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कांग्रेसी अखबार ने भी माना कि एमपी में बीएसपी के साथ मिलकर भी भाजपा को नहीं हरा सकते राहुल

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मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में इस बार भी कांग्रेस पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ सकता है। कांग्रेस के मुखपत्र कहे जाने वाले नेशनल हेरॉल्ड अखबार की वेबसाइट ने एक सर्वे के हवाले से यह दावा किया है। यानि कांग्रेस पार्टी ने अभी से मध्य प्रदेश में अपनी हार मान ली है। कांग्रेसी अखबार की इस खबर के अनुसार मध्य प्रदेश में अगर कांग्रेस और बीएसपी मिलकर चुनाव लड़ें तो भी भाजपा को हरा नहीं पाएंगे। मतलब साफ है कि मध्य प्रदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का जलवा बरकरार है और वहां लगातार चौथी बार भाजपा सरकार बनाने जा रही है।

कांग्रेस-बसपा गठबंधन के बाद भी बनेगी भाजपा सरकार
मध्य प्रदेश में चुनाव पूर्व हालात जानने के लिए यह सर्वे स्पीक मीडिया नेटवर्क ने किया था। इसी सर्वे के हवाले से एक रिपोर्ट नेशनल हेरॉल्ड में छापी गई है। सर्वे में बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है। इस सर्वे के मुताबिक मध्य प्रदेश में अगर कांग्रेस और बीएसपी के बीच गठबंधन नहीं होता है तो बीजेपी को उसका सीधा फायदा मिलेगा और उसे 147 सीटें मिलेंगी। कांग्रेस सिर्फ 73 सीटें जीत पाएगी और बसपा के खाते में 10 सीट जाएंगी। अगर कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन हो गया तब भी बीजेपी पर कुछ  फर्क नहीं पड़ेगा। इस स्थिति में भाजपा 126 सीटें जीत सकती है और कांग्रेस-बीएसपी गठबंधन 103 सीट ही हासिल कर पाएगा। यानि दोनों ही हालात में सरकार तो बीजेपी की ही बनती दिख रही है। जाहिर है कि मध्य प्रदेश में सरकार बनाने के लिए बहुमत के तौर पर 115 सीटों की जरूरत है।

पीएम मोदी सबसे अधिक लोकप्रिय नेता
सर्वे में यह भी बताया गया है कि मध्यप्रदेश में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सीएम शिवराज सिंह की लोकप्रियता बरकरार है।

सर्वे के अनुसार वोट शेयर की बात करें तो भाजपा को 45 प्रतिशत से अधिक, जबकि कांग्रेस-बसपा गठबंधन को करीब 48 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना है।

लोकसभा चुनाव में भी भाजपा रहेगी अव्वल
इस सर्वे में मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव के साथ ही लोकसभा चुनाव होने की स्थिति में भी कांग्रेस का सूपड़ा साफ होता दिखाया गया है। अगर अगले वर्ष लोकसभा चुनाव होते हैं तो स्पीक मीडिया के सर्वे के अनुसार भाजपा को 16 सीटें मिल सकती हैं और कांग्रेस-बसपा गठबंधन को सिर्फ 13 सीटें ही मिलेंगी। 

‘Fate of Madhya Pradesh’ नाम के इस सर्वे को 16 जून से 20 जुलाई, 2018 के बीच राज्य की 230 विधानसभा सीटों की 239 जगहों पर कराया गया था।

हालांकि नेशनल हेरॉल्ड की खबर और इस चुनाव पूर्व सर्वे में कुछ गलत भी नहीं हैं। जमीनी हकीकत भी यही है, मध्य प्रदेश में भाजपा के सामने कांग्रेस कहीं नहीं टिकती है। वैसे भी राहुल गांधी के नेतृत्व में कोई दम नजर नहीं आता है। जब से राहुल कांग्रेस में प्रभावशाली भूमिका में आए हैं, कांग्रेस पार्टी को एक के बाद एक हार का सामना करना पड़ा है। डालते हैं एक नजर-

राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने बनाया हार का रिकॉर्ड
कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी देश का प्रधानमंत्री बनने का सपना पाले बैठे हैं, लेकिन वे अपनी अगुवाई में पार्टी को एक भी राज्य का विधानसभा चुनाव नहीं जिता पाए हैं। राहुल की अगुवाई में कांग्रेस पार्टी एक के बाद एक राज्यों में लगातार हारती जा रही है। आलम यह है कि राहुल गांधी के उपाध्यक्ष रहते कांग्रेस 2014 में लोकसभा चुनाव के साथ 19 राज्यों की विधानसभा के चुनाव हार चुकी है, वहीं राहुल के अध्यक्ष बनने के बाद भी त्रिपुरा, नागालैंड और मेघालय में हार चुकी है।

आइये एक नजर डालते हैं राहुल के लगातार हार के रिकॉर्ड पर-

2018 सभी चार राज्यों के चुनावों में हारे राहुल
दिसंबर, 2017 कांग्रेस का अध्यक्ष बनने के बाद भी राहुल गांधी लगातार चुनाव हारते जा रहे हैं। वर्ष 2018 में त्रिपुरा, नागालैैंड और मेघालय में हुए चुनावों में भी कांग्रेस को हार का सामना करना पड़ा है। इसी वर्ष मई में हुई कर्नाटक के चुनाव में कांग्रेस को करारी हार का मुंह देखना पड़ा, हालांकि कर्नाटक में कांग्रेस ने जेडीएस के साथ बेमेल गठबंधन कर सरकार बना ली है। पूर्वोत्तर में एक समय कांग्रेस को छोड़कर अन्य किसी पार्टी का बोलबाला नहीं था, लेकिन कांग्रेस की स्थिति लगातार कमजोर होती चली गई। इसी कारण से पार्टी को पूर्वोत्तर में लगातार हार मिली।

2017 में सात में से छह राज्यों में मिली शिकस्त
वर्ष 2017 में सात राज्यों में हुए चुनाव के नतीजों ने राहुल गांधी के नेतृत्व क्षमता में कमजोरी की पोल खोल दी। गुजरात चुनाव में सारे विभाजनकारी तिकड़म अपनाने के बाद भी कांग्रेस को हार मिली, वहीं हिमाचल प्रदेश में भी सत्ता बचा नहीं सकी। इसके साथ उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में कांग्रेस को भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा। पंजाब में जीत कैप्टन अमरिंदर सिंह की विश्वसनीयता और मेहनत की हुई। गोवा और मणिपुर में कांग्रेस सरकार बनाने में नाकाम रही। उत्तर प्रदेश में बीजेपी की चमत्कारिक जीत और कांग्रेस की अब तक की सबसे करारी हार के रूप में हमारे सामने है। सवा सौ साल से भी किसी पुरानी पार्टी के लिए इससे बड़े शर्म की बात और क्या हो सकती है कि देश के उस प्रदेश में जहां कभी उसका सबसे बड़ा जनाधार रहा हो, वहीं पर, उसे 403 में से सिर्फ 7 सीटें मिलती हों।

2015-16 में मिली जबरदस्त हार
2015 में महागठबंधन के चलते बिहार में किसी तरह जीत मिली, लेकिन दिल्ली में तो सूपड़ा साफ हो गया। यहां पार्टी को एक भी सीट नहीं मिली। 2016 में असम के साथ केरल और पश्चिम बंगाल में हार का मुंह देखना पड़ा। पुडुचेरी में सरकार जरूर बनी। इस स्थिति में अब साफ तौर पर देखने को मिल रहा है कि कांग्रेस पार्टी कोमा में चली गई है। दरअसल कांग्रेस ने सिर्फ बीजेपी और प्रधानमंत्री मोदी के विरोध को ही सबसे बड़ा काम मान लिया है। इस कारण देश की जनता के मन में कांग्रेस के प्रति नकारात्मक भाव पैदा हो गया है। भ्रष्टाचार और घोटालों के दाग लिए कांग्रेस आखिर स्वयं को पाक-साफ बताने की कोशिश क्यों करती है? 2014 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद भी कांग्रेस ने कोई खास सबक नहीं सीखा। उल्टे राहुल गांधी अपने फटे कुर्ते के प्रदर्शन की बचकानी हरकतें करते रहें, लेकिन उन्हें कोई रोकने तो दूर, टोकनेवाला भी नहीं मिला।

2014 में 44 सीटों पर सिमट गई
दरअसल कांग्रेस के लिए यह विश्लेषण का दौर है, लेकिन वह वंशवाद और परिवारवाद के चक्कर में इस विश्लेषण की ओर जाना ही नहीं चाहती है। 2014 लोकसभा चुनाव में सिर्फ 44 सीटों पर जीत मिलने के साथ ही पार्टी प्रमुख विपक्षी दल तक नहीं बन पाई। इसी तरह महाराष्ट्र व हरियाणा से सत्ता गंवा दी। यही स्थिति झारखंड और जम्मू-कश्मीर में रही जहां करारी हार मिलने से पार्टी सत्ता से बाहर हो गई। पिछले पंद्रह सालों से लगातार कोशिशें करने के बावजूद राहुल गांधी देश के राजनैतिक परिदृश्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने और जगह बना पाने में असफल रहे हैं। लगातार मिल रही हार राहुल गांधी के पार्टी की कमान पूरी तरह से संभालने में लगातार देरी भी उनकी काबिलियत पर सवाल खड़े कर रही है।

2012 में कांग्रेस की जबरदस्त हार
लगातार होती हार पर हार राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता और राजनीतिक समझ पर सवालिया निशान खड़े कर रही हैं। दरअसल वर्ष 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस मजबूत बनकर उभरी तो यूपी से 21 सांसदों के जीतने का श्रेय राहुल गांधी को दिया गया। 2013 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी खुले शब्दों में कहा कि वे राहुल गांधी के नेतृत्व में काम करने को तैयार हैं, लेकिन राहुल को नेतृत्व दिये जाने की बात ही चली कि पार्टी के बुरे दिन शुरू हो गए। 2012 में यूपी विधानसभा चुनाव में पार्टी के खाते में महज 28 सीटें आई। वहीं पंजाब में अकाली-भाजपा का गठबंधन होने से वहां दोबारा सरकार बन गई। ठीकरा कैप्टन अमरिंदर सिंह पर फोड़ा गया। दूसरी ओर गोवा भी हाथ से निकल गया। हालांकि हिमाचल और उत्तराखंड में जैसे-तैसे कांग्रेस की सरकार बन तो गई, लेकिन वह भी हिचकोले खाती रही। इसी साल गुजरात में भी हार मिली और त्रिपुरा, नगालैंड, दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की करारी हार हुई।

राहुल के कारण हार के लिए चित्र परिणाम

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