Home विपक्ष विशेष फिर हुआ साबित, कांग्रेस पार्टी है ‘गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड’

फिर हुआ साबित, कांग्रेस पार्टी है ‘गांधी परिवार प्राइवेट लिमिटेड’

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एक बार फिर साबित हो गया है कि कांग्रेस पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं है। कांग्रेस पार्टी में सिर्फ गांधी परिवार की ही चलती है। कांग्रेस पार्टी में हर बड़ा फैसला गांधी परिवार के सदस्य ही लेते हैं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि तीन राज्यों में जीत के बाद कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री तय करने को लेकर जो ड्रामा चल रहा है, उसमें आम कार्यकर्ताओं, जीते हुए विधायकों की राय को दरकिनार कर दिया गया है। लोकतंत्र का मुताबिक मुख्यमंत्री कौन होगा, यह जीते हुए विधायक करते हैं, लेकिन कांग्रेस पार्टी में मुख्यमंत्री ने नाम का फैसला दिल्ली दरबार में हो रहा है। इस पर भी हद तो तब हो गई जब पार्टी अध्यक्ष राहुल गांधी भी इसका फैसला नहीं कर पाए और इसमें उनकी मां सोनिया गांधी और बहन प्रियंका गांधी ने भी दखल दिया।

मुख्यमंत्री चुनने में सोनिया और प्रियंका की चली
गुरुवार को दिल्ली में चले हाई वोल्टेज ड्रामे में दिन भर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्रियों के नाम तय करने का ड्रामा चलता रहा। बताया जा रहा है कि मुख्यमंत्री का नाम तय करने में कांग्रेस की कोर कमेटी का कोई योगदान नहीं है। इसमें सिर्फ सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी की चल रही है। सोनिया गांधी तो चलो पार्टी की पूर्व अध्यक्ष हैं, लेकिन प्रियंका गांधी वाड्रा किस हैसियत से इतना बड़ा फैसला लेने में दखल दे रही हैं यह समझ के परे हैं। इससे ये साबित होता हो जाता है कि कांग्रेस में सब कुछ दिखावा है, दरअसल इस वंशवादी पार्टी का हर फैसला राहुल, सोनिया और प्रियंका ही करते हैं। बताया जा रहा है कि राहुल तो मध्यप्रदेश की कमान ज्योतिरादित्य सिंधिया को देना चाहते थे, लेकिन सोनिया और प्रियंका इस पर सहमत नहीं थी और कमलनाथ को सीएम बनाना चाहती थीं। इसी प्रकार राजस्थान में सीएम पद के लिए राहुल की पसंद सचिन पायलट बताए जा रहे हैं, लेकिन यहां भी सोनिया और प्रियंका की पसंद यानी अशोक गहलोत के हाथ बाजी लगी है।

राहुल को कोई चुनौती नहीं मिले, इसलिए सिंधिया और पायलट से किनारा
बताया ये भी जा रहा है कि सोनिया गांधी कतई नहीं चाहती हैं कि उनके बेटे राहुल गांधी को पार्टी के भीतर से कोई चुनौती मिले। यह जग जाहिर है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट राजनीतिक रूप से राहुल गांधी का काफी परिपक्व हैं। इसीलिए सोनिया गांधी को डर है कि यदि इन दोनों को मुख्यमंत्री के पद पर बैठा दिया गया तो आगे चलकर ये राहुल गांधी के लिए चुनौती पेश कर सकते हैं। इसलिए इन दोनों युवा नेताओं को जनसमर्थन के बाद भी सीएम का पद नहीं सौंपा गया है।

आगे आपको बताते हैं कि किस तरह देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस पर आजादी के बाद से ही नेहरू-गांधी परिवार का कब्जा रहा है।

आजादी के 70 साल, 53 साल तक शीर्ष पद पर कब्जा
ये हेडर चौंकाने वाला है। लेकिन कांग्रेस और नेहरू परिवार की यही सच्चाई है। अगर कांग्रेस और प्रधानमंत्री पद के लिए नेहरू परिवार की समय सीमा निकालें तो आजादी के 70 साल में 53 साल तक इस परिवार का किसी न किसी या फिर दोनों पदों पर एक साथ कब्जा रहा है।

नेहरू परिवार ने कांग्रेस को जागीर बनाई
हमने आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू, उनकी बेटी इंदिरा गांधी, फिर उनके बेटे राजीव गांधी, राजीव गांधी की पत्नी सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी के कार्यकाल का आकलन किया है। आंकड़े यह बताने के लिए काफी हैं कि किस प्रकार तिलक से लेकर गांधी की पार्टी को एक परिवार ने अपनी जागीर बना ली। कई बार तो ऐसा वक्त भी आया जब नेहरू तक ने प्रधानमंत्री के साथ साथ पार्टी अध्यक्ष के पद पर भी अपना कब्जा जमा लिया।

कांग्रेस और भाजपा के 19 वर्षों की तुलना
19 वर्षों में जहां कांग्रेस इंदिरा गांधी की विदेशी बहू सोनिया गांधी के अलावा किसी को नहीं ढूंढ पाई। 1998 के बाद से लगातार सोनिया गांधी निर्विरोध तरीके से कांग्रेस पार्टी की अध्यक्ष बनी रहीं। वहीं दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो पिछले 19 वर्षों में भाजपा के 9 अध्यक्ष बन चुके हैं। कांग्रेस में जहां आंतरिक लोकतंत्र कहीं दिखाई नहीं देता वहीं भाजपा में हर दो तीन साल में लोकतांत्रिक तरीके से अध्यक्ष बदला जाता रहा है। नीचे दिए गए आंकड़े इसे समझने के लिए काफी हैं।

इन आंकड़ों से साफ है कि देश की सबसे पुरानी पार्टी में किस तरह एक ही परिवार का कब्जा है, अब सवाल यह उठता है कि पूरी दुनिया में अपने गौरवशाली लोकतांत्रिक परंपरा की पहचान बनाने वाले भारत देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस में आखिर आंतरिक लोकतंत्र क्यों नहीं है ? आखिर क्यों कांग्रेस पार्टी वंशवाद और परिवारवाद से बाहर निकल कर आम कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का मौका नहीं देती?

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