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‘सत्ता की मलाई’ खाने की होड़ में कुमारस्वामी से ‘कलह’ कर रही कांग्रेस!

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”क्षेत्रीय दलों को हल्‍के में न ले कांग्रेस’’ ये बयान जेडीएस के अध्यक्ष एचडी देवगौड़ा का है।

‘’पूर्व सीएम सिद्धारमैया को को-ऑर्डिनेशन कमिटी का चेयरमैन बनाया गया है। उनके नेतृत्व में ही दोनों पार्टियों को सिस्टम चलाना होगा।” ये बयान कर्नाटक कांग्रेस के नेता डी के शिवकुमार का है।

इन दोनों बयानों के विरोधाभासों को समझेंगे तो साफ हो जाएगा कि कर्नाटक की सरकार के भीतर तमाम उथल-पुथल है और सरकार सही तरीके से नहींं चल पा रही है।

साफ है कि एक तरफ कांग्रेस अपना मनमानी करना चाहती है तो दूसरी तरफ जेडीएस ने साफ कर दिया है कि कांग्रेस उसे कमतर न आंके।

दरअसल ये खींचतान ‘सत्ता की मलाई’ खाने की न कि जनता की सेवा करने की। ‘अनैतिक’ गठबंधन के जरिये जिस तरह से कर्नाटक में सत्ता प्राप्त की गई है ‘टकराव’ होना लाजिमी है।

पहले तो वित्त विभाग को लेकर खींचतान हुई। कांग्रेस इसे किसी भी तरह से छोड़ना नहीं चाहती थी। साथ ही वह गृह विभाग भी अपने पास ही रखना चाहती थी।

अब जब वित्त विभाग जेडीएस के पास है तो भी कांग्रेस इसमें दखल दे रही है। पूर्व सीएम सिद्धारमैया चाहते हैं कि इस बार कर्नाटक सरकार सप्लीमेंट्री बजट ही पेश करे। यानि सिद्धारमैया ने अपने जिन हितधारकों को फायदा पहुंचाया होगा… उससे मुख्यमंत्री कुमारस्वामी  किसी भी तरह की छेड़छाड़ न करे।

हालांकि कुमारस्वामी भी अड़े हुए हैं कि उनकी सरकार है तो वे पूर्ण बजट ही पेश करेंगे। जाहिर है समन्वय बिठाने में सहजता नहीं है।

जाहिर है यह विरोधी दलों की एकजुटता दिखाने की कवायद को भी एक झटका है। दरअसल गैर एनडीए दल एचडी देवगौड़ा के मुख्‍यमंत्री पद की शपथ के दौरान उपस्थित थे। पर अब यह साफ है कि ये दल 2019 में होने वाले लोकसभा चुनाव में हर राज्य में एक साथ मिलकर चुनाव लड़ेंगे या नहीं, इसपर संशय है।  

यह भी सभी जानते हैं कि इसी कांग्रेस ने केन्द्र की 10 महीने पुरानी देवगौड़ा सरकार को गिरा दिया था। जाहिर है अब देवगौड़ा जी को कांग्रेस पर आंखें तरेरने का एक मौका मिला है। हालांकि कर्नाटक की यह बेमेल गठबंधन वाली सरकार कब तक चलेगी यह कहना कठिन है। 

दरअसल बीजेपी को छोड़ कर सभी पार्टियां अपने-अपने परिवार की पार्टियां हैं। यानि ‘पॉकेट पार्टी’ है। जैसे राजे-रजवाड़े अपने वारिसों को राजा बनाते थे, वैसे ही ये सभी अपने वारिसों को सीएम बनाते हैं। ऐसे में हितों का टकराव तो होना लाजिमी ही है। बहरहाल आइये हम जानते हैं कि इन दोनों ही दलों के बीच और किन मुद्दों पर टकराव हैं-

सिद्धारमैया मुट्ठी में रखना चाहते हैं कुमारस्वामी को!
कांग्रेस की तकलीफ पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के रुख से समझी जा सकती है जिन्होंने सरकार के कामकाज पर सवाल उठा दिया। सिद्धारमैया ने सप्लीमेंट्री बजट पेश करने को लेकर अपनी आपत्ति जताई थी। उन्होंने कहा था कि जब राज्य की पिछली कांग्रेस सरकार विधानसभा में बजट  पेश कर चुकी थी तो इसकी क्या जरूरत थी?  इतना ही नहीं सिद्धारमैया ने इसको लेकर भी संदेह जताया था कि 2019 लोकसभा चुनावों के बाद मौजूदा गठबंधन सरकार चल पाएगी। सिद्धारमैया का खुले तौर पर दिया ये ऐसा बयान था जिससे सरकार में शामिल कुछ कांग्रेसी नेता ही चिंता में पड़ गए। उन्हें लगता है कि एक तो वैसे ही सरकार कितने महीने चलेगी इसका पता नहीं, ऊपर से अपने ही नेता ऐसे बयान देने लगे तो पता नहीं, महीनों की जगह कुछ दिनों में ही सरकार दम ना तोड़ दे।

कर्नाटक कांग्रेस में वर्चस्व का टकराव तेज
संभावित खतरे को भांपकर प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष और राज्य के उप मुख्यमंत्री जी परमेश्वर ने कुमारस्वामी के कामकाज पर सिद्धारमैया के बयान को लेकर अपनी आपत्ति जताई। परमेश्वरा ने कहा कि सिद्धारमैया या कोई भी दूसरा नेता सरकार को लेकर भ्रम फैलाने की कोशिश करेगा तो उस पर कांग्रेस की सेंट्रल कमेटी कार्रवाई करेगी। इस बात से जहिर है कि कर्नाटक में कांग्रेस के भीतर वर्चस्व का दौर तेज हो चुका है, जिसका असर कुमारस्वामी सरकार की सेहत पर पड़ना तय है।  

विधायकों के साथ अलग से बैठक कर रहे सिद्धारमैया
कांग्रेस का सिरदर्द यह भी है कि सिद्धारमैया विधायकों के साथ अलग से बैठकें भी कर रहे हैं। बुधवार को भी उन्होंने आठ विधायकों के साथ बैठक की जिसमें राज्य के दो मंत्री भी शामिल रहे। इस तरह की बैठक को दरअसल सिद्धारमैया के शक्ति प्रदर्शन के रूप में देखा जा रहा है। कर्नाटक में अस्वाभाविक रूप से बनी गठबंधन सरकार अपने पहले दिन से तनावों का बोझ लेकर चल रही है। ऐसे में सिद्धारमैया का मौजूदा रुख कुमारस्वामी सरकार को जल्दी ही ले डूबे तो हैरानी नहीं।

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