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राहुल-सोनिया के लिए हिंदी ही खत्म कर देना चाहती है कांग्रेस!

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क्या राहुल-सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस हिंदी को ही खत्म कर देना चाहती है? क्या कांग्रेस हिंदी के खिलाफ हैं? क्या कांग्रेसी नेता हिंदी को देवनागरी लिपि से बदल कर रोमन लिपि में करना चाहते हैं? क्या आजादी के सत्तर साल बाद भी कुछ कांग्रेसी नेता गुलामी की मानसिकता से बाहर नहीं निकले हैं? क्या भारत के पिछड़े रहने का सबसे बड़ा कारण कांग्रेसी नेताओं की अंग्रेजी मानसिकता रही है? क्या कांग्रेसी नेताओं के अंग्रेजी में सोचने के कारण ही देश अभी तक हिन्दी के विकास के रास्ते पर ठिठका हुआ था?

ये सवाल वैसे ही नहीं उठ रहे हैं। दरअसल कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह ने एक ट्वीट किया है जिसमें कहा गया है कि राहुल गांधी ने एक बार फिर राह दिखाई है। हिंदी को देवनागरी त्यागने और रोमन लिपि अपनाने की जरूरत है। इस ट्वीट के साथ ही दिग्विजय सिंह ने ना सिर्फ हिंदी का मजाक उड़ाया है, बल्कि इस गुलामी की मानसिकता को भी प्रदर्शित किया है कि अगर सोनिया गांधी और राहुल गांधी अब तक हिंदी नहीं सीख पाए हैं तो हिंदी ही बदल डालो।

देखिए कांग्रेस नेता की इस बेशर्मी पर सोशल मीडिया में क्या चल रहा है –

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ठीक से ना तो हिंदी लिख पाते हैं और ना ही बोल पाते हैं। राहुल हिंदी भी रोमन में लिखा पढ़ पाते हैं। संसद भवन में भी राहुल गांधी रोमन में लिखे नोट को पढ़कर हिंदी बोलते हैं। इस कारण कई बार अर्थ का अनर्थ हो जाता है। इस बात को लेकर राहुल की कई बार किरकिरी भी हो चुकी है।

 

इतने साल बाद भी राहुल हिंदी सीख नहीं पाए तो कांग्रेस अब हिंदी ही बदल देना चाहती है। ज्यादातर कांग्रेसी नेता हिंदी जानते हुए भी अंग्रेजी बोलते हैं। कांग्रेसी नेता हिंदी बोलने वालों को पिछड़ा-जाहिल और गंवार समझते रहे हैं। हिंदी के नाम पर देश के लोगों को लड़ाते रहे हैं। हिंदी को आगे बढ़ाने के लिए कुछ नहीं किया और अंग्रेजी को रोजगार की भाषा बता इसका प्रचार-प्रसार करते रहे।

देशभर में चुनावों में कांग्रेस की दुर्गति का एक कारण इसके अंग्रेजीदा नेताओं का जनाधार ना होना भी है। अंग्रेजीदा कांग्रेसी नेता आम लोगों से सहीं संप्रेषण नहीं कर पाए। आजादी के काफी दिनों तक कांग्रेसी नेता देश पर राज करते रहे लेकिन इनके नेताओं की पोल खुलने के बाद लोग पार्टी से दूर होते गए।

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