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कर्नाटक में सरकार बनाने के लिए ‘अनैतिक’ हथकंडे अपना रही कांग्रेस

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बीते पांच वर्षों के कांग्रेस के कुशासन और विभाजनकारी राजनीति को कर्नाटक की जनता ने नकार दिया, लेकिन कांग्रेस है कि मानती ही नहीं। बैकडोर से सत्ता में बैठे रहने की चाहत में वह ‘अनैतिक’ हथकंडे अपना रही है। गौरतलब है कि चुनाव से पहले जिन दो दलों ने एक दूसरे को पानी पी-पी कर कोसा वह सत्ता के लोभ में चुनाव बाद गलबहियां कर रहे हैं।

दरअसल कांग्रेस और जेडीएस दोनों ही लोकतंत्र की मर्यादा को भूल चुके हैं और चुनाव बाद एक ‘अनैतिक’ गठबंधन के सहारे सत्ता का सुख भोगना चाहते हैं। ‘अनैतिक’ इसलिए भी कि दोनों ही दलों ने एक दूसरे की खामियों को गिनाते हुए जनता से वोट मांगे थे। ऐसे में सिर्फ सत्ता सुख के लिए चुनावी गठबंधन ‘अनैतिक’ नहीं तो और क्या है? बहरहाल न सिर्फ ‘अनैतिक’ गठबंधन को अंजाम दिया जा रहा है, बल्कि सत्ता में आने के लिए कांग्रेस पार्टी लोकतंत्र की हत्या करने पर भी उतर आई है।

विधायकों को ‘कैद’ करने के लिए रिजॉर्ट के 120 कमरे बुक
लोकतंत्र का हरण करने की अपनी परम्परा को कांग्रेस कर्नाटक में भी आगे बढ़ा रही है। दरअसल प्रदेश में कई विधायकों ने जेडीएस से गठजोड़ करने के खिलाफ बागी रुख अपना लिया है, इसलिए उनके भारतीय जनता पार्टी के साथ आने की संभावना जताई जा रही है। हालांकि कांग्रेस ने अपने विधायकों के लोकतांत्रिक अधिकार का भी खयाल नहीं रखा है और बेंगलुरू के इग्लटन रिजॉर्ट के 120 कमरे बुक करवा लिए हैं। जाहिर है इसी होटल में पार्टी के विधायकों को विधानसभा में विधायकों के मतदान तक कैद रखा जाएगा। गौरतलब है कि कांग्रेस पार्टी वर्ष 2017 में गुजरात राज्यसभा के चुनाव के दौरान भी इसी तरह के अनैतिक कृत्य के सहारे अहमद पटेल को जिताने में कामयाब रही थी।

राज्यपाल पर गैर जरूरी दबाव बनाने की कोशिश में कांग्रेस
कांग्रेस बार-बार राज्यपाल वजुभाई वाला पर दबाव बनाने का काम कर रही है कि वे कांग्रेस और जेडीएस को सरकार बनाने का न्योता दें। जबकि जनादेश में यह स्पष्ट है कि पहले नंबर पर बीजेपी, दूसरे पर कांग्रेस और तीसरे पर जेडीएस है, परन्तु कांग्रेस कह रही है कि राज्यपाल किसी का पक्ष नहीं ले सकते हैं। कांग्रेस राज्यपाल पर यह भी दबाव बना रही है कि वे सबसे बड़ी पार्टी के नेता होने के बाद भी येदियुरप्पा के संवैधानिक दावे को खारिज कर दें। इसके लिए कांग्रेस पार्टी बीजेपी और आरएसएस से जुड़ा हुआ बताकर गैर जरूरी दबाव बना रही है। सवाल उठ रहे हैं कि क्या कांग्रेस को यह नहीं पता है कि राज्यपाल प्रदेश में संवैधानिक प्रतिनिधि हैं और वे वहां संविधान की रक्षा के लिए ही हैं। क्या कांग्रेस यह कहना चाहती है कि राज्यपाल को अपने संवैधानिक दायित्वों की परवाह नहीं है?

गुलाम नबी आजाद ने प्रदेश में खूनी संघर्ष की दी चेतावनी
कांग्रेस के नेता गुलाम नबी आजाद बेंगलुरु में मौजूद हैं और जेडीएस के साथ मिलकर सरकार बनाने के जोड़ तोड़ में लगे हैं। जाहिर है सबसे बड़ी पार्टी को सरकार बनाने से रोकने की कवायद कर वे लोकतांत्रिक मर्यादाओं को धता बता रहे हैं। वे सिर्फ तिकड़म ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि पूरी शासन व्यवस्था को धमका भी रहे हैं। उन्होंने कहा, ‘’अगर राज्यपाल ने संवैधानिक मूल्यों का पालन नहीं किया और हमें सरकार बनाने के लिए निमंत्रित नहीं किया, तो यहां खूनी संघर्ष होगा।‘’ जाहिर है गुलाम नबी आजाद का बयान न केवल बेहद आपत्तिजनक है, बल्कि इसके लिए उन पर कानूनी कार्रवाई भी होनी चाहिए।

लिंगायत और निर्दलीय विधायकों को धमकाने पर उतरी कांग्रेस
ऐसी खबरें हैं कि कांग्रेस और जेडीएस को मिलाकर सरकार बनाने के प्रयासों का दोनों दलों के भीतर ही विरोध शुरू हो गया है। ऐसा कहा जा रहा है कि जेडीएस के 12 और कांग्रेस के 8 विधायक अपने नेतृत्व से नाराज हैं और वे दोनों दलों की संयुक्त सरकार नहीं चाहते हैं। इसके अतिरिक्त कुछ लिंगायत विधायक इस बात से नाराज हैं कि लिंगायत समाज से आने वाले येदियुरप्पा को मुख्यमंत्री बनने से रोकने के वे खिलाफ हैं। ऐसे में कांग्रेस पार्टी अपने बागी विधायकों को धमकाने पर उतर आई है।

कर्नाटक की जनता के आदेश का अपमान कर रही कांग्रेस
वर्ष 2013 के चुनाव में कर्नाटक विधानसभा में कांग्रेस के 122 विधायक थे, लेकिन इस बार यह घटकर 78 हो गए। वहीं भारतीय जनता पार्टी के 40 विधायक थे, जो बढ़कर 104 हो गए हैं। जाहिर है यह कांग्रेस को सत्ता से हटाने और भाजपा को सत्ता में लाने का जनादेश है।

यह भी साफ है कि जनता दल सेक्यूलर के 38 विधायकों को भी कांग्रेस सरकार के विरोध के कारण ही जीत मिली है, जबकि 2013 के मुकाबले उनकी भी दो सीटें कम हो गई हैं।  जाहिर है कर्नाटक की जनता का मैन्डेट बिल्कुल स्पष्ट है कि वह न तो कांग्रेस का शासन चाहती है और न ही जेडीएस का। कर्नाटक की जनता सिर्फ और सिर्फ भाजपा की ही सरकार चाहती है।

 

 

 

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