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केजरीवाल सरकार की बढ़ी मुश्किल, 21 विधायकों की सदस्यता पर संकट ?

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दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पर नये सिरे से संकट के बादल मंडराने शुरू हो गये हैं। दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने असम में संसदीय सचिवों से जुड़े एक मामले में जो फैसला सुनाया है, वो सही मायने में केजरीवाल सरकार को ही हिलाने वाला है। मीडिया में छपी खबरों के अनुसार सुप्रीम कोर्ट ने असम विधानसभा से पारित संसदीय सचिव से जुड़े कानून को असंवैधानिक ठहराते हुये रद्द कर दिया है। ऐसे में जब केजरीवाल के 21 विधायकों का मामला इसी आधार पर चुनाव आयोग में लटका पड़ा है, तो इस फैसले के बाद उनकी सदस्यता बरकरार रहने पर सवालिया निशान लग गया है।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या है ?
दरअसल सुप्राीम कोर्ट ने 13 साल पहले असम विधानसभा से पारित उस कानून को निरस्त कर दिया है, जिसमें संसदीय सचिवों को कानूनी मान्यता दी गई थी। गौरतलब है कि जनवरी, 2004 में संसद ने एक संविधान संशोधन पारित किया था, जिसमें राज्यों में मंत्रियों की संख्या विधानसभा की कुल सदस्य संख्या की अधिकतम 15 प्रतिशित सुनिश्चित कर दी थी। लेकिन असम की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने अधिक से अधिक विधायकों को सत्ता का मलाई खिलाने के लिये विधानसभा से Parliamentary Secretaries (Appointment, Salaries, Allowances and Miscellaneous Provisions) कानून पारित कर लिया था। इसके बाद तत्कालीन सरकार ने मन मुताबिक विधायकों को संसदीय सचिव बनाकर सरकारी खजाने को लुटाने का इंतजाम कर दिया था।

केजरीवाल के 21 विधायकों पर तलवार
मंत्रियों का निर्धारित कोटा भरने के बाद केजरीवाल ने अपने 21 विधायकों को भी संसदीय सचिव के रूप में नियुक्त किया था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने पहले के कई फैसलों में इस तरह के सरकारी आदेशों को खारिज भी कर दिया था। लेकिन फिर भी केजरीवाल ने कानून और संविधान को ठेंगा दिखाते हुए 21 विधायकों को लाभ के पद पर तैनात कर दिया था (अब संसदीय सचिव के पद को लाभ का पद माना जाता है )।

कहां अटका है मामला ?
दिल्ली सरकार में 21 संसदीय सचिवों की विधायकी रद्द करने का मामला अभी चुनाव आयोग में लंबित है। गौरतलब है कि संसदीय सचिव के पद पर इनकी नियुक्ति को दिल्ली हाई कोर्ट ने पहले ही असंवैधानिक बताकर रद्द कर दिया है। माना जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले से चुनाव आयोग पर दबाव बढ़ेगा और विधायकों की सदस्यता रद्द हो सकती है। क्योंकि उनकी उन विधायकों पर आरोप है कि उन्होंने विधानसभा के सदस्य रहते हुए लाभ का पद धारण किया।

दिल्ली HC ने लगाया 10 हजार रुपये का जुर्माना
बुधवार को ही दिल्ली हाई कोर्ट ने अरविंद केजरीवाल पर 10 हजार रुपये का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना केजरीवाल की ओर से मानहानि के मुकदमा में जवाब दाखिल नहीं करने के लिये लगाया गया है। दरअसल केजरीवाल ने केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली पर अपने वकील द्वारा आपत्तिजनक शब्दों के इस्तेमाल के लिये जवाब दर्ज नहीं किया था। उन्हें दो हफ्ते में जुर्माना भरने के आदेश के साथ आगे से सुनवाई के दौरान वित्त मंत्री से कोई अपमानजनक सवाल नहीं पूछने का भी निर्देश दिया है। अदालत ने उन्हें हिदायत दी है कि गरिमा का ख्याल हर हाल में रखना होगा।

खुद पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं
दिल्ली के सीएम पर उन्हीं के मंत्री रहे कपिल मिश्रा ने दो करोड़ रुपये रिश्वत लेते हुए अपनी आंखों से देखने का आरोप लगाया है। सबसे बड़ी बात है कि जिनपर रिश्वत देने का आरोप है वो केजरीवाल सरकार के वरिष्ठ मंत्री सत्येंद्र जैन हैं। इनके खिलाफ भ्रष्टाचार के कई गंभीर मामलों में जांच चल रहे हैं।

कई मंत्री और नेता दागी हैं 
सीएम और सत्येंद्र जैन पर ही नहीं केजरीवाल सरकार में उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया पर भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप हैं। सिसोदिया के खिलाफ टॉक टू एके मामले को लेकर जांच भी चल रही है। अरविंद केजरीवाल और उनकी आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता को बड़े-बड़े सपने दिखाकर चुनाव जीता। आप नेताओं पर पैसे लेकर समाज के छटे हुए लोगों को टिकट देने के आरोप लगे। परिणाम ये हुआ कि उनके अधिकतर विधायकों, नेताओं और मंत्रियों पर गंभीर आपराधिक और भ्रष्टाचार से जुड़े गंभीर मामले चल रहे हैं। लेकिन, केजरीवाल फिर भी ऐसे लोगों के खिलाफ समय पर कोई कार्रवाई नहीं करते। ऐसे ही आरोपों के चलते उनके कई मंत्रियों की कुर्सी भी जा चुकी है।

मानसिकता अराजकता में है ?
कहा जाता है कि अराजकता केजरीवाल की मानसिकता में है। वो अपने सामने किसी को मान्यता नहीं देने की प्रवृति रखते हैं। इनपर आरोप लगते हैं कि वो कोर्ट-कानून, संविधान किसी का भी सम्मान नहीं करते। शायद यही कारण है कि उनपर झूठे और बिना तथ्यों के किसी पर भी आरोप लगाकर सुर्खियां बटोरने के आरोप लगाये जाते हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री रहते हुए 26 जनवरी में बाधा डालने की नीयत से धरना देने के मामले से बेहतर इनकी अराजकता की कोई निशानी नहीं हो सकती। इसका उदाहरण तब भी देखने को मिला जब पंजाब और गोवा में मिली करारी हार के बाद इन्होंने चुनाव आयोग पर ही अनर्गल आरोप लगाने शुरू कर दिये। कहने लगे कि ईवीएम से टैंपरिंग हुई इसीलिये उनकी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। जब चुनाव आयोग ने दिखा दिया कि ईवीएम से टैम्परिंग नामुमकिन है, तो ये विधानसभा के अंदर उसका फर्जी प्रदर्शन करवाने से भी नहीं चूके।

राष्ट्रपति, कोर्ट, कानून, चुनाव आयोग, उपराज्यपाल ऐसी कोई संवैधानिक संस्थाएं नहीं हैं जिसे केजरीवाल ने बिना तथ्यों के कठघरे में खड़ा नहीं किया। लोग कहते हैं कि इसी मानसिकता के चलते आम आदमी पार्टी जितनी तेजी से आगे बढ़ी थी, उससे भी तेजी से उसका पतन शुरू हो गया है। लेकिन अरविंद केजरीवाल इससे कुछ सीखेंगे, इसका जवाब तो किसी के पास नहीं है।

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