Home विचार अविश्वास प्रस्ताव से कांग्रेस ने खो दिया देश का बचा-खुचा विश्वास

अविश्वास प्रस्ताव से कांग्रेस ने खो दिया देश का बचा-खुचा विश्वास

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20 जुलाई 2018 को विपक्ष का ऐतिहासिक अविश्वास प्रस्ताव 325 मतों के मुकाबले 126 मतों से सदन में धाराशायी हुआ। विपक्ष की इस हार में सबसे बड़ी हार, कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गांधी की हुई। कांग्रेस ने इस अविश्वास प्रस्ताव का समर्थन इसलिए किया था कि 2019 के आम चुनाव से पहले यह एक उपयुक्त अवसर होगा जब प्रधानमंत्री मोदी पर सीधा हमला बोलकर, अपने को विपक्ष का सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित कर लेंगे। लेकिन राहुल के नौटंकी वाले भाषण का दांव उलटा पड़ा और कांग्रेस चारों खाने चित्त हो गई। राहुल गांधी खोखले साबित हुए-टीवी के पर्दे के जरिए, पूरे देश ने देखा कि कांग्रेस अध्यक्ष ने अपने को प्रधानमंत्री पद का दावेदार साबित करने के लिए सदन में जो कुछ भी किया वह नौटंकी और बचकानी हरकतें थी, जिससे उनकी दावेदारी खोखली साबित हुई। बारह घंटों तक चले अविश्वास प्रस्ताव का टीवी पर सजीव प्रसारण देखकर जनता यह समझ गई कि कांग्रेस के पास देश को नेतृत्व देने के लिए कोई काबिल व्यक्ति नहीं है वह भी तब जब सत्ता में एक ऐसा प्रधानमंत्री है जो पिछले चार साल से देश के विकास के लिए लगातार काम कर रहा है।

राहुल गांधी ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान जो बातें कहीं और जिस अंदाज और भावभंगिमा के साथ जनता के सामने प्रस्तुत किया, उससे जनता में उनके प्रति और अविश्वास बढ़ा। राहुल गांधी की नौटंकी ही नहीं उनके तर्कों और साक्ष्यों से भी जनता ने उनको सीरियस नेता के रुप में नहीं लिया। अविश्वास प्रस्ताव के दौरान, राहुल गांधी को एक सीरियस नेता न मानने के पीछे जनता के पास कई कारण हैं-

झूठे आरोपों से- राहुल गांधी ने सदन के पटल पर सूरमा की तरह हाथ लहराते हुए जिस तरह से राफेल डील के बारे में झूठ बोला, उससे जनता ने उनको एक सीरियस नेता के रूप में नहीं लिया। राहुल गांधी ने सदन में कहा कि फ्रांस के राष्ट्रपति ने उनसे व्यक्तिगत मुलाकात में बताया है कि राफेल डील से जुड़ी सूचनाओं को साझा न करने का कोई समझौता भारत के साथ नहीं है, लेकिन कुछ ही घंटों में फ्रांस की सरकार की तरफ से यह बयान आ गया कि राहुल गांधी झूठ बोल रहे हैं, भारत और फ्रांस के बीच समझौता है जिसके तहत विशेष सूचनाओं को सुरक्षा के कारण साझा नहीं किया जा सकता है।देश को बदनाम करने से– राहुल गांधी ने सदन में जिस तरह से डोकलाम, सर्जिकल स्ट्राइक औऱ फ्रांस के साथ हुए राफेल डील पर देश को कमजोर और लाचार हालत में पेश करने का प्रयास किया, उससे जनता को लगा कि राहुल गांधी देश की सेना और शक्ति पर भरोसा ही नहीं करते हैं, बल्कि उसे बदनाम कर रहे हैं। पाकिस्तान पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक के समय भी राहुल गांधी ने सरकार से सबूत मांग करके देश की जो बदनामी की थी, उससे जोड़कर जनता ने यही समझा कि राहुल गांधी का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद है कि राजनीति के लिए देश को बदनाम करना ।बचकानी हरकतों से- राहुल गांधी, सदन में भाषण देने के बाद, अचानक जाकर प्रधानमंत्री मोदी के गले पड़ जाते हैं और वापस आकर अपनी सीट पर बैठते समय अपने मित्र ज्योतिरादित्य सिधिंया को आंख मारते हैं, उसे टीवी के परदे पर देखकर जनता को राहुल गांघी कि वे सारी पुरानी नौटंकियां भी ताजा हो गई, जो अक्सर वे पिछले एक दशक के दौरान रह रहकर करते रहे हैं। अपनी ही यूपीए-2 की सरकार के अध्यादेश को, दिल्ली के प्रेस क्लब में प्रेस कान्फ्रेंस के दौरान फाड़ दिया था। इसी तरह से उत्तर प्रदेश के चुनाव प्रचार में एक कागज को भी फाड़ा था। जनता को राहुल गांधी का व्यक्तित्व उधार का लगता है जो दूसरों के कहने पर समय समय पर नौटंकी करते रहते हैं। प्रधानमंत्री के साथ ओझी हरकत करने से – राहुल गांधी देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस के अध्यक्ष हैं , जनता उनसे उम्मीद करती है कि वे अपने व्यवहार और विचारों से एक परिपक्व नेता का परिचय दें, लेकिन राहुल गांधी इन मानदंडों पर कभी खरे नहीं उतरे। जनता हमेशा यही देखती रही है कि वह किसी न किसी राजनीतिक नेता की नकल करते हैं, लेकिन नकल करने में भी अक्ल का इस्तेमाल नहीं करते हैं। जनता यह समझती है कि राहुल गांधी की राजनीति सकारात्मक मुद्दों से हटकर प्रधानमंत्री मोदी को किसी न किसी तरह से छोटा साबित करने की राजनीति पर टीकी हुई है। इसका एक भौड़ा उदाहरण अविश्वास प्रस्ताव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी के गले पड़ने से लेकर आंख मारने तक में दिखा। राहुल गांधी की इन ओझी हरकतों से जनता उन्हें सीरयसली नहीं लेती।भाषण और व्यवहार से- राहुल गांधी के भाषण और व्यवहार से जनता में  विश्वास पैदा नहीं होता कि राहुल गांधी इस देश को नेतृत्व देने वाले एक सशक्त विकल्प हैं। उनके भाषणों से जनता को न तो कोई उर्जा मिलती है और न ही कोई दिशा मिलती है। राहुल गांधी का सार्वजनिक व्यवहार, जनता को बार बार यही बताता है कि वह देश की सेवा करने के लिए नहीं बल्कि सत्ता पर कांग्रेस को पहुंचाने के लिए सारा संघर्ष कर रहे हैं। उनके विचारों में जनता को एक जबरदस्त कंफ्यूजन दिखाई देता है।

राहुल गांधी, उम्र के इस पड़ाव पर जिम्मेदारी पूर्ण व्यवहार करने से चूक जाते हैं, जिससे जनता का यह विश्वास पक्का होता है कि कांग्रेस ऐसे देश का नेतृत्व देने में सक्षम नहीं है, जिसकी विविधाताऐं किसी राजनेता के लिए चुनौती भी हैं और अवसर भी हैं जो इस तथ्य पर निर्भर करता है कि वह उन्हें कैसे पिरोता है।

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