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कांग्रेस की काली साजिशः असम और जम्मू-कश्मीर को देश से अलग करना

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जम्मू-कश्मीर और असम, देश के दो ऐसे राज्य हैं जिनके सांस्कृतिक और भौगोलिक परिदृश्य को कांग्रेस पार्टी ने बदरंग कर दिया है। इन राज्यों की बदनसीबी के पीछे कांग्रेस का द्वन्द है, जो पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की विरासत है।

आजादी के समय कांग्रेस ने भारत के विभाजन को स्वीकार किया और दो देशों के जन्म हुआ, लेकिन कांग्रेस के नेताओं ने दो राष्ट्रों की उपस्थिति के यथार्थ को कभी स्वीकार नहीं किया। आजादी के बाद पार्टी ने मुसलमानों का हर तरह से तुष्टिकरण किया। इसके बदले में कांग्रेस को हर चुनाव में सत्ता मिलती रही। सत्ता के लिए कांग्रेस की इस मुस्लिम तुष्टिकरण की काली साजिश ने जम्मू-कश्मीर और असम को जकड़ लिया, जिससे मुक्त होने के लिए देश आज भी छटपटा रहा है।

असम में बांग्लादेश से हुए घुसपैठ पर कांग्रेस ने बंद की आंखे
देश के विभाजन के समय ही पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में लोगों का असम में आना शुरू हो चुका था। इनकी संख्या इतनी अधिक हो गई की असम की अर्थव्यवस्था और कानून व्यवस्था चरमराने लगी। 1950 में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु ने संसद से Immigrants (Expulsion from Assam) Act पारित किया ताकि अवैध रुप से आये लोगों को असम राज्य से बाहर निकाला जा सके। कानून के तहत केन्द्र सरकार को इन अवैध लोगों को वापस भेजने की पूरी जिम्मेदारी थी, लेकिन सरकार ने सबकुछ जानने के बाद भी कुछ नहीं किया। यह स्थिति 2014 तक, सर्वोच्च न्यायलय के हस्तक्षेप तक बनी रही। 1971 के भारत-पाक युद्ध से बांग्लादेश बना, इसके बाद असम में आने वालों की संख्या में तेज रफ्तार से वृद्धि हुई। 1971 से 1991 तक हिन्दूओं की संख्या में 41 प्रतिशत की वृद्धि हुई तो मुसलमानों की संख्या में 77 प्रतिशत की वृध्दि हुई। यह संख्या लगातार बढ़ती रही और केन्द्र में कांग्रेस की सरकारों ने आंखें बंद कर ली।

कांग्रेस ने असम के मुसलमानों के लिए विशेष कानून बनाया
15 अक्टूबर 1983 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने अध्यादेश के जरिए Illegal Migrants (determination by tribunals) Act को लागू कर दिया और 12 दिसंबर 1983 को इसे संसद से भी पारित करवा लिया। यह कानून केवल असम के लिए ही बनाया गया जहां किसी को अवैध वासी साबित करने की जिम्मेदारी सरकार औऱ पुलिस की थी जबकि देश के अन्य राज्यों में Foreigners Act के तहत अवैध रुप से आने वाले व्यक्ति के ऊपर सबूत देने की जिम्मेदारी थी। इस कानून के तहत अवैध रुप से आये बांग्लादेशियों का जाना मुश्किल हो गया। असम में अवैध नागरिकों की समस्या ने छात्र आंदोलन का रूप ले लिया जो 15 अगस्त 1985 तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ हुए समझौते से खत्म हुआ। इस समझौते में IMDT कानून को खत्म करने की भी शर्त थी। कांग्रेस ने IMDT कानून को खत्म करने का कोई उपाय नहीं किया, और इस कानून को बनाये रखने के लिए हर प्रयास किया।

कांग्रेस ने IMDT कानून को खत्म करने के वाजपेयी सरकार के प्रयास पर पानी फेरा
06 मई 2003 को तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने IMDT कानून को खत्म करने के लिए संसद में विधेयक पेश करने का निर्णय लिया। 09 मई 2003 को संसद में IMDT कानून को खत्म करने के लिए विधेयक संसद में पेश किया गया जिसे कांग्रेस के विरोध के कारण संसदीय समीति को भेजना पड़ा। संसदीय समीति में कांग्रेस का वर्चस्व था, जहां इस पर रिपोर्ट देने में कोताही बरती गई और इस बीच लोकसभा भंग हो गई।

कांग्रेस की कानूनी साजिश को सर्वोच्च न्यायलय ने 2005 में खत्म किया– वर्तमान में असम के मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनेवाल ने सन् 2000 मे IMDT कानून के खिलाफ सर्वोच्च न्यायलय में याचिका दी। इस पर लंबी सुनवाई के बाद 12 जुलाई 2005 को सर्वोच्च न्यायलय ने कानून को रद्द कर दिया। इस निर्णय के साथ पूरे देश में एक ही Foreigners Act लागू हो गया। लेकिन कांग्रेस पार्टी सर्वोच्च न्यायलय की बात को मानने को  तैयार ही नहीं थी। फरवरी 2006 में कांग्रेस ने ‘Foreigners (Tribunal) Amendment Order’ जारी करके असम में Foreigners Tribunals की वैधता को खत्म कर दिया। दिसंबर 2006 में सर्वोच्च न्यायलय ने कांग्रेस सरकार के इस आदेश को भी रद्द कर दिया। 2009 में दायर एक जनहित याचिका पर फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायलय ने 04 अगस्त 2014 से असम में National Register of Citizens को अपडेट करने का काम अपने हाथ में ले लिया। कांग्रेस 1950 से जिस गलती को जानबूझ कर करती चली आ रही थी, उसे सर्वोच्च न्यायलय को 2014 में सुधारना पड़ा।

कांग्रेस का जम्मू-कश्मीर के लिए 35A की धारा को संसद मे पारित किए बिना, संविधान में  जोड़ना
कांग्रेस ने दूसरी तरफ जम्मू-कश्मीर के साथ भी ऐसा ही किया। जम्मू-कश्मीर को देश के अन्य राज्यों से अधिक अधिकार देने के लिए कार्यपालिका के आदेश पर संविधान में धारा 35A जोड़ दिया। इस धारा के तहत कश्मीर में देश के दूसरे राज्यों के लोग जमीन नहीं खरीद सकते हैं। जम्मू-कश्मीर की लड़की यदि देश के दूसरे राज्य में शादी में शादी करती है तो जम्मू-कश्मीर में उसका जमीन जायदाद पर अधिकार खत्म हो जाएगा। 1952 में प्रधानमत्री नेहरू ने शेख अब्बदुला के साथ दिल्ली में हुए समझौते को धारा 35 A में समाहित करने का प्रयास किया।

देश के विभाजन के बाद भारत की आंतरिक सुरक्षा को लेकर कांग्रेस ने लचर और अहितकारी नीतियों को अपनाया और इन नीतियों के कारण पनप रही विघटनकारी साजिशों पर भी कांग्रेस सरकारों ने अपनी आंखे बंद रखी, जो साफ इशारा करती हैं कि कांग्रेस भी इस साजिश में शामिल रही है।

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