Home चुनावी हलचल अमेठी-रायबरेली में हार का डर: बसपा-सपा को साथ लाना चाहती है कांग्रेस

अमेठी-रायबरेली में हार का डर: बसपा-सपा को साथ लाना चाहती है कांग्रेस

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उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनावों में समाजवादी पार्टी से औपचारिक गठबंधन करने के बावजूद कांग्रेस एक तरह से प्रदेश में मटियामेट हो गई। सबसे पुरानी पार्टी की दुहाई देने में नहीं थकने वाली पार्टी सीटों के मामले में वहां अबतक के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच चुकी है। लोकसभा चुनावों में मोदी लहर के चलते पार्टी को अमेठी और रायबरेली के गढ़ को बचाने में पसीने छूट गए थे। विधानसभा चुनाव परिणामों से तय हो चुका है कि वहां भी उनकी लुटिया डूबनी तय है। अंग्रेजी अखबार इकॉनोमिक्स टाइम्स के मुताबिक अमेठी और रायबरेली के चुनावी आंकड़ों को देखने से पता चल जाएगा कि कांग्रेस, एक हाथ से समाजवादी पार्टी की साइकिल और दूसरे से बीएसपी के हाथी की पूंछ पकड़ने के लिए क्यों छटपटा रही है।

कांग्रेस के रणनीतिकार जानते हैं कि यूपी विधानसभा चुनावों में सपा के साथ गठबंधन बहुत बड़ी गलती थी। लेकिन फिर भी पार्टी नेतृत्व में बसपा से तालमेल की भी ललचाहट दिख रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आंधी में कांग्रेस और बाकी पार्टियां एक के बाद एक राज्यों से उखड़ती चली जा रही हैं। कांग्रेस को इस बात का डर सता रहा है कि कहीं अबकी बार रायबरेली से सोनिया गांधी (या प्रियंका वाड्रा) और अमेठी से राहुल गांधी भी न हार जाएं। क्योंकि ले-देकर इन्हीं दो सीटों पर तो पिछली लोकसभा चुनाव में कांग्रेस की लाज बची थी।

तो अमेठी में हार जाएंगे राहुल ?
हाल में संपन्न हुए विधानसभा चुनावों में अमेठी लोकसभा की पांच विधानसभा सीटों के वोटों के आंकड़े को देखें तो कांग्रेस, भाजपा से एक लाख से भी अधिक वोटों से पिछड़ रही है। यहां गौर करने वाली बात ये है कि कांग्रेस और सपा ने गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा, फिर भी 5 में से 4 सीटें बीजेपी जीती और कांग्रेस का खाता भी नहीं खुला। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस सीट से 1 लाख 8 हजार वोटों से जीते थे। तब समाजवादी पार्टी ने यहां अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था, फिर भी 2009 के मुकाबले राहुल के करीब 25 प्रतिशत वोट घट गए थे। यानी 2014 में कांग्रेस ने जिस राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनाने का सपना देखा था, उनके लिए आज की तारीख में अपनी सीट बचाने के भी लाले पड़ गए हैं।

रायबरेली सीट भी सुरक्षित नहीं
रायबरेली में विधानसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि यहां कांग्रेस को 30 हजार वोटों की बढ़त तो हासिल है, लेकिन 5 विधानसभा सीटों में से 2 पर कब्जा करके बीजेपी ने कांग्रेस के कान खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस के लिए भय की वजह ये भी है कि 2014 में कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस सीट से 3.5 लाख से भी ज्यादा वोटों के अंतर से जीती थीं। यानी तीन साल से कम वक्त में ही यहां पार्टी का जनाधार बुरी तरह खिसक चुका है। सपा ने तब भी सोनिया के खिलाफ उम्मीदवार नहीं उतारा था। यानी अब रायबरेली सीट भी गांधी परिवार के लिए सुरक्षित नहीं बची है, तो दक्षिण भारत की किसी सीट से उम्मीद रखना ही बेमानी लगता है।

अमेठी-रायबरेली नतीजों के सियासी मायने
आम चुनावों में यूपी में कांग्रेस 21 सीटों से खिसकर 2 सीटों पर पहुंच गई थी। जब लोग वोट डालने गए थे तो किसी ने नहीं सोचना था कि केंद्र में सत्ताधारी पार्टी की प्रदेश में ऐसी दुर्गति होने वाली है। ऐसा ही इसबार विधानसभा चुनावों में भी हुआ। कांग्रेस 28 सीटों से घटकर अबतक के सबसे कम 7 सीटों पर सिमट गई, वो भी तब जब राहुल गांधी को अखिलेश यादव ने अपनी साइकिल पर बिठाया था। अगर रायबरेली और अमेठी के टिमटिमाते तारों को संकेत मानें तो कांग्रेस के राजनीतिक दुर्दिन आने अभी बाकी है।

आम चुनावों में राहुल के नेतृत्व में लड़ने के बाद से कांग्रेस पार्टी कई राज्यों की सत्ता से हट चुकी है। लोकसभा में उसकी ताकत ऐतिहासिक रूप से गिरकर 44 सीटों तक पहुंच चुकी है। देश की जो राजनीति पहले कांग्रेस को केंद्र में रखकर घूमती थी, उससे कहीं अच्छी स्थिति में आज भाजपा ने खुद को स्थापित कर लिया है। खासतौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुवाई में जिस तरह से देश आगे बढ़ता जा रहा है, उसने कांग्रेसी संस्कृति वाली राजनीति के सपनों को चकनाचूर करके रख दिया है। कांग्रेस और गांधी-नेहरू परिवार के सामने सियासी अस्तित्व को बचाने का संकट है। जिस कांग्रेस मुक्त भारत की बात प्रधानमंत्री मोदी ने आम चुनावों से पहले की थी, वो साकार हो रहा है। कांग्रेस भले ही कुछ जगहों पर सत्ता में बची हो, लेकिन उसकी चूलें हिल चुकी हैं। मरता क्या न करता, यही वजह है कि सपा-बसपा को एक मंच पर लाने के लिए किसी भी हद तक जाने के लिए तैयार हो गई है। वह भाजपा विरोधी गठबंधन बनाने की ताक में जुटी हुई है।

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