Home विचार अदालतों में परिवारवाद का कांग्रेसी कनेक्शन समझना जरूरी है!

अदालतों में परिवारवाद का कांग्रेसी कनेक्शन समझना जरूरी है!

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पहली हकीकत 03 अक्टूबर को असम के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता स्वर्गीय केशव चन्द्र गोगोई के सुपुत्र जस्टिस रंजन गोगोई भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद संभाल लेंगे।

दूसरी हकीकत जस्टिस रंजन गोगोई 2 अक्टूबर को अवकाश ग्रहण कर रहे, ओडिशा कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे स्वर्गीय रघुनाथ मिश्रा के सुपुत्र और देश के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंगनाथ मिश्र के भतीजे, वर्तमान मुख्य न्यायाधीश जस्टिस दीपक मिश्रा की जगह लेंगे।

तीसरी हकीकत जस्टिस दीपक मिश्रा से कुछ समय पहले कांग्रेस नेता और जम्मू कश्मीर के पूर्व उपमुख्यमंत्री दिवंगत देवी सिंह ठाकुर के सुपुत्र श्री टीएस ठाकुर भारत के मुख्य न्यायाधीश थे। देवी सिंह ठाकुर भी जम्मू कश्मीर हाइकोर्ट में जज थे। जज की नौकरी से इस्तीफ़ा देकर सीधे शेख मोहम्मद सरकार में वित्त मंत्री बने। फिर शेख मोहम्मद के दामाद गुलाम मोहम्मद सरकार में उपमुख्यमंत्री।

यह इत्तेफाक है या सुप्रीम कोर्ट में जजों की नियक्ति प्रक्रिया की खामियां हैं कि लगातार तीन चीफ जस्टिस कांग्रेस पार्टी के नेता, मंत्री और मुख्यमंत्री के पुत्र हैं?

परम्परा के अनुसार वर्तमान मुख्य न्यायाधीश अपने बाद के दूसरे नंबर के न्यायधीश के नाम की सिफारिश भारत के राष्ट्रपति के पास भेजते हैं। जस्टिस दीपक मिश्रा ने वही किया जिस पर राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने मुहर लगा दी। लिहाजा 3 अक्टूबर को जस्टिस रंजन गोगई भारत के मुख्यन्यायधीश हो जाएंगे। सवाल यह उठता है कि क्या यह सब इतना सहज है जितना दिखता है? क्या यह महज संयोग है कि हाल में जितने भी मुख्य न्यायाधीश बने उनके पिता केंद्र में कांग्रेस की सरकार में कद्दावर नेता थे!

दरअसल सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया ऐसी नहीं है कि राष्ट्रपति किसी भी व्यक्ति को सुप्रीम कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त कर दे। न ही भारत के मुख्य न्यायाधीश की यह मनमर्जी है कि वो अगले मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति के लिए किसी भी नाम की सिफारिश कर दे, लेकिन क्या यह महज इत्तेफाक है कि कांग्रेसी नेताओं के पुत्र ही सीजेआई के पद प्राप्त करते जा रहे हैं?

आपको बता दें कि अगस्त महीने की शुरुआत में केन्द्र सरकार ने पहली बार जजों की नियुक्ति के मामले में परिवारवाद का मुद्दे पर अपनी बात रखी। लिखित तौर पर अपनी राय सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम से साझा करते हुए केंद्र ने पहली बार जजों की नियुक्ति के लिए भेजे गए नाम में शामिल वकीलों और मौजूदा और रिटायर्ड जजों के साथ बकायदा संबंधों का जिक्र करते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को भेजा। इलाहाबाद हाई कोर्ट कॉलेजियम द्वारा भेजी गईं 33 अनुशंसाओं में कम से कम 11 वकीलों और उनके संबंधों का जिक्र किया गया।

केंद्र ने अन्य सक्षम वकीलों के लिए भी बराबर के मौके मिलने के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के साथ ‘परिवारवाद’ की व्यापक डिटेल साझा की। सरकार ने वकीलों की पात्रता, निजी और पेशेवर ईमानदारी समेत न्यायिक बिरादरी में उनकी साख जैसे मामलों के संदर्भ में अपने जांच निष्कर्षों से सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम को अवगत कराया।

आपको बता दें कि इलाहाबाद हाई कोर्ट की तरफ से दो साल पहले ठीक इसी तरह की अनुशंसाएं की गई थीं। उस दौरान हाई कोर्ट कॉलेजियम ने 30 वकीलों के नाम भेजे थे। उस वक्त के चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर 11 वकीलों के नाम नाम खारिज कर केवल 19 की अनुशंसा करते हुए हाई कोर्ट जज के रूप में सिफारिश की थी। 2016 की लिस्ट में भी जजों और नेताओं के सगे-संबंधी शामिल थे।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने 12 मार्च को रिपोर्ट दी थी कि इलाहाबाद हाई कोर्ट कलीजियम द्वारा भेजी गई लिस्ट में मौजूदा सुप्रीम कोर्ट जज के बहनोई, एक के चचेरे भाई के अलावा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के पूर्व जजों के संबंधी शामिल थे। 15 अप्रैल को प्रकाशित दूसरी रिपोर्ट में टाइम्स ऑफ इंडिया ने बताया था कि परिवारवाद का यह मामला पीएमओ तक पहुंचा है और इलाहाबाद बार एसोसिएशन से मिलीं शिकायतों के आधार कानून मंत्रालय पारदर्शी प्रक्रिया अपना रहा है।

इस मामले में एक रोचक पहलू यह भी है कि सरकार ने 33 अनुशंसाओं में से केवल 11-12 वकीलों को जज बनने के सक्षम पाया था। फरवरी में इलाहाबाद हाई कोर्ट, कलीजियम द्वारा भेजी गई अनुशंसाओं में.एससी-एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक समुदाय का प्रतिनिधित्व बिल्कुल न के बराबर था।

यह भी पढ़ें – 10 जनपथ के नजदीकी पत्रकारों की न्यायाधीशों से निकटता से उठते सवाल

कांग्रेस पर आरोप रहे हैं कि कि न्यायपालिका और न्यायाधीशों का राजनीतिकरण करने से भी नहीं चूकती है। 12 जून को हाई कोर्ट के जज रहे अभय महादेव थिप्से ने जब कांग्रेस पार्टी का दामन थामा तो इसके स्पष्ट प्रमाण भी सामने आ गए। जाहिर है सवाल उठने लगे हैं कि हाई कोर्ट के जज के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान जज अभय महादेव थिप्से कितने निष्पक्ष रहे होंगे?

रिटायर जज महादेव थिप्से ने थामा कांग्रेस का हाथ
राहुल गांधी के साथ जज अभय महादेव थिप्से की ये तस्वीरें कांग्रेस और जजों के पर्दे के पीछे के रिश्तों की कहानी कहती है। गौरतलब है कि इससे पहले भी कई जजों ने रिटायर होने के बाद ऐसे पद लिए जिन्हें राजनीतिक माना जाता रहा है। लेकिन किसी हाई कोर्ट के जज का इस तरह से किसी राजनीतिक दल की सदस्यता ग्रहण करने का संभवत: यह पहला मामला है।

कांग्रेस की लाइन लेंथ पर चलते रहे हैं पूर्व जज अभय महादेव थिप्से

बेस्ट बेकरी केस में गवाहों के मुकरने के बाद भी चार आरोपियों को दोषी करार दिया
2004 में कहा, “मुझे एक चिट्ठी लिखकर कहा गया कि मैं एक हिंदू की तरह पेश आऊं”
थिप्से ने अपने कार्यकाल में कई माओवादियों-आतंकवादियों को जमानत दी
थिप्से ने 5600 करोड़ के NSE घोटाले में जिग्नेश शाह को जमानत दी थी
थिप्से महाराष्ट्र के आतंकवाद विरोधी कानून मकोका के भी विरोधी हैं
थिप्से ने कहा था, ”सोहराबुद्दीन एनकाउंटर के मामले में न्याय नहीं हुआ’’
थिप्से ने कहा था, ”अदालतें मुसलमानों के खिलाफ भेदभाव करती हैं’’

 

कांग्रेस के कहने पर चार जजों ने किया था प्रेस कान्फ्रेंस!
जनवरी, 2018 में सुप्रीम कोर्ट के चार न्यायाधीशों चेलमेश्वर, मदन लोकुर, रंजन गोगोई और कुरियन जोसेफ ने मीडिया के सामने मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा की कार्यशैली पर प्रश्न खड़े किए। केंद्र सरकार ने इसे कोर्ट का अंदरूनी मामला बताया, लेकिन कांग्रेस ने इस मुद्दे को राजनीतिक पार्टियों के बीच की लड़ाई बनाने की कोशिश की। चारों जजों के प्रेस कांफ्रेंस के आयोजक 10 जनपथ से करीबी ताल्लुक रखने वाले पत्रकार शेखर गुप्ता थे। जाहिर है कि इसके पीछे कांग्रेस की मिलीभगत थी।

जस्टिस के एम जोसेफ की नियुक्ति के लिए तोड़ी मर्यादा
उत्तराखंड हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस के एम जोसेफ को सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस नहीं बनाने पर भी कांग्रेस ने राजनीति की। दरअसल केंद्र सरकार ने कोलेजियम की सिफारिश को पुनर्विचार के लिए वापस लौटा दिया था। केंद्र ने साफ किया कि सुप्रीम कोर्ट में पहले से ही जस्टिस कुरियन जोसेफ हैं, जिन्हें केरल हाई कोर्ट से पदोन्नत किया गया है। ऐसे में केरल हाई कोर्ट से एक और पदोन्नति सुप्रीम कोर्ट में क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व की सरंचना के हिसाब से ठीक नहीं होगी।

इंदु मलहोत्रा के जज बनने पर कांग्रेस ने उठाए थे बेतुके सवाल
वरिष्ठ महिला वकील इंदु मल्होत्रा ने 23 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में शपथ ली। ये अवसर ऐतिहासिक इसलिए बना कि देश में पहली किसी महिला वकील को सीधे सुप्रीम कोर्ट की जज के रूप में नियुक्त किया गया। लेकिन कांग्रेस की करीबी वकील इंदिरा जय सिंह ने इस पर भी सवाल उठा दिए और जस्टिस जोसेफ की नियुक्ति से इस मामले को जोड़ दिया। हालांकि चीफ जस्टिस ने उनके विरोध को अनैतिक और बेतुका कहकर खारिज कर दिया।

ओछी सियासत के लिए चीफ जस्टिस को कांग्रेस ने बनाया निशाना
जस्टिस लोया मामले में मनमुताबिक फैसला नहीं आने के कारण कांग्रेस पार्टी ने देश के चीफ जस्टिस के खिलाफ असंवैधानिक तरीके से महाभियोग का नोटिस दे दिया था। देश के इतिहास में यह पहली बार हुआ कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव लाने की कोशिश हुई। उपराष्ट्रपति ने गैरकानूनी महाभियोग प्रस्ताव को खारिज किया तो कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसे 5 जजों की संवैधानिक पीठ ने खारिज कर दिया।

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