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बांग्लादेशी घुसपैठियों जैसा न हो हाल, इसलिए रोहिंग्या पर सख्त है मोदी सरकार

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अगर असम जैसे छोटे राज्य में 40 लाख अवैध बांग्लादेशी घुसपैठिये हो सकते हैं तो पूरे देश में उनकी तादाद कितनी होगी, इसका अंदाजा लगाना भी कठिन है। यही वजह है कि अब पश्चिम बंगाल, बिहार और दिल्ली में भी नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन्स के तहत ऐसे घुसपैठियों की पहचान कर उन्हें देश से बाहर करने की मांग उठनी शुरू हो गई है। देश में बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या से सचेत होकर मोदी सरकार ने म्यांमार से अवैध तरीके से भारत में घुस आए रोहिंग्याओं पर सख्त रवैया अपनाने कै फैसला कर लिया है। क्योंकि, हालात गवाह है कि वोट बैंक की राजनीति ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या को अब कितना बड़ा संकट बना दिया है। 

अवैध रोहिंग्या को वापस भेजेगी सरकार
केंद्र सरकार ने मंगलवार को संसद में साफ कर दिया कि जिन रोहिंग्याओं के पास शरणार्थी का दर्जा नहीं है और अवैध तरीके से भारत में घुस आए हैं, उन्हें वापस भेजा जाएगा। गृह राज्यमंत्री किरण रिजिजू ने लोकसभा में ये भी बताया कि कुछ रोहिंग्याओं के अवैध गतिविधियों में शामिल होने के भी रिपोर्ट हैं। सरकार ने राज्यों को आगाह किया है कि रोहिंग्या को किसी तरह का सरकारी दस्तावेज हासिल करने से रोकें, ताकि वे बाद में भारतीय नागरिकता का दावा करना शुरू न कर दें। दरअसल, अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या देश के लिए बहुत बड़ी सीख है और इसलिए सरकार अवैध रोहिंग्या घुसपैठियों को लेकर काफी सचेत है।

बांग्लादेश ने कहा- असम के घुसपैठिये बांग्लादेशी नहीं
रोहिंग्या घुसपैठियों पर केंद्र सरकार का रवैया वेबजह नहीं है। क्योंकि, एनआरसी की लिस्ट जारी होते ही बांग्लादेश ने असम के 40 लाख अवैध घुसपैठियों से अपना पल्ला झाड़ना शुरू कर दिया है। ऑनलाइन समाचार पोर्टल जागरण में छपी खबर के मुताबिक बांग्लादेश के सूचना प्रसारण मंत्री हसानुल हक इनू ने कहा है, ” ये बात सभी जानते हैं कि असम में यह एक शताब्दी पुराना नस्लीय टकराव है। पिछले 48 सालों में किसी भी भारतीय सरकार ने बांग्लादेश के साथ अवैध प्रवास का मुद्दा नहीं उठाया है। इस स्थिति को नई दिल्ली में मोदी सरकार द्वारा सुलझाना चाहिए जो कि विवेकपूर्ण तरीके से इससे निपटने में सक्षम हैं। इन लोगों का बांग्लादेश के साथ कोई लेना-देना नहीं है।”

एनआरसी की जांच में ममता का अडंगा
ऑनलाइन समाचार पोर्टल नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार असम में जारी एनआरसी लिस्ट पर सबसे ज्यादा बवाल करने वाली पश्चिम बंगाल की सीएम ममता बनर्जी की सरकार ने इसकी जांच में भी ठीक से सहयोग नहीं किया। जानकारी के मुताबिक एनआरसी के स्टेट कोऑर्डिनेटर ने सुप्रीम कोर्ट में जो हलफनामा दिया है, उसके मुताबिक पश्चिम बंगाल सरकार को एनआरसी की तरफ से 1.14 लाख दस्तावेज की छानबीन करने को कहा गया था। लेकिन, पश्चिम बंगाल सरकार मात्र 6 प्रतिशत दस्तावेजों की ही जांच कर पाई। राज्य सरकार को पश्चिम बंगाल के उन लोगों की छानबीन करनी थी, जो किसी कारण से असम में रहने लगे थे।

वोट बैंक बचाने के लिए ममता ने किया अपना हृदय परिवर्तन
असम में एनआरसी की लिस्ट का विरोध कर रहीं पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी वही महिला हैं, जिन्होंने 2005 में बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर लोकसभा में जमकर बवाल किया था। जब उन्हें इस मुद्दे पर बोलने की इजाजत नहीं मिली तो उन्होंने तत्कालीन डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल पर कागज फाड़कर फेंक दिए थे। वे इस मसले पर स्थगन प्रस्ताव लाना चाहती थीं। जब उन्हें कहा गया कि स्पीकर ने उनका प्रस्ताव रद्द कर दिया है तो वो भड़क उठीं और न केवल आसन पर कागज फाड़कर फेंका, बल्कि लोकसभा की सदस्यता तक से इस्तीफा दे दिया। हालांकि, उनका इस्तीफा मंजूर नहीं किया गया था। जब ममता बनर्जी ने संसद में यह ड्रामा किया था, उस समय लेफ्ट की सहयोग से बनी यूपीए की सरकार थी और दोनों ने ममता बनर्जी की इस हरकत की जमकर निंदा की थी। लेकिन, वही ममता बनर्जी आज उसी मुद्दे पर देश में गृहयुद्ध छिड़ने और खून-खराबे की धमकी दे रही हैं।

अवैध बांग्लादेशियों पर चुप क्यों हैं राहुल गांधी ?
एनआरसी की कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रही है। असम में अवैध घुसपैठियों को रोकने के लिए एनआरसी की प्रक्रिया शुरू करने की बात राहुल गांधी के पिता पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ही कही थी। इसको लेकर 1985 में असम समझौता भी हुआ था। समाचार पोर्टल आजतक की खबर के अनुसार असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरूण गोगोई ने ये भी दावा किया है कि इसपर मनमोहन सरकार ने कार्रवाई शुरू भी की थी- “यह (एनआरसी) तो हमारा बच्चा है। हमने इसे मनमोहन सिंह के कार्यकाल में शुरू किया था। इसके पीछे उद्देश्य यह पहचान करना था कि कौन विदेशी है और कौन वास्तव में भारतीय नागरिक।” लेकिन सच्चाई ये है कि 10 वर्षों तक यूपीए सरकार इसपर कुछ ठोस कार्रवाई करके नहीं दिखा सकी। क्योंकि, तुष्टिकरण की नीति ने उसे राष्ट्रहित में फैसला लेने से रोक दिया। यही कारण है कि हर छोटे-छोटे मसले पर बयान देने वाले कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की देशहित से जुड़े इतने बड़े मसले पर बोलती बंद है और देश को हिंसा की आग में झोंकने वाले ममता बनर्जी के बयान का भी कांग्रेस विरोध नहीं कर पा रही है।

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