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बाबासाहेब अम्बेडकर और RSS के समान विचार, देखिये 11 उदाहरण

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स्वतंत्रता के पश्चात अब तक तमाम सियासी जमात डॉ. बाबासाहेब भीमराव रामजी अम्बेडकर के नाम का राजनीतिक इस्तेमाल करती रही है। यह भी कोशिश होती रही है कि बाबासाहेब जैसे विशाल व्यक्तित्व को स्वामी को सिर्फ ‘दलित’ वर्ग के एक नायक के तौर पर स्थापित कर दिया जाए।

विशेषकर कांग्रेस पार्टी ने बाबासाहेब को उनके कद से नीचा दिखाने की हरदम कोशिश की है। साठ साल सत्ता में रहकर भी कांग्रेस ने बाबासाहेब को ‘भारत रत्न’ सम्मान नहीं दिया और उनसे पहले जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी को भारत रत्न दे दिया। हालांकि 1990 में जब भाजपा समर्थित जनता दल की सरकार बनी तब उनके महापरिर्वाण के 34 वर्ष बाद इस सम्मान से प्रतिष्ठित किया गया।

दरअसल बाबासाहेब के नाम पर कांग्रेस पार्टी, वामपंथी दल समेत कई  पार्टियां लगातार राजनीति तो करती रही हैं, लेकिन उनके विचारों और उनके दृष्टिकोण का कभी सम्मान नहीं किया है। इसके साथ ही उन्हें लगातार राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के विचारों का विरोधी बताया जाता रहा है, परन्तु क्या यही सत्य है?

विचारधारा के स्तर पर अगर देखें तो यह स्पष्ट है कि कई ऐसे महत्वपूर्ण विषय हैं जिनपर राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और बाबासाहेब अम्बेडकर के समान विचार हैं।

आइये हम ऐसे ही 11 महत्वपूर्ण विचारों को जानते हैं-

धार्मिक आधार पर बंटवारे का विचार
डॉ अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक ‘थॉट्स ऑन पाकिस्तान’ में कांग्रेस की मुस्लिम परस्त राजनीति की कड़े शब्दों में आलोचना की है। उन्होंने मुसलमानों के भारत में रहने पर सवाल उठाते हुए लिखा – क्या मुसलमानों की निष्ठा भारत के प्रति रह पाएगी? उनका मानना था कि मुसलमान ये सोचते हैं कि अंग्रेजों ने उनसे सत्ता छीनी थी, इसलिए सत्ता उन्हें वापस चाहिए।

दरअसल बाबासाहेब को यह चिंता थी कि दुनिया भर में मुस्लिमों की जो सोच रही है अगर उसी सोच के तहत भारत के मुसलमानों का भी होगा तो आने वाला समय मुश्किल भरा होगा।

उन्हें लगता था कि अगर भारतीय मुस्लिम अपने आपको देश की धरती से जोड़ नहीं सका और मुस्लिम साम्राज्य स्थापित करने के लिए विदेशी मुसलमान देशों की ओर सहायता के लिए देखने लगा, तो इस देश की स्वतंत्रता पुन: खतरे में पड़ जाएगी।

समान नागरिक संहिता पर एकमत
बाबासाहेब अम्बेडकर समान नागरिक संहिता के प्रबल समर्थक थे, लेकिन कांग्रेस इसका विरोध कर रही थी। उन्होंने संविधान सभा में कहा था, ”मैं समझ नहीं पा रहा हूं कि समान नागरिक संहिता का इतना विरोध क्यों हो रहा है? यह सवाल क्यों पूछा जा रहा है कि भारत जैसे देश के लिए समान नागरिक संहिता लागू करना संभव है?’’ उन्होंने कहा समान नागरिक संहिता एक ऐसा कानून होगा जो हर धर्म के लोगों के लिए समान होगा और उसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं होगा। इस कानून में परिवार, विवाह, संपत्ति और मूलभूत नागरिक अधिकार के मामलों में बराबरी होगी। राज्य का यह कर्तव्य होगा कि वह लोगों के व्यक्तिगत अधिकार को सुनिश्चित करेगा और समुदाय के नाम पर उनका हनन नहीं होगा। द हिंदू में लिखे इस लेख से और भी स्पष्ट हो जाता है कि डॉ. अम्बेडकर की क्या सोच थी।

अनुच्छेद 370 का प्रबल विरोध
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 जिसमें कश्मीर को कई विशेष अधिकार प्राप्त हैं उनके खिलाफ बाबासाहेब ने काफी मुखर होकर अपने विचार रखे थे। उन्होंने अनुच्छेद 370 के बारे में शेख अब्दुल्ला को लिखे पत्र में कहा था,  ”आप चाहते हैं कि भारत जम्मू-कश्मीर की सीमा की सुरक्षा करे, यहां सड़कों का निर्माण करे, अनाज की सप्लाई करे साथ ही कश्मीर के लोगों को भारत के लोगों के समान अधिकार मिले। आप अपनी मांगों के बाद चाहते हैं कि भारत सरकार को कश्मीर में सीमित अधिकार ही मिलने चाहिए। ऐसे प्रस्ताव को भारत के साथ विश्वासघात होगा जिसे भारत का कानून मंत्री होने के नाते मैं कतई स्वीकार नहीं करुंगा।”

गौरतलब है कि जिस दिन यह अनुच्छेद बहस के लिए आया उस दिन बाबा साहब ने इस बहस में हिस्सा नहीं लिया ना ही उन्होंने इस अनुच्छेद से संबंधित किसी भी सवाल का जवाब दिया।

राष्ट्रवाद की अवधारणा का समर्थन
संघ और बाबासाहेब के बीच वैचारिक साम्य ये भी है कि दोनों अखंड राष्ट्रवाद के पक्षधर रहे। डॉ. आंबेडकर सम्पूर्ण वांग्मय के खंड 5 में लिखा है, ”डॉ अम्बेडकर का दृढ़ मत था कि मैं हिंदुस्तान से प्रेम करता हूं। मैं जीऊंगा तो हिंदुस्तान के लिए और मरूंगा तो हिंदुस्तान के लिए। मेरे शरीर का प्रत्येक कण और मेरे जीवन का प्रत्येक क्षण हिंदुस्तान के काम आए, इसलिए मेरा जन्म हुआ है।’’  

वामपंथ की विचारधारा का विरोध
25 नवम्बर 1949 को संविधान सभा में बोलते हुआ बाबासाहेब ने कहा था, ”वामपंथी इसलिए इस संविधान को नहीं मानेंगे क्योंकि यह संसदीय लोकतंत्र के अनुरूप है और वामपंथी संसदीय लोकतंत्र को मानते नही हैं।’’ बाबा साहेब के इस एक वक्तव्य से यह जाहिर होता है कि बाबा साहेब जैसा लोकतांत्रिक समझ का व्यक्तित्व वामपंथियों के प्रति कितना विरोध रखता होगा!

पंथ निरपेक्ष राष्ट्र पर समान विचार
बाबासाहेब का स्पष्ट मत था कि भारत धर्म निरपेक्ष राष्ट्र नहीं होगा, लेकिन कांग्रेस ने संविधान के मूल प्रस्तावना में ही संशोधन कर दिया है। इसमें कांग्रेस ने धर्मनिरपेक्षता, समाजवाद और अखंडता शब्द को अलग से जोड़ दिया। आप संविधान के मूल प्रस्तावना को यहां देख सकते हैं।

प्रस्तावना का मूल – ”हम भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य के लिए तथा उस के समस्त नागरिकों को – सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता, प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त करने के लिये, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता सुनिश्चित करने वाली बन्धुता बढ़ाने के लिए दृढ़ संकल्प हो कर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी)  को एतदद्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधि-नियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’

हिंदू एकता के प्रबल समर्थक
बाबा साहेब की जीवनी लिखने वाले सीबी खैरमोड़े ने बाबा साहेब के शब्दों को उदृत करते हुए लिखा है कि ”मुझमें और सावरकर में इस प्रश्न पर न केवल सहमति है, बल्कि सहयोग भी है कि हिंदू समाज को एकजुट और संगठित किया जाए और हिंदुओं को अन्य मजहबों के आक्रमणों से आत्मरक्षा के लिए तैयार किया जाए।’’  

बाबासाहेब एक ओर जहां हिंदू समाज की बुराइयों पर चोट करते हैं वहीं वे हिदुओं की एकजुटता का समर्थन करते हैं। महार मांग वतनदार सम्मेलन, सिन्नर (नासिक) में 16 अगस्त, 1941 को बोलते हुए बाबासाहेब कहते हैं, ‘‘मैं इन तमाम वर्षों में हिंदू समाज और इसकी अनेक बुराइयों पर तीखे एवं कटु हमले करता रहा हूं, लेकिन मैं आपको आश्वस्त कर सकता हूं कि अगर मेरी निष्ठा का उपयोग बहिष्कृत वर्गों को कुचलते के लिए किया जाता है तो मैं अंग्रेजों के खिलाफ हिंदुओं पर किए हमले की तुलना में सौ गुना तीखा, तीव्र एवं प्राणांतिक हमला करूंगा।’’

जातिगत भेदभाव मिटाने पर जोर
हिन्दू समाज में जातिगत भेदभाव हुआ है और इसका उन्मूलन होना चाहिए इसको लेकर संघ भी सहमत है और बाबा साहेब भी जाति से मुक्त अविभाजित हिन्दू समाज की बात करते थे। 1942 ईसवी से ही संघ हिंदुओं में अंतरजातीय विवाह का पक्षधर रहा है और हिंदुओं की एकजुटता को लेकर प्रयासरत है। बाबासाहेब का भी मत यही था कि अस्पृश्यता दूर हो और शोषितों और वंचितों को समानता का अधिकार मिल जाए।

भारतीय संस्कृति में पूरा विश्वास
धर्म और संस्कृति मामले में भी संघ और बाबासाहेब के बीच वैचारिक साम्यता है। संघ भी धर्म को मानता है और बाबासाहेब भी धर्म को मानते थे। इसके साथ ही बाबा साहेब इस्लाम और इसाईयत को विदेशी धर्म मानते थे और संघ का विचार भी समान है। बाबासाहेब धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी कारण उन्होंने ईसाइयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।

संस्कृत को राजभाषा बनाने का समर्थन
राजभाषा संस्कृत को बनाने को लेकर भी उनका मत स्पष्ट था। 10 सितंबर 1949 को डॉ बीवी केस्कर और नजीरुद्दीन अहमद के साथ मिलकर बाबासाहेब ने संस्कृत को राजभाषा बनाने का प्रस्ताव रखा था, लेकिन वह पारित न हो सका। संस्कृत को लेकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विचार भी कुछ ऐसा ही है।

आर्यों का भारतीय मूल का होने पर एकमत
बाबासाहेब मानते थे कि आर्य भारतीय थे और आर्य किसी जाति का नाम नहीं था। उनका ये दृढ विश्वास था कि ‘शूद्र’ दरअसल क्षत्रिय थे और वे लोग भी आर्यो के समाज के ही अंग थे। उन्होंने इसी विषय पर एक पुस्तक लिखी थी- “शूद्र कौन थे”। बाबासाहेब ने इस धारणा का खंडन किया कि आर्य गोरी नस्ल के ही थे। ऋग्वेद, रामायण और महाभारत से उद्धरण देकर उन्होंने संसार को बताया कि आर्य सिर्फ गौर वर्ण के ही नहीं, बल्कि श्याम वर्ण के भी थे।

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