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राम रहीम को 2002 से ही क्यों सीबीआई जांच से बचाती रही कांग्रेस, पढ़िए पूरी इनसाइड स्टोरी

राम-रहीम से राजनीतिक आशीर्वाद प्राप्त करती रही है कांग्रेस, रिपोर्ट

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भारतीय समाज में राजनीति और धर्म के घालमेल का मर्म समझना हो तो कांग्रेस की राजनीति को जानना जरूरी है। कांग्रेस पार्टी राजनीति को धर्म से मिलाती रही है और उसी बुनियाद पर कई दशकों तक सत्ता पर काबिज भी रही है। दरअसल कांग्रेस का यह चरित्र इसलिए बताना जरूरी है कि पार्टी ने समय की मांग के अनुरूप धर्म का चोला उतारा और ओढ़ा है। स्वतंत्रता के पश्चात की राजनीति में कांग्रेस बाबा राघव दास से लेकर चंद्रा स्वामी, अब्दुल्ला बुखारी और राम रहीम जैसे धार्मिक चेहरों के बूते चुनावों में जीत के कई कीर्तिमान गढ़ने में तो जरूर कामयाब रही है, लेकिन इस दौरान देश की सियासत को गर्त में लेकर चली गई है।

कांग्रेस और बाबा राम रहीम के बीच अघोषित समझौता
2007 के पंजाब विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जीत हासिल करने के लिए बाबा राम रहीम के साथ एक अघोषित समझौता किया। इस समय के कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक इस अघोषित समझौते के तहत बाबा राम रहीम ने फरवरी, 2007 में कांग्रेस को वोट देने के लिए अपने अनुयायियों को फरमान जारी कर दिया। विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को बाबा राम रहीम के प्रभाव वाले क्षेत्र में 32 सीटों पर विजय मिली। हालांकि राज्य में भाजपा और अकाली दल को ही जीत हासिल हुई। इस राजनीतिक फायदे के बाद कांग्रेस की केन्द्र में सरकार ने बाबा राम रहीम पर चल रही सीबीआई जांच को रोकने और धीमा करने का काम किया।

अमरिंदर सिंह और बाबा राम रहीम की घंटों मुलाकात का राजफाश?
2012 के पंजाब विधानसभा चुनाव में समर्थन मांगने के लिए एक बार फिर कांग्रेस बाबा राम रहीम के पास पहुंची। 27 जनवरी, 2012 को पंजाब कांग्रेस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह, हरियाणा के सिरसा में स्थित सच्चा सौदा के डेरे पर बाबा राम रहीम से घंटों तक बैठक की। ये रिपोर्ट 27 जनवरी, 2012 के जागरण पोस्ट में छपी है। 

यह बैठक 30 जनवरी को होने वाले विधानसभा चुनाव से तीन दिन पहले की गयी। 30 जनवरी, 2012 को पटियाला में कैप्टन अमरिंदर सिंह ने घोषणा की कि डेरा सच्चा सौदा ने अपने अनुयायियों को कांग्रेस को वोट देने के लिए कहा है। 30 जनवरी, 2012 के जागरण पोस्ट में ये खबर भी छपी है। दरअसल 2012 के विधानसभा चुनाव में बाबा राम रहीम ने अपने अनुयायियों को अंदर ही अंदर अपने सूचना तंत्र से कांग्रेस को वोट देने के लिए कहा, इस बार 2007 की तरह सार्वजनिक घोषणा नहीं की। 2012 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को डेरा सच्चा सौदा के समर्थन के बावजूद 31 सीटें ही मिल सकी। 

कांग्रेस ने दबाव डाला, बीजेपी ने जांच के लिए खुली छूट दी
डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के मामले में जिस तरीके से भाजपा सरकार ने कानून को अपना काम करने की खुली छूट दी, वो काबिल ए तारीफ है। पिंजरे में बंद सीबीआई को जांच करने की आजादी मिली और इन्वेस्टिगेशन में कानून की दृष्टि में अपराधी ठहराये गए राम रहीम को सलाखों के पीछे भी पहुंचाने में भूमिका निभाई। लेकिन यह भी तथ्य है कि कांग्रेस ने तो डेरा प्रमुख को बचाने के लिए सीबीआई पर दबाव भी डाला था और मामले को रफा-दफा करने की भी कोशिश की थी। 26 अगस्त, 2017 को इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर में सीबीआई के एक पूर्व अधिकारी एम नारायणन (इस जांच से जुड़े थे) ने खुलासा किया है कि किस तरह तत्कालीन कांग्रेसी सरकार ने सीबीआई पर दबाव बनाया था।

 

राम रहीम और कांग्रेस कनेक्शन
हरियाणा और पंजाब की राजनीति पिछले दो दशकों में कमोबेश बाबा राम रहीम के इर्द गिर्द घूमती रही है। दरअसल 1990 में डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख बनने के बाद से ही राम-रहीम ने नेताओं से अपनी पींगें बढ़ानी शुरू कर दी थी। तत्कालीन सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस से उनकी करीबी इस बात को जाहिर करती है। वोट बैंक की चाहत में कांग्रेस के नेता राम रहीम के कदमों में झुकते चले गए। कांग्रेस के ‘कु’कर्मों के कारण गुरमीत राम रहीम अपने समर्थकों के बल पर राजनीति में सीधी दखल दे रहे थे। कैप्टन अमरिंदर सिंह और भूपिंदर सिंह हुड्डा जैसे कद्दावर नेता भी वोट बैंक की खातिर राम रहीम के आगे नतमस्तक रहते थे।

जांच अधिकारी एम नारायणन ने खोला राज
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक हाईकोर्ट ने राम-रहीम के विरुद्ध जांच के आदेश दिए थे। लेकिन राम रहीम के राजनीतिक रसूख के कारण उनकी जांच में ढिलाई बरती गई। सीबीआई के जांच दल का नेतृत्व कर रहे एम नारायणन ने बताया है कि राजनीतिक रसूख के चलते 2002 से 2007 के बीच जांच में ज्यादा प्रगति नहीं हुई क्योंकि ज्यादातर गवाह और पीड़ित या तो मार दिए गए थे या फिर उन्होंने अपना बयान डर के मारे बदल लिया था।

राजनीतिक रसूख के आगे लाचार था कानून
बकौल एम नारयणन राम रहीम का राजनीतिक रसूख इतना बढ़ गया था कि सबूत होने के बावजूद उन्हें छूना आसान नहीं था। उस समय सरकार ने इस अपराधी (राम रहीम) को बचाने की हर कोशिश की। उन्होंने कहा है कि वोट बैंक की वजह से, हमारा कानून असहाय हो गया था और राजनीतिक रसूख अपना काम कर रहा था। जाहिर है तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने राम-रहीम के खिलाफ जांच को प्रभावित किया।

सीबीआई की निष्पक्ष जांच से बाबा पहुंचा सलाखों के पीछे
एक तरफ कांग्रेस की सरकारों ने पूरे कानून व्यवस्था को राम रहीम के आगे समर्पित कर दिया, वहीं भाजपा ने भक्ति और श्रद्धा से परे हटकर कानून को भी अपना काम करने दिया। डेरा सच्चा सौदा प्रमुख गुरमीत राम रहीम के मामले में जिस तरीके से भाजपा सरकार ने कानून को अपना काम करने की खुली छूट दी, वो काबिल ए तारीफ है। पिंजरे में बंद सीबीआई को जांच करने की आजादी मिली और इन्वेस्टिगेशन में कानून की दृष्टि में अपराधी ठहराये गए राम रहीम को सलाखों के पीछे भी पहुंचाने में भूमिका निभाई।

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कांग्रेस की वजह से राम-रहीम का राजनीतिक रसूख दूसरे राज्यों तक फैला
आज उत्तर प्रदेश के बागपत, हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा और दिल्ली से लेकर राजस्थान में श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, कोटा, बीकानेर, उदयपुर, जयपुर तक डेरा की शाखाएं फैल चुकी हैं।. मध्य प्रदेश के सीहोर, छत्तीसगढ़ के कोरबा, महाराष्ट्र के सतारा, गुजरात के भुज, कर्नाटक के मैसूर से लेकर उड़ीसा के पुरी तक डेरा सच्चा सौदा के आश्रम स्थापित हैं।

बाबा राम रहीम कई बार अपने कार्यक्रमों के लिए केरल जाते रहे हैं। 2010 में एक यात्रा के दौरान मुन्नार में उनकी गाड़ियों के काफिले ने एक व्यक्ति को टक्कर मारकर टांग तोड़ दी थी, लेकिन बाबा के खिलाफ कोई केस नहीं हुआ। 2015 में नेशनल गेम्स के उद्घाटन के समय भी मौजूद थे और मुख्यमंत्री ओमन चांडी से मुलाकात और बातचीत हुई।

कांग्रेस ने की थी ‘डेरा’ पॉलिटिक्स की शुरुआत
ऐसे तो हरियाणा-पंजाब में कई डेरे ऐसे हैं, जिनके लाखों अनुयायी हैं। तमाम राजनेता उन डेरों पर मिलने, गुरुओं का आशीर्वाद लेने इसलिए जाते रहे हैं कि उनके समर्थकों का वोट मिल जाए। लेकिन कांग्रेस तो डेरों को सीधा राजनीति के मैदान में ले आई। दरअसल डेरा पॉलटिक्स की शुरुआत कांग्रेस के ही ज्ञानी जेल सिंह से मानी जाती रही है। सबसे पहले जैल सिंह ही इन डेरों पर जाना शुरू कर दिया। इस तरह डेरों पर नेताओं का जाना 1972 से ही शुरू हो गया था। हालांकि डेरे के गुरू खुलकर राजनीतिक पार्टियों के समर्थन से बचते रहे। लेकिन 2002 में मुख्यमंत्री बनने के बाद यही फॉर्मूला कैप्टन अमिरंदर सिंह ने भी आजमाया, उन्होंने डेरों पर जाना शुरू कर दिया। उस दौर से ही राम-रहीम का राजनीतिक रसूख काफी बढ़ गया।

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कांग्रेसी नेता का दामाद है बाबा राम रहीम का उत्तराधिकारी
बाबा राम रहीम भटिंडा के पूर्व कांग्रेसी विधायक हरमिंदर सिंह जस्सी का समधी है। राम रहीम के इकलौते बेटे जसमीत सिंह इंसा की शादी, पंजाब के कांग्रेस के नेता और भटिंडा के पूर्व विधायक हरमिंदर सिंह जस्सी की बेटी हुस्नमीत इंसा से हुई है। जसमीत सिंह इंसा को बाबा राम रहीम ने 2007 से अपना उत्तराधिकारी घोषित किया हुआ है। यानी कांग्रेसी नेता का दामाद जसमीत सिंह इंसा बाबा राम रहीम के जेल जाने के बाद, डेरा सच्चा सौदा का मुखिया है।

कुल मिलाकर देखें तो जिस प्रकार से भक्ति भाव को बहुत ज्यादा महत्त्व देने वाली भाजपा ने क्राइम के मामले में कानून को अपना काम करने दिया, वो कानून के प्रति एक विश्वास को प्रदर्शित करता है।

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