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कांग्रेस में अध्यक्ष और प्रधानमंत्री ‘थोपने’ की परंपरा में एक और नाम राहुल गांधी

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12 सितंबर, 2017 को अमेरिका में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा, ”भारत की प्रकृति वंशवाद की है।” 13 अक्टूबर, 2017 को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने कहा, ”अब समय आ गया है कि कांग्रेस अध्यक्ष पद की जिम्मेदारी राहुल गांधी को सौंप दी जाए।” यानी सब सेट था… और राहुल गांधी का कांग्रेस अध्यक्ष बनना भी। कांग्रेस पार्टी के इस निर्णय से यह बात एक बात फिर सिद्ध हो गई है कि कांग्रेस पार्टी में ‘बाप’ का नाम ही चलता है और पार्टी एक बार फिर वंशवाद की ‘अमरबेल’ से मुक्त नहीं हो पाई! दरअसल बीते सात दशकों में हमारे सामने कई उदाहरण हैं जब कांग्रेस पार्टी में नेता, उपाध्यक्ष, अध्यक्ष और प्रधानमंत्री या तो गांधी फैमिली से रहे हैं या फिर उन्हें ‘थोपा’ गया है।

सोनिया और सीताराम केसरी के लिए चित्र परिणाम

प्रणब मुखर्जी की जगह मनमोहन सिंह को बनाया गया था प्रधानमंत्री
14 अक्टूबर को पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी की पुस्तक ”द कोलिशन इयर्स” की लॉन्चिंग हुई। इस पुस्तक में कई ऐसी बातें सामने आई हैं जो कांग्रेस पार्टी पर गांधी फैमिली के कब्जे की कहानी कहती हैं। प्रणब मुखर्जी ने अपनी इस पुस्तक में 2 जून, 2012 की बैठक को याद करते हुए अपना संस्मरण लिखा है। उन्होंने लिखा, ”बैठक में सोनिया गांधी से हुई बातचीत से उन्हें ऐसा लगा कि वो मनमोहन सिंह को यूपीए का राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाना चाहती हैं। मैंने सोचा कि अगर वो मनमोहन सिंह को राष्ट्रपति उम्मीदवार चुनती हैं तो शायद मुझे प्रधानमंत्री के लिए चुनें। मैंने इस तरह की कुछ बातें सुनी थीं कि वो कुछ ऐसा सोच रही हैं। ”द कोलिशन इयर्स” की लॉन्चिंग के अवसर पर ही पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी गांधी फैमिली की ‘दादागिरी’ की पोल खोल दी। उन्होंने कहा, ”प्रणबजी मेरे बहुत ही प्रतिष्ठित सहयोगी थे। इनके (मुखर्जी के) पास यह शिकायत करने के सभी कारण थे कि मेरे प्रधानमंत्री बनने की तुलना में वह इस पद (प्रधानमंत्री) के लिए अधिक योग्य हैं। पर वह इस बात को भी अच्छी तरह से जानते थे कि मेरे पास इसके अलावा कोई विकल्प नहीं था।” प्रणब मुखर्जी और मनमोहन सिंह जैसे कद्दावर नेताओं की ये बात साबित करती है कि पार्टी में एक मात्र सोनिया गांधी की ही चलती थी और वो जो तय करती थीं वही होता था। 

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सीताराम केसरी को बेइज्जत कर सोनिया गांधी को बनाया अध्यक्ष
कांग्रेस के दिवंगत अध्यक्ष सीताराम केसरी पूरी जिंदगी ईमानदार रहे, लेकिन परिवारवाद की पोषक कांग्रेस के कारण इस दलित नेता को कितना अपमान झेलना पड़ा इस बात का प्रमाण नीचे दी गई तस्वीर है। ये तस्वीर उन दिनों की है जब सोनिया गांधी से त्रस्त होकर सीताराम केसरी अपने से उम्र में कई साल छोटे नरसिम्हा राव के कदमों में झुकना पड़ा था… फिर भी नरसिम्हा राव उन्हें सोनिया के कहर से नहीं बचा सके। दरअसल 1997 में कांग्रेस के कोलकाता अधिवेशन के दौरान ही सोनिया गांधी पहली बार कांग्रेस पार्टी की साधारण सदस्य बनी। उस समय सीताराम केसरी कांग्रेस के अध्यक्ष थे। लेकिन सोनिया गांधी को अध्यक्ष बनने की तीव्र इच्छा जाग गई। कांग्रेस पार्टी पर कब्जा करने की इतनी जल्दी थी कि सीताराम केसरी को बीच कार्यकाल से ही हटाना चाहती थीं, लेकिन सीताराम केसरी अपना पद नहीं छोड़ना चाहते थे। तब दिग्विजय सिंह, अहमद पटेल के साथ अन्य कई वरिष्ठ नेताओं ने उन्हें अध्यक्ष पद से हटाने की साजिश रची। अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा करने से तीन साल पहले ही कांग्रेस ने 80 साल के इस बुजुर्ग दलित नेता का अपमान किया।

सोनिया गांधी के लिए सारे नियम कायदे ताक पर रख दिये गए
सोनिया गांधी के लिए कांग्रेस के सारे नियम कायदे को ताक पर रख दिया जिस सोनिया गांधी ने कभी कहा था, ”अपने बच्चों के हाथ में कटोरा दे देंगी लेकिन राजनीति मे नही आएंगी। हुआ यूं कि 14 मार्च 1998 को सीताराम केसरी के बारे में कांग्रेस कार्यसमिति ने कहा कि उन्होंने इस्तीफे की पेशकश कर दी है। कांग्रेस के संविधान की धारा 19 (जे) के तहत उनकी सेवाओं के लिए आभार प्रदर्शन का प्रस्ताव पढ़ना शुरू कर दिया गया, लेकिन केसरी ने जब इस कदम को असंवैधानिक करार दिया तो सबने उन्हें डांट कर चुप करा दिया। वे तैश में उठ कर खड़े हुए तो किसी ने उनकी धोती खींच दी। इस दलित नेता को बेइज्जत कर कार्यसमिति की बैठक से धक्के देकर बाहर कर दिया गया। वह बाहर आए तो उनकी केबिन से उनका नेमप्लेट तक हटाया जा चुका था और वहां सोनिया गांधी का नेमप्लेट लग चुका था। उस समय टीवी पर पूरे देश ने एक बुजुर्ग दलित नेता को कांग्रेस के इस कुकर्म से आहत होकर फूट फूट कर रोते देखा था। तब उन्होंने कहा भी था कि काश वो बाबा साहब अम्बेडकर की बात मान लेते कि ‘कांग्रेस न अभी दलितों की हितैषी है न कभी थी और न कभी रहेगी।’

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वरिष्ठ नेताओं को दरकिनार कर राजीव को बनाया गया प्रधानमंत्री
संजय गांधी के असामयिक मौत के बाद राजीव गांधी को इंदिरा गांधी जबरन राजनीति में लेकर आईं थीं। दरअसल कांग्रेस ने कभी भी वंशवाद के दायरे से बाहर की सोच ही नहीं रखी। लोकतांत्रिक देश की सबसे बड़ी पार्टी रही कांग्रेस में किस कदर वंशवाद हावी रहा है इसका उदाहरण 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनाया जाना था। उस दौर में कांग्रेस में कई वरिष्ठ नेता थे, राजीव को राजनीति का बहुत ज्ञान भी नहीं था, उनकी रूचि भी नहीं थी। लेकिन उन्हें देश के प्रधानमंत्री के तौर पर ‘थोप’ दिया गया। दरअसल उस वक्त प्रणब मुखर्जी पार्टी के वरिष्ठतम नेताओं में से एक थे और वे इंदिरा गांधी के काफी भरोसेमंद भी रहे थे। लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या के बाद जब राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बनाए गए तो उन्होंने प्रणब मुखर्जी को मंत्रिपरिषद में भी शामिल नहीं किया। आहत प्रणब मुखर्जी ने 1985 में कांग्रेस छोड़ दी और समाजवादी कांग्रेस नाम से अपनी पार्टी बनाई। बाद में वे फिर कांग्रेस में आ गए लेकिन प्रधानमंत्री पद के लिए गांधी फैमिली यानी सोनिया गांधी का वे भरोसा नहीं जीत पाए।

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नेहरूवादी वंशवाद और परिवारवाद की उदाहरण थीं इंदिरा गांधी
कांग्रेस की राजनीति में परिवारवाद की बुनियाद आजादी के बाद गठित पहली सरकार के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय ही रख दी गई थी। महात्मा गांधी की जिद ने नेहरू को देश पर थोपा तो नेहरू का पुत्रीमोह किसी से छिपा नहीं था। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी खुद को कांग्रेस का असली उत्तराधिकारी मानती थीं। पार्टी में परिवार के वर्चस्व की वजह से ही 60 के दशक में के. कामराज सहित तमाम तत्कालीन कांग्रेसी नेता इंदिरा के खिलाफ होने की वजह से हाशिये पर चले गए। वंशवाद की जिद में कांग्रेस दोफाड़ बंट चुकी थी। यहां तक कि चुनाव चिन्ह भी गंवाना पड़ा था। आगे चलकर कांग्रेस (आई) की स्थापना भी इंदिरा ने की थी। नेहरू के बाद इंदिरा गांधी ने पार्टी चलाई फिर राजीव गांधी कांग्रेस का चेहरा बने और अब सोनिया एवं राहुल गांधी विरासत में मिली वंशवादी राजनीति को आगे बढ़ा रहे हैं।

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पंडित नेहरू को कांग्रेस ने देश पर थोपकर देश को दिया धोखा
भारतीय राजनीति में वंशवाद और परिवार को प्रश्रय देने की परंपरा सबसे पहले नेहरू-गांधी परिवार से ही शुरू हुई थी। जवाहरलाल नेहरू को देश पर ‘थोपे’ जाने से ही इस वंशवादी राजनीति की शुरुआत हो चुकी थी। महात्मा गांधी की बात मानकर पंडित जवाहर लाल नेहरू को प्रधानमंत्री तो बना दिया गया था, लेकिन यह तथ्य भी सत्य है कि महात्मा गांधी के देहावसान के बाद नेहरू की कांग्रेस पर न तो नैतिक पकड़ थी और न ही व्यवहारिक। 1950 में जब नेहरू के विश्वस्त जे बी कृपलानी कांग्रेस के अध्यक्ष पद का चुनाव हार गए तो उन्होंने विरोध में डेमोक्रेटिक फ्रंट बना लिया। दरअसल यह सरदार पटेल का विरोध और नेहरूवाद का पैरोकारी करने वाला फ्रंट था। लेकिन दुर्भाग्य से 1950 में सरदार पटेल का निधन हो गया और नेहरू ने डेमोक्रेटिक फ्रंट को भी भंग कर दिया, क्योंकि उन्हें अब कोई खतरा नहीं था।

बहरहाल बदलती राजनीति, बदलती युवा सोच और बदलते वातावरण के बावजूद कांग्रेस पार्टी एक परिवार से आगे न कभी सोच पाती है और न ही कांग्रेस की मूल सोच में ही परिवार से इतर कुछ है। नेहरू-इंदिरा परिवार से इतर कुछ समय के लिए कोई कांग्रेस की सर्वोच्च गद्दी पर बैठा भी तो उसका क्या हश्र हुआ, ये किसी से छिपा नहीं है। 60 के दशक में के. कामराज और 90 के दशक में सीताराम केसरी इसके बड़े उदाहरण हैं। भारत के पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिंहराव के साथ नेहरू-गांधी परिवार की विरासत संभाल रहे लोगों ने क्या किया, ये भी किसी से छिपा नहीं है। स्पष्ट है के कि परिवारवाद की पोषक कांग्रेस को वंशवाद के अमरबेल ने ढक रखा है।

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