Home विशेष विपक्ष की राजनीति लाती है देश में ‘अस्थिरता’ और ‘कुशासन’

विपक्ष की राजनीति लाती है देश में ‘अस्थिरता’ और ‘कुशासन’

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कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सबसे अधिक 104 सीटें जीतने वाली भाजपा विपक्ष में है और सबसे कम 37 सीटें  जीतने वाली पार्टी जद(एस) के कुमारस्वामी मुख्यमंत्री बने हैं। दरअसल 78 सींटें जीतने वाली कांग्रेस ने समर्थन दिया है। प्रजातंत्र के नाम पर कर्नाटक का यह प्रयोग देश में पहली बार नहीं हो रहा है। इससे पहले कई बार राज्यों और केन्द्र में साल 2014 तक चली गठबंधन सरकारों में भी ऐसे प्रयोग हो चुके हैं। 

सबसे अधिक सीट जीतने वाली भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए भी हाल में ही हुए उपचुनावों में सभी विपक्षी दल एक साथ मिलकर चुनाव लड़े। इसका उन्हें तात्कालिक फायदा भी मिला है। उत्तर प्रदेश में महीने भर पहले हुए गोरखपुर, फूलपुर के लोकसभा उपचुनाव और हाल ही में हुए कैराना लोकसभा उपचुनाव में विपक्षी दलों ने प्रधानमंत्री मोदी को हराने के लिए एक साथ मिलकर चुनाव लड़ा। इन चुनावों में विपक्षी दल तो जीत गये, लेकिन देश हारता हुआ नजर आता है। विपक्ष की इस नकारात्मक राजनीति से देश क्यों हार रहा है, यह समझना जरूरी है।

घबराए विपक्षी दल प्रधानमंत्री मोदी को हराना चाहते हैं!
देश के सभी राजनीतिक दलों का आज एक ही मकसद है कि किसी तरह से प्रधानमंत्री मोदी को आने वाले चुनावों में जीतने से रोका जाए। इन दलों के पास देश के विकास और सुशासन के लिए कोई भी सकारात्मक एजेंडा नहीं है। इनकी राजनीति सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी के विरोध की नकारात्मक राजनीति पर टिकी है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बहुमत की सरकार बनाने के बाद से जिस तरह से सामरिक और आर्थिक क्षेत्रों में सुधार के लिए कठिन निर्णयों के लेने के बावजूद भी हर राज्य मे चुनाव जीतते हुए, देश के 21 राज्यों में भाजपा की सरकारें बनाईं, इससे सारे ही विपक्षी दलों को अपना वजूद खतरे में नजर आने लगा। अब विपक्ष की सभी राजनीतिक पार्टियां देश से अधिक अपने स्वार्थ को बचाने के लिए एक ही प्लेटफार्म पर आने का प्रयास कर रही हैं। इस गठबंधन में सिर्फ और सिर्फ पार्टियां अपनी सत्ता बचाना ही चाहती हैं, उन्हें देश या राज्य के विकास की कोई चिंता नही हैं। कर्नाटक में मुख्यमंत्री बने हुए हफ्ता बीत चुका है, लेकिन मंत्रिमंडल का गठन नहीं हो सका है। 

देश को सुशासन नहीं दे सकता विपक्षी दलों का अहंकार
विपक्षी दलों के गठबंधन की सरकारें देश को कैसा शासन देती रही हैं यह  2004 से 2014 तक चली कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए गठबंधन की सरकारों के कामकाज से साफ हो जाता है। 15 दलों के गठबंधन से बनी इन सरकारों ने देश के दस साल को एक तरह से बरबाद कर ही दिए। जब तक यह सरकार चली हर दिन कोई न कोई पार्टी किसी न किसी क्षेत्रीय मुद्दे पर गठबंधन सरकार से समर्थन वापस लेने की धमकी देती रहती थी। इन सरकारों को चलाने के लिए प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने देश के हितों के साथ कई बार समझौते किए, जिससे देश विकास और सुशासन में दशकों पीछे चला गया। यूपीए के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2011 में गठबंधन सरकारों के दुष्परिणामों को एक इंटरव्यू में स्वंय ही स्वीकार किया था।

गठबंधन की सरकारों में भ्रष्टाचार
गरीब जनता के लिए बनी योजनाओं से धन कमाने के लालच पर गठबंधन सरकारों में क्षेत्रीए दल मनमानी करते हैं। इन पर किसी प्रकार का दबाव काम नहीं करता। 2004 से 2014 के दौरान इस देश ने सबसे बड़े घोटाले देखे। ऐसा कोई क्षेत्र नहीं था, जहां घोटाले नहीं किए गये और सबसे दुखद स्थिति यह थी कि इन घोटालों की जांच भी राजनीतिक दबाव में फाइलों में बंद कर दी जाती थीं। चारा घोटाले करने वाले बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव, केन्द्र में रेल मंत्री बने रहे और अपने दल के लिए कमाई वाले मंत्रालयों की मांग करते रहे। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो कहा था कि –Corruption is by product of coalition politics. इस दौरान सभी यही मानते थे कि देश में भ्रष्टाचार गठबंधन सरकारों के कारण ही हो रहे हैं। नेशनल कांफ्रेस के नेता उमर अब्बदुला ने कहा था कि Tackling graft in coalition is ‘ Impossible ‘

गठबंधन सरकारों को Policy Paralysis हो जाती है
यूपीए की दस सालों तक चली गठबंधन सरकारों में भ्रष्टाचार और अनिर्णय का ऐसा आलम बन चुका था कि देश हित से जुड़े आर्थिक और सामरिक मुद्दों पर कोई निर्णय नहीं हो रहा था। इस अनिर्णय के कारण आर्थिक सुधारों की प्रक्रिया पूरी तरह से ठप पड़ चुकी थी। विदेशी निवेश और नये उद्योग धंधो का लगना लगभग बंद हो चुका था। एक तरफ देश में रोजगार की कमी थी, तो दूसरी तरफ गठबंधन पार्टियां अपने अपने जातिगत समर्थन को बढाने के लिए आरक्षण की मांग कर रही थी। पूरे देश में नकारात्मकता का माहौल था। इस नकारात्मक माहौल को उस समय की पत्र-पत्रिकाओं में कुछ इस तरह लिखा गया-

वर्तमान में विपक्षी दलों के एकजुटता की राजनीति प्रधानमंत्री मोदी को हराने के लिए है, जिसमें देश के हितों और विकास के लिए कोई अवसर नहीं है। देश के लिए अहंकारों से लदी विपक्षी दलों की एकजुटता, खतरे की घंटी है, जिसका अनुभव 2004 से 2014 के बीच यह देश कर चुका है।

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