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फिर साबित हुआ कांग्रेस में नहीं है आंतरिक लोकतंत्र, बिना CWC के राहुल की हनक से चल रही है पार्टी

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कांग्रेस पार्टी में कोई आंतरिक लोकतंत्र नहीं है। यह बात कल भी सच थी और आज भी सच है। सभी को पता है कि राहुल गांधी को वंशवाद की राजनीति के तहत कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाया गया। जाहिर है जब योग्यता की जगह वंशवाद को तरजीह देकर राहुल को अध्यक्ष बनाया गया है तो राहुल अपने हिसाब से ही पार्टी चलाएंगे। कांग्रेस अध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी बगैर किसी राय मशविरे के अपनी हनक से पार्टी चला रहे हैं। यह बात इसलिए कही जा रही है कि इस वक्त पार्टी बिना कांग्रेस वर्किंग कमेटी (CWC) के संचालित हो रही है। कांग्रेस पार्टी में CWC सर्वोच्च कमेटी है और इसी कमेटी में विचार विमर्श के बाद बड़े नीतिगत फैसले लिए जाते हैं। राहुल गांधी ने एक ऐसा रिकॉर्ड बना दिया है, जो पहले किसी भी अध्यक्ष ने नहीं बनाया था। सर्वाधिक समय यानी चार महीने से CWC का गठन नहीं हुआ है।

राहुल ने बिना CWC  के पार्टी चलाने का बनाया रिकॉर्ड
कांग्रेस पार्टी के पुराने नेताओं का कहना है कि उन्हें याद नहीं कि किसी नए पार्टी अध्यक्ष ने कभी वर्किंग कमेटी के बिना इतने वक्त तक काम किया हो। कांग्रेस के ज्यादातर पदाधिकारियों को यह पता नहीं है कि आखिर राहुल गांधी वर्किंग कमेटी बनाने में देरी क्यों कर रहे हैं। कांग्रेस वर्किंग कमेटी के गठन में अप्रत्याशित देरी से पता चलता है कि पार्टी कितने लचर ढंग से चल रही है। दिल्ली में पार्टी के पूर्ण सत्र के बाद राहुल गांधी ने कुछ राष्ट्रीय महासचिवों की पद से छुट्टी कर दी। जबकि अशोक गहलोत, ओमन चांडी, मल्लिकार्जुन खड़गे सहित तीन नए महासचिव बनाये थे। यहां तक कि पहले के महासचिवों में अंबिका सोनी, गुलाम नबी आजाद, मुकुल वासनिक, सीपी जोशी, केसी वेणुगोपाल, अविनाश पांडे, दीपक बाबरिया और कमलनाथ को पद पर बनाये रखा है।

जाहिर है कि आजादी के बाद से ही कांग्रेस पार्टी नेहरू-गांधी खानदान की बपौती बन चुकी है। आपको आगे बताते हैं किस तरह कांग्रेस पार्टी पर नेहरू-गांधी खानदान के लोगों का राज रहा है और इन लोगों ने मनमाने तरीके से पार्टी को चला है।-

कांग्रेस यानी गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड !
देश आजाद होने के बाद बाद महात्मा गांधी ने कांग्रेस के बारे में एक महत्वपूर्ण बयान दिया था। उन्होंने कांग्रेस को भंग कर देने की बात कही थी। आज वो बयान फिर से महत्वपूर्ण हो गया है। पिछले वर्ष 16 दिसबंर को राहुल गांधी औपचारिक रूप से अध्यक्ष बन गए थे। ऐसे में इस बात का आकलन करना जरूरी है कि क्या कांग्रेस को लेकर महात्मा गांधी के मन में कोई संदेह था। अगर इसका विश्लेषण करें तो कांग्रेस पार्टी में नेहरू परिवार के कब्जे का महात्मा गांधी को उस समय ही अंदेशा हो गया था। 

आजादी के 70 साल, 53 साल तक शीर्ष पद पर कब्जा
ये हेडर चौंकाने वाला है। लेकिन कांग्रेस और नेहरू परिवार की यही सच्चाई है। अगर कांग्रेस और प्रधानमंत्री पद के लिए नेहरू परिवार की समय सीमा निकालें तो आजादी के 70 साल में 53 साल तक इस परिवार का किसी न किसी या फिर दोनों पदों पर एक साथ कब्जा रहा है।

नेहरू परिवार ने कांग्रेस को जागीर बनाई
हमने आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, उनकी बेटी इंदिरा गांधी, फिर उनके बेटे राजीव गांधी, राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी के कार्यकाल का आकलन किया है। आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि किस प्रकार तिलक से लेकर गांधी की पार्टी को एक परिवार ने अपनी जागीर बना ली। कई बार तो ऐसा वक्त भी आया जब नेहरू तक ने प्रधानमंत्री के साथ साथ पार्टी अध्यक्ष के पद पर भी अपना कब्जा जमा लिया।

इन आंकड़ों से साफ है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में किस तरह एक ही परिवार का कब्जा है, अब सवाल यह उठता है कि पूरी दुनिया में अपने गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपरा की पहचान बनाने वाले भारत देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में आखिर आंतरिक लोकतंत्र क्यों नहीं है ? आखिर क्यों कांग्रेस पार्टी वंशवाद और परिवारवाद से बाहर निकल कर आम कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं देती?

कांग्रेस में वंशवाद को थोपने का नतीजा भी सामने आ चुका है। राहुल गांधी जब से कांग्रेस में प्रमुख भूमिका में आए हैं, पार्टी के दुर्दिन शुरू हो गए। डालते हैं एक नजर-

राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने बनाया हारने का रिकॉर्ड
जब से राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी में प्रभावकारी भूमिका में आए हैं, तभी से कांग्रेस पार्टी के दुर्दिन शुरू हो गए। पिछले वर्षों पर नजर डालें तो राहुल के नेतृत्व में जितने भी चुनाव लड़े गए एक में भी कांग्रेस पार्टी को सफलता नहीं मिली है। राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद कांग्रेस को गुजरात, हिमाचल प्रदेश, त्रिपुरा, नगालैंड, मेघालय और कर्नाटक में हार का मुंह देखना पड़ा है। इसके पहले उपाध्यक्ष के रूप में दिल्ली, अरूणाचल प्रदेश, असम, छत्तीसगढ़, गोवा, उत्तराखंड, मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, महाराष्ट्र, राजस्थान, मणिपुर, हरियाणा, आंध्र प्रदेश, तेलांगना और 2014 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा।

वंशवाद की राजनीति थोपने का मिला जवाब
कर्नाटक में कांग्रेस पार्टी का जो हश्र हुआ है, वह उसके कुकर्मों का ही फल है। देश की सबसे पुरानी पार्टी, जिसका कभी लगभग पूरे देश पर शासन था, आज इतनी बुरी हालत से क्यों गुजर रही है। जाहिर है कि इसके लिए सिर्फ और सिर्फ वंशवाद की राजनीति जिम्मेदारा है। कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है, वहां जो कुछ भी होता है, वह एक ही परिवार के लिए होता है। गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड बन चुकी कांग्रेस पार्टी में जिस तरह राहुल गांधी की अध्यक्ष के पद पर ताजपोशी हुई है, उसने साबित कर दिया है कि कांग्रेस मतलब गांधी परिवार। जब उच्च स्तर पर वंशवाद होगा तो नीचे भी इसका असर दिखेगा। इसीलिए कांग्रेस पार्टी में निचले स्तर पर भी वंशवाद, परिवारवाद हावी है। जनता इस परिवारवाद के खिलाफ है और उसने कांग्रेस को इसका सबक सिखाया है।

अपने कर्मों से क्षेत्रीय पार्टी बनने की ओर कांग्रेस
कांग्रेस पार्टी कहने को तो राष्ट्रीय दल है, लेकिन अब वह सिर्फ तीन राज्यों तक सिमट गई है। आने वाले दिनों में कोई बड़ी बात नहीं कि इनमें से भी एक-दो राज्य कांग्रेस के हाथ से खिसक जाएं। मतलब कभी राष्ट्रीय दल का रुतबा रखने वाला यह दल अब क्षेत्रीय दल बनता जा रहा है। इससे तो अच्छे कई दूसरी रीजनल पार्टियां हैं, जिनकी बड़े-बड़े राज्यों में सरकार है। उत्तर भारत में उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, उत्तराखंड, झारखंड सरीखे राज्यों से तो कांग्रेस का पहले ही सफाया हो चुका है और अब दक्षिण के आखिरी गढ़ से भी कांग्रेस का बोरिया-बिस्तर सिमट चुका है।

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