम और पानी की पाइपलाइन बिछाने की परियोजनाओं का शिलान्यास किया था। दो महीने से ज्यादा गुजरने के बाद भी इन परियोजनाओं के लिए टेंडर भी जारी नहीं किए गए हैं।

हावेरी में नगर पालिका परिषद भवन का उद्घाटन
कर्नाटक सरकार में मंत्री रुद्रप्पा लमानी कुछ दिन पहले 4 करोड़ की लागत से बन रहे निर्माणाधीन नगर पालिका परिषद भवन का उद्घाटन करने वाले थे, लेकिन बीजेपी पार्षदों के विरोध के कारण यह उद्घाटन कार्यक्रम स्थगित कर दिया गया। अब इस भवन का पूरा बनने के बाद ही उद्घाटन किया जाएगा।

सविरुचि मोबाइल कैंटीन योजना लांच
अपने आखिरी दिनों में कर्नाटक की कांग्रेस सरकार नई योजनाओं को लांच करने में भी जुटी रही। 27 फरवरी, 2018 को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सविरुचि मोबाइल कैंटीन योजना लांच की। इसके साथ ही मुख्यमंत्री ने दिव्यांगों को दुपहिया वाहन भी बांटे थे।

यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज योजना ‘आरोग्य कर्नाटक’ लांच
2 मार्च 2018 को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने यूनिवर्सल हेल्थ कवरेज योजना ‘आरोग्य कर्नाटक’ लांच की थी। इस योजना के तहत तहत राज्य के 1.43 करोड़ परिवारों को लाभ पहुंचेगा और इससे सरकार पर प्रतिवर्ष 1,011 करोड़ का बोझ पड़ेगा। हालांकि जिस राज्य में एक-दो महीने में चुनाव होने वाले हैं, वहां ऐसी योजनाओं शुरू करने का कोई औचित्य समझ में नहीं आता है।

ये तो थी उद्घाटन और शिलान्यास की बात, इसके अलावा सिद्धारमैया राज्य में हिंदुओं को बांटने और मुस्लिम तुष्टिकरण में भी लगे रहे हैं। देखिए-

तुष्टिकरण की राजनीति में लगी राज्य सरकार
कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के पास विकास के नाम पर तो कुछ दिखाने के लिए है नहीं, ऐसे में वो चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस पार्टी के पुराने हथकंडे, मुस्लिम तुष्टिकरण को हवा देने में लगे रहे। कर्नाटक में एक तरफ टीपू सुल्तान को लेकर राज्य सरकार लोगों की भावनाएं भड़का कर मुस्लिमों को अपने पाले में करने का खेल खेला, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यकों के खिलाफ दर्ज मुकदमों को वापस ले लिया। जनवरी, 2018 में कर्नाटक सरकार ने एक अधिसूचना जारी की, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ पिछले 5 सालों में दर्ज सांप्रदायिक हिंसा के केस वापस लिए जाने का आदेश दिया गया। साफ है कि यह ‘मुस्लिम तुष्टीकरण’ की वजह से किया गया।

कर्नाटक के लिए अलग झंडे की सियासत
मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को पता है कि विकास और जनहित का कोई काम दिखाकर तो चुनाव नहीं जीता जा सकता है। इसलिए वह ऐसी बातों को हवा देने में लगे हैं, जिनमें राज्य के निवासियों की भावनाओं पर असर हो और वे कांग्रेस के पक्ष में झुक जाएं। चुनाव से पहले सीएम सिद्धारमैया ने कर्नाटक के लिए अलग झंडे का शिगूफा छोड़ा। देश में सिर्फ जम्मू-कश्मीर ही ऐसा राज्य हैं जिसका अपना अलग झंडा है। देश का संविधान इसकी इजाजत नहीं देता है, लेकिन सिद्धारमैया ने प्रदेश के लिए अलग झंडे को मंजूरी देकर विवाद खड़ा कर दिया। वह कर रहे हैं कि कन्नड़ भाषी लोगों की अस्मिता के प्रतीक के लिए अलग झंडा बनाने का फैसला किया है। मतलब साफ है कि सिद्धारमैया किसी भी प्रकार से कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाना चाहते हैं।

कांग्रेस सरकार के दौरान बढ़ी हिंसा और अपराध
सिद्धारमैया सरकार ने विकास तो नहीं किया, कानून व्यवस्था के मामले में भी फेल साबित हुई है। कर्नाटक में कांग्रेस सरकार के दौरान अब तक 7,748 हत्याएं, 7,238 बलात्कार और 11, 000 अपहरण की घटनाएं हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त दंगों के भी कई मामले सामने आ चुके हैं। इसके साथ ही राष्ट्रीय स्वयं सेवकों की हत्याओं का दौर भी लगातार जारी है। मतलब साफ है कि हिंसा और अपराध का सहारा लेकर कर्नाटक सरकार चुनाव की वैतरणी पार करना चाहती है।

‘बांटने’ की राजनीति करते रंगे हाथ पकड़े गए सिद्धारमैया!
कर्नाटक के मुख्यमंत्री प्रदेश में ‘बांटने’ की राजनीति को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं। पहले हिंदू-मुस्लिम को बांटा, फिर हिंदू-हिंदू को बांटा,फिर लिंगायत-लिंगायत को बांटा, फिर हिंदी-कन्नड़ को बांटा, फिर उत्तर-दक्षिण को बांटा, फिर देश से प्रदेश को बांटा… और अब अपने समर्थकों को रिश्वत बांटते रंगे हाथों पकड़े गए हैं।


वीडियो में साफ दिख रहा है कि सिद्धारमैया ने कर्नाटक के मैसूर में चुनाव प्रचार के दौरान महिलाओं को पैसे बांटे। एक मंदिर के बाहर सिद्धारमैया के स्वागत के लिए खड़ी महिलाओं को उन्होंने दो-दो हजार रुपए के नोट देते हुए वे कैमरे में कैद हैं। हालांकि भारतीय जनता पार्टी की शिकायत पर शिकायत दर्ज कर ली गई है और मामले की चुनाव आयोग जांच भी कर रहा है, लेकिन बड़ा सवाल ये है कि संवैधानिक पद पर रहते हुए उन्होंने जान-बूझकर चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन किया।

स्पष्ट है कि सिद्धारमैया को नैतिकता की नहीं चुनाव में जीत की अधिक जरूरत है, इसलिए ही उन्होंने ये रिश्वत भी बांटी है। दरअसल सिद्धारमैया ने चुनाव जीतने के लिए हर तरह की नैतिकता से तौबा कर लिया है और लगातार ‘बांटने’ की राजनीति को बढ़ावा दे रहे हैं। आइये हम उनकी ‘बांटने’ की राजनीति पर एक नजर डालते हैं-

हिंदू-मुस्लिम को ‘बांटने’ की राजनीति
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार में दंगों में शामिल सभी मुसलमानों पर से केस हटा लिया है। जनवरी, 2018 में एक सर्कुलर जारी किया, जिसमें अल्पसंख्यकों के खिलाफ पिछले 5 सालों में दर्ज सांप्रदायिक हिंसा के केस वापस लिए जाने का आदेश दिया गया। जाहिर है इस सर्कुलर के आधार पर सिद्धारमैया सरकार ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ का कार्ड खेल रही है और यहीं से हिंदू-मुस्लिम ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है।

हिंदू-हिंदू को ‘बांटने’ की राजनीति
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने लिंगायत समुदाय को अलग धर्म की मान्यता देने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके लिए उसने केंद्र सरकार के पास प्रस्ताव को भेज भी दिया है। दरअसल सिद्धारमैया की मंशा यह नहीं है कि किसी का भला हो, बल्कि हिंदुओं को बांट कर उन्हें कमजोर किया जा रहा है ताकि चुनाव में जीत हासिल की जा सके।

लिंगायत-लिंगायत को ‘बांटने’ की राजनीति
सिद्धारमैया सरकार ने एक ही परंपरा से आने वाले वीरशैव लिंगायत और लिंगायत में भी फूट डाल दी है। गौरतलब है कि वीरशैव परंपरागत रूप से भगवान शिव के साथ हिदू देवी-देवताओं को भी मानते हैं, जबकि लिंगायत समुदाय में भगवान शिव को ईष्टलिंग के रूप में पूजने की मान्यता है। हालांकि ये किसी भी प्रकार से हिंदू समुदाय से अलग नहीं हैं, लेकिन लिंगायत को अलग धर्म और वीर शैव को अल्पसंख्यक का दर्जा देकर सिद्धारमैया ने दोनों समुदायों में फूट डाल दिया है।

उत्तर-दक्षिण को ‘बांटने’ की राजनीति
पिछले दिनों कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने एक फेसबुक पोस्ट में लिखा कि- कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र केंद्र से जितना पाते हैं उससे ज्यादा का टैक्स केंद्र सरकार को देते हैं। उन्होंने दलील दी है कि उत्तर प्रदेश को प्रत्येक एक रुपये के टैक्स योगदान के एवज में उसे 1.79 रुपये मिलते हैं, जबकि कर्नाटक को 0.47 पैसे। कर्नाटक कांग्रेस के इस ट्विटर अकाउंट पर भी यही बातें लिखी गई हैं।

“For every 1 rupee of tax contributed by UP that state receives Rs. 1.79

For every 1 rupee of tax contributed by Karnataka, the state receives Rs. 0.47

While I recognize, the need for correcting regional imbalances, where is the reward for development?”: CM#KannadaSwabhimana https://t.co/EmT7cY60Q0

— Karnataka Congress (@INCKarnataka) 16 March 2018

हिंदी-कन्नड़ को ‘बांटने’ की राजनीति
राहुल गांधी और कांग्रेस की हिन्दी भाषा से नफरत जगजाहिर है। इस मुद्दे पर राहुल ने सिद्धारमैया को कर्नाटक में खुली छूट दे रखी है। सिद्धरमैया ने कर्नाटक में हिंदी भाषा के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया है। वे कई माध्यमों से दलील दे रहे हैं कि- यूरोप के कई देशों से कर्नाटक बड़ा है, अगर मैं एक कन्नड़ नागरिक हूं और कर्नाटक में हम ज्यादातर कन्नड़ भाषा का इस्तेमाल करते हैं, और हिंदी भाषा के थोपे जाने का विरोध करते हैं।

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