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पीएम मोदी की नीयत पर कोई शंका नहीं, राफेल पर टेक्निकल डिटेल बताने की कांग्रेस की मांग ‘मूर्खतापूर्ण’ – शरद पवार

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कांग्रेस पार्टी लगातार मांग कर रही है कि राफेल डील के टेक्निकल जानकारियों को सार्वजनिक किया जाए। वहीं केंद्र सरकार ने साफ कहा है कि वह ऐसा नहीं करेगी क्योंकि ऐसा करना देश की सुरक्षा से समझौता करना होगा। मोदी सरकार के इस रुख का पूर्व रक्षा मंत्री और एनसीपी प्रमुख शरद पवार ने भी समर्थन किया है और कांग्रेस की मांग को मूर्खतापूर्ण कहा है। उन्होंने कहा कि विपक्ष की ओर से लगातार मांग की जा रही है कि राफेल जेट से जुड़ी तमाम तकनीकी जानकारियों को सार्वजीनिक किया जाए, लेकिन इसका कोई औचित्य नहीं है। एनसीपी प्रमुख ने एक टीवी चैनल से बातचीत में यह भी कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की नीयत पर कोई शक नहीं है। शरद पवार ने कहा, ”मुझे लगता है कि जनता के दिमाग में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीयत को लेकर कोई शंका नहीं है।”

 

 

 

 

 

 

आपको बता दें कि दो सरकारों के बीच बिना किसी बिचौलिये के एक पारदर्शी सौदा किया गया, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इसे मुद्दा बना लिया है। राहुल गांधी भ्रष्टाचार के आरोप लगाते हुए इस डील को खत्म करने की मांग कर रहे हैं। जाहिर है देश की सुरक्षा से जुड़ी इस अहम डील है, लेकिन कांग्रेस पार्टी देश हित के विरुद्ध काम कर रही है। 

दरअसल वह दो विकल्पों पर काम कर रही है। एक तो ये कि किसी भी तरह से राफेल डील खटाई में पड़ जाए। आपको याद होगा कि 2001 से चल रही डील की प्रक्रिया 2013 तक सरकार में रहने के बाद भी कांग्रेस ने पूरी नहीं की थी। 

दूसरा यह कि सरकार के खिलाफ ऐसा माहौल बनाया जाए कि वह राफेल की टेक्निकल डिटेल पब्लिक डोमेन ले आए। जाहिर है इससे चीन और पाकिस्तान के पास भी इसकी जानकारी चली जाएगी और वे उसका तोड़ निकाल सकते हैं।

दरअसल टेक्निकल डिटेल और कीमतों के विवरण के साथ ये पता लगाना आसान होता है कि उस विमान में किस तरह के हथियार लगाए गए होंगे, यानि स्पष्ट है कि देश की सुरक्षा को देखते हुए ये सीक्रेट रहने चाहिए। डील को रोकने के लिए कांग्रेस ने कोर्ट का भी सहारा लिया है। पार्टी के नेता तहसीन पूनावावाला ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका भी दाखिल किया था। हालांकि बाद में देश में अपनी छवि सुधारने के लिए पार्टी इससे पीछे हट गई।

राफेल डील पर कांग्रेस ने याचिका वापस ली
राफेल डील पर कांग्रेस खूब हल्ला मचा रही है, लेकिन रॉबर्ट वाड्रा के बहनोई और कांग्रेस नेता तहसीन पूनावाला ने जब इस पर याचिका दायर की तो कांग्रेस बैकफुट पर आ गई। पहले तो याचिका से किनारा किया और फिर इसे भाजपा प्रायोजित बता दिया। अब राहुल गांधी के खासमखास तहसीन पूनावाला की याचिका भाजपा प्रायोजित कैसे है यह तो कांग्रेस ही बता सकती है।

बहरहाल आपको बता दें कि भारत ने सितंबर 2016 में फ्रांस के साथ एक इंटर-गर्वनमेंट समझौते को साइन किया था। इसके तहत 36 राफेल डील खरीदने का सौदा हुआ। इन फाइटर जेट्स की डिलीवरी सिंतबर 2019 से भारत को शुरू हो जाएगी। देश की रक्षा जरूरतों को ध्यान में रखते हुए यह बेहद आवश्यक डील है, जिसे इंडियन एयरफोर्स हर हाल में चाहती है। जाहिर है अगर इस डील में कोई बाधा आती है तो यह देश की सुरक्षा के लिए गंभीर स्थिति पैदा करेगा।

देश की सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक है कांग्रेस का झूठ
यहां ये जानना जरूरी है कि राफेल को लेकर राजनीतिक नफे के लिए फैलाया जा रहा कांग्रेस का झूठ भारत के लिए कितना घातक है। दरअसल भारतीय वायुसेना को आखिरी बार साल 1996 में रूस से सुखोई 30 एमकेआई मिले थे। पुराने हो चुके मिग-21 और मिग-27 विमान बेड़े से हटाए जा रहे हैं। ऐसे में वायुसेना अपने बेड़े में फाइटर्स की जरूरत लंबे समय से महसूस कर रही थी, लेकिन राजनीति को मोटी कमाई का जरिया मानने वाली कांग्रेस को देश की सुरक्षा से भला कब सरोकार रहा? अब जबकि मोदी सरकार ने वायुसेना की जरूरतों को देखते हुए सबसे बेहतर विकल्प के तौर पर राफेल डील की तो कांग्रेस उसे लेकर झूठ पर झूठ बोल रही है।

कांग्रेस का पहला झूठ- मोदी सरकार ने यूपीए की डील को बदला
राहुल गांधी अपने अलग-अलग बयानों में बेखटके बताते रहे हैं कि यूपीए सरकार ने डसॉल्ट एविएशन के साथ हुए करार में राफेल की कितनी कीमत तय की थी। कभी वो एक राफेल की कीमत कभी 520 करोड़ बताते हैं, कभी 526 करोड़, कभी 540 करोड़, कभी 700 करोड़ तो कभी 750 करोड़। एक बार तो उन्होंने एक राफेल की कीमत 526 रुपये भी बता दी थी। यूपीए सरकार के जमाने में हुए करार के हवाले से राफेल की कीमत को लेकर राहुल गांधी के बयानों में आखिर इतना विरोधाभास क्यों है? वो इसलिए क्योंकि यूपीए सरकार के दौर में राफेल को लेकर डसॉल्ट कंपनी के साथ किसी करार पर दस्तखत हुआ ही नहीं था। यूपीए सरकार ने सिर्फ बातचीत की जो कभी करार तक पहुंच ही नहीं सका। 2013 में विदेश मंत्रालय की ओर से जारी एक आधिकारिक बयान से इसकी पुष्टि भी हो जाती है। 2013 में विदेश मंत्रालय की बयान जारी कर कहा था कि “भारत सरकार ने फ्रांस की कंपनी डसॉल्ट एवियेशन के राफेल का चयन कर लिया है। भारतीय वायु सेना के लिए126 MMRCA(राफेल फाइटर्स) की खरीद को लेकर डसॉल्ट एविएशन के साथ बातचीत जारी है।” 2013 की MEA की इस ब्रीफिंग से साफ हो जाता है कि राफेल को लेकर बातचीत तो जरूर हो रही थी, लेकिन वो डील लॉक नहीं हो सकी थी और जब डील अंजाम तक पहुंची ही नहीं तो कीमत कहां से तय हो गई। राफेल की कीमत को लेकर राहुल गांधी के विरोधाभासी बयानों या कहें सफेद झूठ की शायद यही वजह है।

कांग्रेस का दूसरा झूठ- सरकार ने डील में प्रक्रिया का पालन नहीं किया
कांग्रेस के नेता मौजूदा सरकार पर राफेल डील को लेकर एक झूठा आरोप बार-बार लगाते हैं कि साल 2015 में प्रधानमंत्री फ्रांस गए और राफेल की खरीद को लेकर करार कर लिया। इस आरोप में भी कांग्रेस या कहें राहुल गांधी का बचकाना पक्ष ही बेपर्दा हो रहा है जिसकी वजह से वो बातचीत और करार के बीच के अंतर को समझ नहीं रहे या फिर जानबूझ कर नादान बनने की कोशिश कर रहे हैं। देश की जनता को ये जानना जरूरी है कि 2015 में प्रधानमंत्री फ्रांस जरूर गए थे और राफेल को लेकर बातचीत भी की। दरअसल दो दशक तक वायुसेना के बेड़े में किसी नए फाइटर्स के शामिल नहीं होने की वजह से उसकी तत्काल और सख्त जरूरत महसूस की जा रही थी। वायुसेना सरकार से लगातार इसकी मांग भी कर रही थी। इसी जरूरत को देखते हुए प्रधानमंत्री ने 2015 में फ्रांस सरकार से जल्द से जल्द राफेल की आपूर्ति के लिए बातचीत की और फिर हिन्दुस्तान लौट कर उसकी आधिकारिक प्रक्रिया शुरू करवाई। एक-एक जरूरी प्रक्रिया से गुजरते हुए यहां तक कि रक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति से मंजूरी मिलने के बाद इस डील को सितंबर 2016 में कागज पर उतारा गया। इस बात की जानकारी रक्षा मंत्रालय 7 फरवरी 2018 को लिखित तौर पर दे चुका है।

कांग्रेस का तीसरा झूठ- कीमत छिपाई जा रही है
कांग्रेस बार-बार देश को गुमराह कर रही है कि सरकार राफेल की कीमतों को छुपा रही है। दरअसल देश के लिए होने वाले हर बड़े सौदे में घोटाले की आदी रही कांग्रेस ये मानने को तैयार हो ही नहीं सकती कि कोई सरकार देशहित में भी रक्षा सौदा कर सकती है। 7 फरवरी 2018 को ही रक्षा मंत्रालय ने साफ कर दिया था कि सरकार ने संसद को राफेल की अनुमानित कीमत की जानकारी दे दी है। जहां तक डीटेल ब्रेकअप की बात है तो ये पिछली सरकारें भी सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए नहीं देती थीं। ऐसा इसलिए क्योंकि अगर डीटेल ब्रेकअप को सार्वजनिक कर दिया गया तो दुश्मन देशों को ये पता लग जाएगा कि राफेल में क्या-क्या खासियतें हैं और वो उनका तोड़ ढूंढने में जुट जाएंगी। साफ है कि देश की सुरक्षा के प्रति मौजूदा सरकार की निष्ठा को कांग्रेस शिद्दत से समझती है, इसीलिए वो इस मुद्दे को लेकर बेलौस झूठ बोलती जा रही है।

कांग्रेस का चौथा झूठ- HAL की जगह रिलायंस डिफेंस को दिया कॉन्ट्रैक्ट
कांग्रेस के इस झूठ का पर्दाफाश तो डसॉल्ट एविएशन और फ्रांस की सरकार ने कर दिया है। इतना ही नहीं न्यूज एजेंसी रॉयटर की 2013 की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया था कि डसॉल्ट एविएशन एचएएल को राफेल की मैन्यूफैक्चरिंग के लायक नहीं मानती। इसके अलावा रिलायंस के साथ उसके दूसरे व्यापारिक हित भी जुड़ रहे थे। डसॉल्ट एविएशन वार्षिक रिपोर्ट 2017 में कहा गया है कि रिलायंस एयरपोर्ट डेवलपर्स लिमिटेड में 35 प्रतिशत शेयर लेकर उसने भारत में अपनी मौजूदगी बढ़ाई। सच्चाई यही है तो फिर क्यों राहुल गांधी बार-बार ये झूठ फैला रहे हैं कि सरकार ने राफेल का कॉन्ट्रैक्ट एचएएल से छीनकर रिलायंस को दिया।

साफ है कि राफेल को लेकर कांग्रेस झूठ पर झूठ बोल रही है। देश के रक्षा विशेषज्ञ इस झूठ के लिए उन्हें बार-बार चेता भी रहे हैं, लेकिन लगता है कि कांग्रेस खासकर राहुल गांधी को देश की सुरक्षा से कोई सरोकार नहीं है।

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