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हिंदुओं को मूर्ख बना रही कांग्रेस के ‘कालनेमी’ रूप की खुल गई कलई!

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‘हिंदू आतंकवाद’… ‘हिंदू पाकिस्तान’ और अब ‘हिंदू तालिबान’! दो दिन पहले ही कांग्रेस नेता और वकील राजीव धवन ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष हिंदू तालिबान शब्द का जिक्र किया था, और 18 जुलाई को कांग्रेस के नेता शशि थरूर ने ‘हिंदू तालिबान’ शब्द का खुलकर जिक्र किया है। इससे दो दिन पहले ही दिग्विजय सिंह ने हिंदुओं को कट्टरपंथी और आतंकवादी कहा था। गौरतलब है कि ये वही शख्स हैं जिन्हें ‘भगवा आतंकवाद’ शब्द का जनक कहा जाता है।
इस बीच मणिशंकर अय्यर ने भी शशि थरूर के ‘हिंदू पाकिस्तान’ का समर्थन किया है। इससे पहले 11 जुलाई को राहुल गांधी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से मिलकर ये कहा था कि कांग्रेस मुस्लिमों की पार्टी है और उन्होंने मंदिरों के दौरे कर गलती की है।

दरअसल देश के 100 करोड़ हिंदू समुदाय के लिए कांग्रेस पार्टी यही सोच रखती है। वह कई बार अपने कृत्यों से यह साबित कर चुकी है कि उसके जीन में मुस्लिम परस्ती के साथ हिंदू विरोध की भावना कूट-कूट कर भरी है।

जाहिर है आप कांग्रेस के इन नेताओं को ‘कालनेमी’ कहें तो अतिशियोक्ति नहीं होगी। गौरतलब है कि हिंदू धार्मिक ग्रंथों के अनुसार ‘कालनेमी’ एक राक्षस था, ये रावण का जासूस था, जिसे हनुमान जी ने पहचान लिया और मार गिराया था।

कहानी ये है कि जब मेघनाद और लक्ष्मण जी के युद्ध में लक्ष्मण जी घायल होकर मूर्छित हो गए थे, तो हनुमान जी संजीवनी बूटी लाने के लिए भेजा गया था। रावण को जब ये बात पता चली तो उसने बहरूपिये ‘कालनेमी’ को बुलाया। हनुमान जी जब जड़ी बूटी के लिए जा रहे थे तो रस्ते में ‘कालनेमी’ ने साधु का वेश बनाकर उनको रोका। रोकने के लिए उसने जोर-जोर से “राम-राम-राम-राम” करना शुरू कर दिया।

हनुमान जी भी उसे देख भ्रमित हो गए और सोचने लगे कि ये कोई राम भक्त है। ‘कालनेमी’ ने हनुमान जी को मारने की भी कोशिश की पर हनुमान जी ने उसे पहचान लिया और परलोक भेज दिया। जाहिर है वेश बदलकर राम भक्त हनुमान को बहरूपिया ‘कालनेमी’ मूर्ख बना रहा था।

इसी तरह राहुल गांधी पिछले दिनों हिंदू बने और अब ये असल रूप में आए हैं। केरल में वामपंथी सीताराम येचुरी भी अपने सिर पर कलश लेकर घूम रहे हैं। जाहिर है ये आज के कालनेमी हैं।

आइये हम नजर डालते हैं कांग्रेस के ‘कालनेमी’ रूप के कुछ अन्य उदाहरणों पर-

कांग्रेस की नीति है मुस्लिमों को जोड़ो, हिंदुओं को तोड़ो
कांग्रेस पार्टी बांटो और राज करो की नीति से भी आगे हिंदुओं को तोड़ो और मुस्लिमों को जोड़ो की रणनीति पर काम कर रही है। कांग्रेस पार्टी मुस्लिमों के वोट को अपनी बपौती समझती है और जब भी उसे लगता है कि मुस्लिम वोट छिटकने की आशंका है तो वो उन्हें एकजुट करने और रिझाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती है।

कांग्रेस पार्टी सिर्फ मुसलमानों को जोड़ने की ही कोशिश नहीं करती है बल्कि इससे भी आगे हिंदुओं को तोड़ने की साजिश भी करती है। कांग्रेस को पता है कि यदि हिंदू एकजुट रहे तो उसकी दाल नहीं गलेगी। इसलिए उसका जोर हिंदुओं को जाति के आधार पर बांटने पर रहता है। कांग्रेस नेता शशि थरूर का बयान इसी रणनीति का हिस्सा है। कांग्रेस 2019 के पहले मुसलमानों में बीजेपी का भय दिखा कर एक जुट करने की कोशिश में लगी है।

मुस्लिम बुद्धिजीवियों से गुपचुप मिले राहुल गांधी
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपनी रणनीति को परवान चढ़ाने के लिए सुनियोजित तरीके से काम कर रहे हैं। 11 जुलाई को राहुल गांधी ने मुस्लिम बुद्धिजीवियों से गुपचुप मुलाकात की थी। अब सवाल यह उठता है कि राहुल ने गुपचुप मुलाकात क्यों की? मिलना ही था तो सबके सामने ठोक बजा कर मिलने में क्या दिक्कत?

दलअसल राहुल गांधी को हिंदुओं को जनेऊ के नाम पर और मंदिरों में दर्शन कर गुमराह करते रहना चाहते हैं। दूसरी तरफ मुसलमानों से मुलाकात कर यह दिखाना चाहते हैं कि वे उनके सबसे बड़ा शुभचिंतक हैं। हिंदू कहीं राहुल की इस मुलाकात से नाराज नहीं हो जाएं, इसीलिए मुस्लिम बुद्धिजीवियों से गुपचुप मुलाकात की। हैरत की बात ये है कि बीते दिनों उन्होंने दलित और ओबीसी समाज के लोगों से खुलेआम मुलाकात की थी। जाहिर है उनका मकसद मुसलमानों का एकमुश्त वोट पाना है और हिंदुओं को झांसे में रखना है कि वे उनके साथ हैं।

राहुल का ‘जनेऊ’ दिखावा, दिल में हैं ‘मुस्लिम’
”राहुल गांधी सिर्फ हिंदू ही नहीं जनेऊधारी हिंदू हैं।” 29 नवंबर, 2017 को कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने देश को यह बताने की कोशिश की थी कि राहुल गांधी ‘धर्म’ से हिंदू हैं। हालांकि सच्चाई इसके इतर है क्योंकि वे बदलती राजनीति का चेहरा हैं, गुजरात में जहां जनेऊधारी हिंदू थे तो यूपी-बिहार में मौलाना बन जाते हैं। राहुल गांधी जनेऊ पहनते हैं तो उसे सबको दिखाते हैं, जबकि मुस्लिमों से चुपके-चुपके मिल रहे हैं। बीते दिनों उन्होंने इफ्तार पार्टी में Skull Cap भी पहनी थी।

पिछले लोकसभा चुनाव में भी जामा मस्जिद के शाही इमाम से सोनिया गांधी ने मुलाकात की थी। पिछले लोकसभा चुनाव में भी जामा मस्जिद के शाही इमाम से सोनिया गांधी ने छिपकर मुलाकात की थी। दरअसल एंटनी कमेटी ने 2014 में रिपोर्ट दी थी कि मुस्लिम परस्ती के कारण कांग्रेस हिंदुओं के दिल से उतर गई है। जाहिर है इसके बाद से राहुल गांधी ने दिखावे के लिए हिंदू बनना शुरू कर दिया और मुस्लिमों से छिपकर मिलते रहे, यही सब आज भी कर रहे हैं।

कांग्रेस ने किया देशभर में शरियत कोर्ट का समर्थन
मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए कांग्रेस पार्टी कुछ भी कर गुजरने को तैयार है इसका एक उदाहरण दो दिन पहले देखने को मिला जब ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के हर जिले में शरियत कोर्ट स्थापित करने के फैसले का कांग्रेस ने समर्थन किया। जाहिर है AIMPLB का यह फैसला भारतीय संविधान के विरोध में है और देश की न्याय व्यवस्था के खिलाफ है। कांग्रेस पार्टी AIMPLB के इस फैसले का समर्थन करने में सबसे पहले सामने आई। कर्नाटक सरकार में कांग्रेस कोटे से मंत्री जमीर अहमद ने देशभर में शरियत अदालत स्थापित करने के मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले का समर्थन किया है। जमीर अहमद से स्पष्ट कहा कि समानांतर शरियत अदालतों से मुस्लिमों को पारिवारिक विवाद निपटाने में सहूलित होगी। जाहिर है कि भारतीय न्याय व्यवस्था और संविधान को चुनौती देने वाले इस फैसले के साथ कांग्रेस पार्टी खड़ी है। 

मुस्लिम बच्चियों के खतने पर भी कांग्रेस का समर्थन
मुस्लिम वोट बैंक के लिए कांग्रेस पार्टी लगातार कट्टरपंथ का साथ दे रही है। कांग्रेस हमेशा से तीन तलाक, बहुविवाह जैसी कुप्रथाओं के साथ खड़ी रही है। अब कांग्रेस ने मुस्लिम बच्चियों के खतने जैसी क्रूर प्रथा का भी समर्थन किया है। दरअसल मुसलिम समाज में मजहब के नाम पर खतना जैसी अमानवीय कुरीति को बंद करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की गई थी। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार इस याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने पूछा कि आखिर किसी के शरीर के साथ हिंसक छेड़छाड़ क्यों होनी चाहिए? मजहब के नाम पर रिवाज के तहत किसी के जननांग को छूने की इजाजत कैसे दी जा सकती है? कोर्ट के इन सवालों का जवाब दाउदी बोहरा के धर्मगुरु की तरफ से कांग्रेस के सांसद व वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने दिया है। सिंघवी ने कोर्ट से कहा है कि इस्लाम में खतना एक जरूरी रिवाज है। इस्लामिक दुनिया में हर पुरुष खतना कराते हैं, ऐसे में मुस्लिम महिलाओं के लिए खतना प्रतिबंधित क्यों? सिंघवी ने इस्लाम का खास रिवाज बताते हुए मुस्लिम महिला के खतना को वाजिब बताया है।

तीन तलाक के समर्थन में है कांग्रेस पार्टी
एक तरफ मोदी सरकार मुस्लिम समाज का महिलाओं को सदियों पुरानी तीन तलाक जैसी कुप्रथा से मुक्ति दिलाना चाहती है, वहीं कांग्रेस पार्टी इसकी राह में रोड़े अटका रही है। सुप्रीम कोर्ट में जब तीन तलाक के मुद्दे पर बहस चल रही थी तब कांग्रेस नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री कपिल सिब्बल ने मुल्ले-मौलवियों द्वारा औरतों के शोषण का हथियार बन चुके तीन तलाक के पक्ष में दलील दी थीं। मोदी सरकार इसको लेकर एक बिल लाई है, इस बिल को लोकसभा में पास भी कराया जा चुका है, लेकिन कांग्रेस पार्टी के विरोध के चलते तीन तलाक से जुड़ा ये बिल राज्यसभा में अटका है। जाहिर है कि अभिषेक मनु सिंघवी, कपिल सिब्बज जैसे कांग्रेसी सांसद और वकील जब सुप्रीम कोर्ट में ऐसे मध्ययुगीन और बर्बरतापूर्ण इस्लामी रिवाजों का समर्थन करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस पार्टी मुस्लिम तुष्टिकरण और वोट बैंक के लालच में मुसलमानों के कट्टर सोच के साथ खड़ी है। कांग्रेस पार्टी को सिर्फ अपने वोट बैंक से मतलब है और इसके लिए भारत को इस्लामिक राष्ट्र बनाने से भी उसे कोई गुरेज नहीं है।
आगे आपको बताते हैं कांग्रेस पार्टी की उन करतूतों को, जिनसे साफ जाहिर होता है कि कांग्रेस देश में मुस्लिम कट्टरपंथ को बढ़ावा दे रही है। कांग्रेस को सिर्फ सत्ता हालिस करना है, इसके लिए चाहे देश के टुकड़े ही क्यों नहीं जाएं। डालते हैं एक नजर-

एक और भारत विभाजन की पृष्ठभूमि तैयार कर रही कांग्रेस!
सालों साल तक सत्ता पर काबिज रहने की कवायद में वंशवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, क्षेत्रवाद, संप्रदायवाद की आग में देश को जलाने का काम कांग्रेस पार्टी करती रही है। समाज में विभाजन और बंटवारे की राजनीति के आसरे कांग्रेस तो बढ़ती रही, लेकिन देशहित को बहुत नुकसान पहुंचा है। बीते 70 सालों में जिस तरह से मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति की गई है उससे अब देश के एक और विभाजन की तस्वीर दिखने लगी है। हाल में कुछ ऐसे वाकये सामने आए हैं जिसमें मुसलमान समुदाय देशहित का विरोध करने से भी गुरेज नहीं कर रहा है। हैरत की बात यह है कि कांग्रेस पार्टी नाजायज मांगों पर भी अपना समर्थन देती जा रही है। आइये एक नजर डालते हैं कुछ ऐसे ही वाकयों पर-

जिन्ना का महिमामंडन कर रही कांग्रेस
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में जिन्ना की तस्वीर पर विवाद हो रहा है, लेकिन कांग्रेस चुप है। दरअसल देश के बंटवारे का गुनहगार जिन्ना की तस्वीर लगाए जाने को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड उचित ठहरा रहा है। ऐसे में कांग्रेस की चुप्पी का सबब सहज ही समझा जा सकता है। लेकिन कांग्रेस की ये चुप्पी उस कुत्सित सोच को समर्थन है जो देश के दुश्मन का महिमामंडन करने की सिर्फ इसलिए इजाजत देता है, क्योंकि वह एक मुस्लिम है। जाहिर है यह सोच देश की एकता-अखंडता के लिए बेहद खतरनाक साबित होने वाली है।

खुले में नमाज पर कांग्रेस की सियासत
देश के अधिकतर इलाकों में खुले में नमाज पढ़ने के मामलों के कारण अक्सर तनाव की स्थिति पैदा होती रही है। यह ऐसी समस्या है जो विकराल रूप धारण करती जा रही है। कई बार तो सड़कों पर आवागमन पूरी तरह बाधित हो जाता है और आम लोगों को परेशानी उठानी पड़ती है। हाल में जब हरियाणा में इसको लेकर विरोध किया गया तो कांग्रेस ने इसपर सियासत शुरू कर दी। कांग्रेस नेता प्रदीप जेलदार ने कुछ पत्रकारों के साथ मिलकर इसे मुद्दा बना दिया। जबकि यह मुद्दा बांग्लादेशी घुसपैठियों से भी जुड़ता है, लेकिन कांग्रेस ने वोट बैंक की खातिर देशहित को भी दरकिनार कर दिया।

मुसलमानों को एक होने का कांग्रेसी मंत्र
”मुस्लिम समाज कांग्रेस को वोट दे और अगर वे उसे वोट देंगे तो इस्लाम उन पर प्रसन्न होगा।” वरिष्ठ कांग्रेसी और राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने यही बात कहते हुए मुसलमानों से विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट देने की अपील की। उन्होंने कहा, “भाजपा को किसी भी हाल में कर्नाटक की सत्ता में नहीं आने देना चाहिए। मुसलमानों को बड़ी तादाद में एकजुट होकर कांग्रेस उम्मीदवार के पक्ष में मतदान करना चाहिए।” जाहिर है आजाद का यह बयान सीधे तौर पर मुस्लिम मतदाताओं की गोलबंदी का प्रयास भर ही नहीं, बल्कि विभाजन की राजनीति का बीज है।

असम में अवैध घुसपैठियों पर राजनीति
1972 में कांग्रेस सरकार को असम से अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैंड को अलग करना पड़ा। इसके बाद कांग्रेस की सत्तापरस्ती के कारण असम और त्रिपुरा में बंगाली शरणार्थियों की संख्या तेजी से बढ़ी। 1961 में ही यह संख्या छह लाख के ऊपर थी, आज यह बढ़कर ढाई करोड़ हो गई है। उस दौर में नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस की केंद्र सरकार ने जबरन बंगाली शरणार्थियों को समाहित करने का दबाव डाला तो तत्कालीन मुख्यमंत्री गोपीनाथ बोरदोलई ने इसका विरोध किया, लेकिन जवाहर लाल हरू ने विकास मद के दिये जाने वाले केंद्रीय अनुदान में भारी कटौती की धमकी दी। परिणास्वरूप राज्य सरकार को घुटने टेकने पड़े। आज यही आबादी अब देश से अलग होने की मांग कर रही है, लेकिन कांग्रेस अब भी बांग्लादेशी घुसपैठ को धर्म के आधार पर जोड़कर देखती है और अपनी राजनीति का आधार तैयार करती है।

‘आजादी गैंग’ को राहुल गांधी का समर्थन
जेएनयू में छात्रों के एक वर्ग ने 9 फरवरी, 2016 को देशविरोधी नारेबाजी की थी। जेएनयू छात्र संघ के नेताओं की मौजूदगी में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ जैसी भड़काऊ नारेबाजी की थी। इन नारों को सुनने के बाद सारा देश स्तब्ध था, सरकार राष्ट्रद्रोहियों पर कार्रवाई में जुटी थी, लेकिन कांग्रेस भारत विरोधियों के समर्थन में कूद पड़ी थी। तत्कालीन कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तब जेएनयू पहुंचकर कहा था- “केंद्र सरकार छात्रों की आवाज नहीं सुन रही है। जो लोग छात्रों की आवाज दबा रहे हैं, वह सबसे बड़े राष्ट्र विरोधी हैं। राहुल गांधी ने भले ही अपनी राजनीति चमकाने की कोशिश की, लेकिन इस दौरान वह देश में एक और विभाजन की लकीर जरूर खींच गए।

आपको आगे बताते हैं कि कांग्रेस पार्टी किस तरह राष्ट्रविरोधी ताकतों का साथ देती रही है।

पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन ‘लश्कर-ए-तैयबा’ की भाषा बोल रही कांग्रेस
क्या कांग्रेस पार्टी आतंकवादियों के इशारे पर काम करती है? ये सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि कांग्रेस और पाकिस्तान का आतंकवादी संगठन लश्कर-ए-तैयबा एक ही भाषा बोल रहे हैं। इसका सबूत एक बार फिर सामने आया है। लश्कर के प्रवक्ता ने कांग्रेस पार्टी के उस बयान का समर्थन किया है, जिसमें पार्टी ने सेना की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे। लश्कर के प्रवक्ता अब्दुल्ला गजनवी ने प्रेस रीलीज कर कहा, ”भारतीय सेना कश्मीर में मासूम लोगों को मार रही है और गुलाम नबी आजाद ने भी इस बात को स्वीकार किया है। कांग्रेस पार्टी ने इसका विरोध किया है, हम कांग्रेस पार्टी का समर्थन करते हैं कि भारतीय सेना अपने ऑपरेशन कश्मीर में बंद करे।”

अब तो कांग्रेस के नेता सैफुद्दीन सोज ने इस बीच कश्मीर की आजादी की मांग को जायज ठहरा दिया है। दरअसल गुलाम नबी आजाद हों या सैफुद्दीन सोज, ये सभी चुनावों की आहट सुनकर अपनी देशद्रोही सोच के साथ सामने आ जाते हैं। जाहिर है कांग्रेसियों के संस्कार और नीति कश्मीर के मामले में हमेशा भारत विरोधी रही है। जाहिर है कश्मीर समस्या के मूल में सिर्फ कांग्रेस की कारस्तानियां ही हैं।

गुलाम नबी आजाद के बयान से कांग्रेस की नीयत पर उठे सवाल
कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद ने कहा, ‘’जम्मू-कश्मीर में सेना का निशाना आतंकवादियों पर नहीं, आम नागरिकों पर ज्यादा होता है।‘’ जाहिर है कांग्रेस ने संयुक्त राष्ट्र संघ मानवाधिकार आयोग के मुस्लिम उच्चायुक्त जेन बिन राद अल-हुसैन की उस रिपोर्ट को ताकत देने की कोशिश की है जिसमें भारत पर ह्यूमेन राइट्स के उल्लंघन के आरोप लगे हैं। सूत्रों की मानें तो यह बयान राहुल गांधी के इशारे पर दिया गया है क्योंकि पार्टी ने इस मामले पर अपनी सफाई भी पेश नहीं की है।

सैफुद्दीन सोज ने फिर सुलगाई कश्मीर में ‘आजादी’ की आग
कांग्रेस नेता सैफुद्दीन सोज ने कहा, ‘’कश्मीरी पाकिस्तान के साथ जुड़ना नहीं चाहते, उनकी पहली इच्छा आजादी है।‘’ सोज का यह बयान कांग्रेस की उसी सोच को जाहिर करता है इन्हें न कश्मीर से मतलब है और न ही भारत देश से। मतलब है तो सिर्फ अपनी मुस्लिम परस्त राजनीति चमकाने से। अब जब लश्कर-ए-तैयबा से कांग्रेस का कनेक्शन सामने आ रहा है इससे सवाल उठ रहा है कि क्या कांग्रेस देश की राजनीतिक पार्टी है या पाकिस्तान परस्त आतंकवादी संगठन?

आतंकवादियों के विरुद्ध सेना की सख्ती का विरोधी है कांग्रेस
कश्मीर में राज्यपाल शासन लागू होने के बाद से ही भारतीय सेना आतंकियों के खिलाफ बड़े ऑपरेशन शुरू कर चुकी है। इसी के तहत एनएसजी कमांडो भी कश्मीर पहुंच चुके हैं। आइएस और जैश के सात से अधिक आतंकी ढेर किए जा चुके हैं। साफ है सेना पाकिस्तान परस्त आतंकवादियों के सफाये के प्लान पर आगे बढ़ रही है। ऐसे में सेना के विरोध में कांग्रेस पार्टी और लश्कर का एक सुर में बोलना कई सवाल खड़े कर रहा है।

कश्मीर घाटी से हिंदुओं के सफाए की गुनहगार है कांग्रेस
1990 में हिंदुओं के नरसंहार के बाद कांग्रेस की शह ने कट्टरपंथियों का हौसला बढ़ा दिया। गौरतलब है कि 1990 में कश्मीर में अलगाववादी मुसलमानों ने हजारों कश्मीरी पंडितों को मौत के घाट उतार दिया था। हिंदू औरतों के साथ बलात्कार किया गया था। चार लाख कश्मीरी पंडित अब भी विस्थापन की जिंदगी जी रहे हैं। धर्मनिरपेक्ष भारत के एक हिस्से में धर्म को लेकर ही अधर्म का नंगा नाच हो रहा था, लेकिन कांग्रेस की सरकार उस समय तमाशा देख रही थी।

साफ है कि कांग्रेस पार्टी हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त रही है। हमारे सामने ऐसे कई उदाहरण हैं जब कांग्रेस ने मुस्लिम परस्ती में हिंदुओं को बदनाम करने की साजिश रची।

कांग्रेस नेताओं ने साजिश के तहत गढ़ा ‘हिंदू आतंकवाद’
वर्ष 2007 में हैदराबाद के मक्का मस्जिद में बम विस्फोट हुआ था। इस मामले में स्थानीय पुलिस ने आतंकी संगठन हूजी से जुड़े वकार अहमद और बिलाल गिरफ्तार किया, लेकिन उन्हें छोड़ दिया गया। इसी वर्ष समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट हुआ जिसमें पाकिस्तानी नागरिक आरिफ कास्मानी समेत दो आरोपियों को पकड़ा गया, लेकिन दिल्ली के निर्देश पर उसे भी छोड़ दिया गया। इसके बाद देश में हिंदुओं को बदनाम करने की एक साजिश रची गई और नाम दिया गया ‘भगवा आतंकवाद’ या ‘हिंदू आतंकवाद’!

हिंदू आतंकवाद ज्यादा बड़ा खतरा – राहुल गांधी
26/11 के मुंबई आतंकवादी हमले के दो वर्ष बाद 2010 में अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भारत के दौरे पर थीं। तत्कालीन पीएम मनमोहन सिंह के साथ लंच के दौरान अमेरिका के राजदूत टिमोथी रोमर ने राहुल गांधी से पूछा कि वह ‘लश्कर-ए-तैयबा’ के बारे में क्या सोचते हैं। इस पर राहुल ने कहा, ‘’एलईटी को भूल जाइए, इस देश का हिंदू आतंकवाद ज्यादा बड़ा खतरा है।‘’ बाद में यह बातचीत लीक हो गई और लंदन के अखबार द गार्जियन ने इसे प्रकाशित किया।

आतंकवादियों के लिए सोनिया गांधी के निकले आंसू
सितंबर 19, 2008 को दिल्ली के जामिया नगर इलाके में मुठभेड़ हुई। इंडियन मुजाहिदीन के दो आतंकवादी मारे गए। दो अन्य भाग गए, जबकि जीशान को गिरफ्तार कर लिया गया। इस मुठभेड़ में दिल्ली पुलिस निरीक्षक मोहन चंद शर्मा शहीद हो गए। हालांकि कांग्रेस ने इसे फर्जी बताने की पूरी कोशिश की। 2012 में यूपी चुनाव के दौरान सलमान खुर्शीद ने मुसलमानों से कहा, “आपके दर्द से वाकिफ हूं। जब बाटला हाउस कांड की तस्वीर सोनिया गांधी को दिखाई थी। तस्वीरें देखकर उनकी आंखों में आंसू आ गए थे।”

मुंबई हमले में RSS को फंसाने की रची गई साजिश
वर्ष 2008 में 26/11 को मुंबई हमले को भी आरएसएस द्वारा हमले के रूप में न केवल प्रचारित किया गया, बल्कि इस पर एक पुस्तक भी लिखी गई। इसका लोकार्पण भी दिग्विजय सिंह ने किया था। हालांकि 13 मई, 2018 को पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने यह स्वीकार किया कि 2008 में हुए मुंबई आतंकी हमले में पाकिस्तानी आतंकियों का हाथ था। आरोप है कि तत्कालीन गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे, कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह, सोनिया गांधी, अहमद पटेल और राहुल गांधी ने मिलकर ‘हिंदू आतंकवाद’ की अवधारणा गढ़ी थी और उसे साबित करने का हर तरह का प्रयास किया था।

पूर्व अवर सचिव आरवीएस मणि ने खोला साजिश का चिट्ठा
यूपीए सरकार के दौरान गृह मंत्रालय में अवर सचिव रहे आरवीएस मणि ने कहा, ‘’हिंदू आतंक के नाम पर सरकारी संसाधनों का उपयोग करके तत्कालीन केंद्र सरकार ने असली आतंकवादियों को बचाया। राजनीतिक एजेंडे को नहीं जानता, लेकिन देश में कोई हिंदू आतंक नहीं है।‘’ उन्होंने कहा कि मेरी पुस्तक- ‘Hindu Terror-Insider account of Ministry of Home Affairs 2006-2010’ स्पष्ट रूप से बताती है कि कैसे दिग्विजय सिंह ने हिंदू आतंक शब्द की नींव रखी और इसे फैलाया।

आजादी के बाद से कांग्रेस के कृत्यों पर गौर करें तो ये साफ है कि कांग्रेस पार्टी हिंदू विरोधी और मुस्लिम परस्त रही है। आइये इसे तथ्यों के आईने में देखते हैं

हिंदू राष्ट्र का विरोध
बाबा साहब अम्बेडकर की पुस्तक- ‘दि डिक्लाइन एंड फाल आफ बुद्धिज्म’ में स्पष्ट है कि पं नेहरू ने कहा था, ”हिंदू राष्ट्र का केवल एक ही मतलब है, आधुनिक सोच को पीछे छोड़ना, संकीर्ण होकर पुराने तरीके से सोचना और भारत का टुकड़ों में बंटना।’’
यहां यह बताना आवश्यक है कि बाबा साहब की प्रबल इच्छा थी कि जब धर्म के आधार पर देश का बंटवारा हुआ है तो सारे मुस्लिम पाकिस्तान चले जाएं, लेकिन नेहरू ने अपनी मुस्लिम राजनीति के कारण ऐसा नहीं होने दिया।

जब बाबा साहब ने दिया इस्तीफा
बाबा साहब अम्बेडकर ने जब संविधान में समान नागरिक संहिता लागू करने की बात कही तो मुस्लिम तुष्टिकरण के लिए पंडित नेहरू ने इसका विरोध किया। बाबा साहब ने नेहरू की इसी मुस्लिम परस्ती से तंग आकर 27 सितंबर 1951 को संसद से इस्तीफा दे दिया।

वंदे मातरम का विरोध
आजादी के बाद यह तय था कि वंदे मातरम राष्ट्रगान होगा, लेकिन जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया और कहा कि वंदे मातरम से मुसलमानों के दिल को ठेस पहुंचेगी।

मंदिर पुनर्निमाण का विरोध
हिंदुओं के सबसे अहम मंदिरों में से एक सोमनाथ मंदिर को दोबारा बनाने का जवाहरलाल नेहरू ने विरोध किया था। उन्होंने कहा था कि सरकारी खजाने का पैसा मंदिरों पर खर्च नहीं होना चाहिए। दरअसल उन्हें डर था कि इससे मुस्लिमों में नाराजगी बढ़ेगी।

नसबंदी में हिंदुओं की हानि
आपातकाल के दौरान 1975 में इंदिरा गांधी के कार्यकाल में नसबंदी अभियान शुरू किया गया। मुस्लिमों के विरोध के कारण यह अभियान सफल नहीं हुआ, लेकिन इसका नुकसान हिंदुओं को उठाना पड़ा। दरअसल अधिकारियों को महीने के हिसाब से टारगेट दिए गए और उनकी रोज समीक्षा होने लगी। इसको पूरा करने के लिए अधिकारियों ने करोड़ों हिंदुओं की ही नसबंदी कर दी जबकि मुस्लिम आबादी बढ़ती रही।

बदल डाला देश का कानून
वर्ष 1987 सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा शाहबानो के फेवर में अपना फैसला देते हुए पति को गुजारा भत्ता देने का आदेश दिया, लेकिन मुस्लिमों ने पर्सलन लॉ में दखल कहा और विरोध किया। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए पर्सलन लॉ में कोर्ट के दखल को न सिर्फ गलत ठहराया, बल्कि संसद से एक कानून भी पास करा लिया।

हिंदुओं पर गोलियां चलवाईं
1990 में अपने मुख्यमंत्रित्व काल में समाजवादी पार्टी के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह ने हिंदू कारसेवकों पर गोलियां चलवाईं, उसमें 28 हिंदू लोग मारे गए। कहा जाता है कि मुलायम सिंह की इस हरकत के पीछे भी कांग्रेस का हाथ ही नहीं दिमाग भी था।

गोधरा नरसंहार पर राजनीति
27 फरवरी, 2002 को गुजरात के गोधरा स्टेशन पर मुस्लिमों ने 59 कार सेवकों को जिंदा जला दिया। कांग्रेस ने इसके बाद हुए दंगे को आधार बनाकर खूब राजनीति की और 2004 में केंद्र की सत्ता पर काबिज हो गई। गोधरा कांड के दोषियों को छोड़ दिया गया और उनके विरुद्ध केस कमजोर कर दिए गए। कांग्रेस की इसी करस्तानी के कारण मुख्य आरोपी मौलाना उमर को रिहा कर दिया गया।

मुस्लिम आरक्षण की मांग
वर्ष 2004 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में मुसलमानों को आरक्षण दिलाने का वादा किया था। इसी आधार पर चलते हुए तेलंगाना की टीएसआर सरकार ने मुस्लिमों को आरक्षण दे दिया। कांग्रेस आरक्षण का दायरा पूरे देश में फैलाना चाहती है जबकि धर्म के आधार पर हमारे संविधान में आरक्षण का प्रावधान नहीं है।

जयेंद्र सरस्वती को जेल
कांचीपुरम के वरदराजपेरुमल मंदिर के प्रबंधक शंकररामण की हत्या  3 सितंबर 2004 को कर दी गई थी। इस हत्याकांड में कांचि कामपीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती को प्रमुख आरोपी बनाया गया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब ‘द कोलिशन इयर्स’ में खुलासा किया है कि सोनिया गांधी ने ऐसा हिंदुओं को नीचा दिखाने और मुस्लिमों की तुष्टिकरण के लिए किया है। 

मुस्लिमों का पहला हक
10 दिसंबर, 2006 को तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने राष्ट्रीय विकास परिषद में भाषण के दौरान कहा कि देश के संसाधनों पर पहला हक मुसलमानों का है। अपनी मुस्लिम परस्ती और देश को तोड़ने वाली हरकत के लिए कांग्रेस ने आज तक माफी नहीं मांगी।

भगवा आतंकवाद की साजिश
18 फरवरी, 2007 को समझौता एक्सप्रेस में ब्लास्ट केस में दो पाकिस्तानी मुस्लिम आतंकवादियों को पकड़ा गया था, उसने अपना गुनाह भी कबूल किया था, लेकिन महज 14 दिनों में उसे चुपचाप छोड़ दिया। इसके बाद इस केस में स्वामी असीमानंद को फंसाया गया ताकि भगवा आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद को अमली जामा पहनाया जा सके।

मुस्लिम नहीं, हिंदू खतरा
17 दिसंबर, 2010 को विकीलीक्स ने राहुल गांधी की अमेरिकी राजदूत टिमोथी रोमर से 20 जुलाई, 2009 को हुई बातचीत का एक ब्योरा दिया। राहुल ने अमेरिकी राजदूत से कहा था, ”भारत विरोधी मुस्लिम आतंकवादियों और वामपंथी आतंकवादियों से बड़ा खतरा देश के हिन्दू हैं।”

नमाज के लिए 90 मिनट
18 दिसंबर, 2016 को उत्तराखंड की कांग्रेस सरकार ने राज्य के मुस्लिम कर्मचारियों को शुक्रवार के दिन 90 मिनट का अतिरिक्त अवकाश देने का फैसला किया।

राम मंदिर निर्माण विरोध
1949 से अब तक राम मंदिर के मुद्दे पर कांग्रेस ने सिर्फ और सिर्फ राजनीति की है, जबकि देश की 85 प्रतिशत आबादी की इच्छा है कि जिस राम जन्मभूमि पर भगवान राम का जन्म हुआ है वहीं मंदिर का निर्माण हो।

सच्चर कमिटी का गठन
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने 2005 में दिल्ली हाइकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस राजिंदर सच्चर की अध्यक्षता में समिति गठित की थी। इसके पीछे भी मुस्लिम वोट बैंक को साधने के राजनीतिक निहितार्थ थे। इस कमेटी को लागू करने के बाद मुसलमानों को आरक्षण देने की साजिश रची गई थी।

मुजफ्फरनगर मुस्लिम प्रेम
16 सितंबर, 2013 को राहुल गांधी यूपी के मुजफ्फरनगर में दंगा पीड़ितों से मिलने पहुंचे। यहां उन्होंने मुस्लिम समुदाय के पीड़ितों से तो मुलाकात की परन्तु हिंदुओं से नहीं मिले।

तीन तलाक और राम की तुलना
16 मई, 2016 को सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता और AIMPLB के वकील कपिल सिब्बल ने दलील दी कि जिस तरह राम हिंदुओं के लिए आस्था का सवाल है उसी तरह तीन तलाक और हलाला मुसलमानों की आस्था का मसला है। साफ है कि कांग्रेस और उसके नेतृत्व की हिंदुओं की प्रति उनकी सोच को ही दर्शाती है।

रामसेतु को तोड़ने का कांग्रेस का इरादा
कांग्रेस ने व्यावसायिक हित के लिए देश के करोड़ों हिंदुओं की आस्था पर कुठराघात करने की तैयारी कर ली थी। जिस राम सेतु के अस्तित्व को NASA ने भी स्वीकार किया है, जिस राम सेतु को अमेरिकी वैज्ञानिकों ने भी MAN MAID यानि मानव निर्मित माना है, उसे कांग्रेस पार्टी तोड़ने जा रही थी।

दरअसल हिंदुओं के इस देश में ही कांग्रेस पार्टी ने हिंदुओं को ही दोयम दर्जे का नागरिक बना दिया है। यही वजह रही कि वह एक अरब से अधिक हिंदुओं की आस्था पर आघात करने की तैयारी कर चुकी थी। कांग्रेस ने 2008 और 2013 में सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दिया था कि वह राम सेतु के अस्तित्व को नहीं मानती है। कांग्रेस ने यह भी कहा था कि सेतुसमुद्रम परियोजना पर लगभग 800 करोड रुपए वो खर्च कर चुकी है अतः इस परियोजना को बंद नहीं किया जा सकता। जाहिर है यह कुछ उसी तरह की करतूत थी जो बाबर ने रामलला के मंदिर को तोड़कर अयोध्या में विवादित ढांचा खड़ा किया था। 

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