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अरविंद केजरीवाल नहीं मानते कानून, नहीं जानते संविधान!

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29 जुलाई को केजरीवाल ने सार्वजनिक सभा में सीसीटीवी कैमरों पर एलजी कमेटी की रिपोर्ट को फाड़कर पटक दिया। रिपोर्ट को फाड़ने से पहले केजरीवाल ने कहा, ”जनता की मर्जी है कि इस रिपोर्ट को फाड़ दो।” केजरीवाल ने रिपोर्ट फाड़ते हुए कहा कि जनता और जनतंत्र की यही मर्जी है।

अरविंद केजरीवाल ने जिस अंदाज में रिपोर्ट की कॉपी फाड़ी वह यह साबित करता है कि वे जनता को भी कानून और संविधान नहीं मानने की नसीहत दे रहे हैं। जाहिर है अगर हर आदमी केजरीवाल की राह पकड़ ले तो शासन चलाना दूभर हो जाएगा।

दरअसल सार्वजनिक जीवन में अनुशासन का बड़ा महत्व है, लेकिन सूबे के मुखिया का यह आचरण जाहिर करता है कि वह किसी कानून के दायरे में यकीन नहीं करते हैं।

जाहिर है सार्वजनिक तौर पर संवैधानिक दायित्वों का निर्वहन कर रहे उपराज्यपाल के बारे में टिप्पणी कर ठिठोली करना और उपहास उड़ाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं को भी ठेस पहुंचाने वाला है।

किसी रिपोर्ट पर कोई असहमत हो सकता है और उसपर फिर बातचीत की जा सकती है, लेकिन अरविंद केजरीवाल ने रिपोर्ट की कॉपी फाड़कर अपनी ‘अराजक’ शैली का ही उदाहरण प्रस्तुत किया है।

गौरतलब है कि अरविंद केजरीवाल ने जब से राजनीति में कदम रखा है तब से ही जनता और जनतंत्र दोनों का ही मजाक बनाया है। हमारे सामने कई ऐसे उदाहरण हैं जो ये साबित करते हैं कि केजरीवाल न सिर्फ अराजक हैं, बल्कि नौटंकीबाज भी हैं। हाल-फिलहाल की कुछ घटनाओं पर नजर डालते हैं जो ये बताते हैं कि वह किस कदर असभ्य और अराजक हैं। 

  • 02 जुलाई को केजरीवाल ने कहा कि दिल्ली पहले मुगलों की गुलाम रही, फिर अंग्रेजों की और अब एलजी की गुलाम है।
  • 11 जून से हड़ताल दिल्ली के सीएम हड़ताल पर बैठ गए। एलजी के सामने पहले धौंस दिखाई, गिड़गिड़ाए, जब बात नहीं बनी तो हड़ताल खत्म की।
  • 01 जुलाई को केजरीवाल ने राहुल गांधी को धमकी दी कि दिल्ली को पूर्ण राज्य का समर्थन दें नहीं तो पीएम बनने का सपना छोड़ दें।
  • दिल्ली सरकार ने पहले पेड़ों को काटने की इजाजत दी और एनबीसीसी से करोड़ों रुपये लेने के बाद पेड़ कटाई का विरोध करने लगे।

कई उदाहरण हमारे सामने हैं जब केजरीवाल ने अपनी अराजक शैली का प्रदर्शन किया है। 

चुनाव आयोग पर धांधली का आरोप
11 मार्च . 2017 को पांच राज्यों में विधानसभा चुनावों के परिणाम आने पर केजरीवाल बौखला गये। अपनी खीझ और जनता के सामने अपनी हार की शर्म को इज्जत का रूप देने के लिए उन्होंने कहा कि मुझे जनता ने नहीं ईवीएम ने हराया है।

गणतंत्र दिवस का बहिष्कार
खुद को अराजकतावादी कहने वाले अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि 26 जनवरी का उत्सव संसाधनों की बर्बादी है। जाहिर है जो इंसान मुख्यमंत्री रहते संविधान दिवस तक की परवाह नहीं करे, वो वाकई अराजकतावादी ही हो सकता है।

रिजर्व बैंक के कामकाज पर सवाल
नवंबर में नोटबंदी का विरोध करते हुए केजरीवाल ने रिजर्व बैंक के काम करने के तरीकों की जमकर आलोचना की और सरकार के सामने घुटने टेक कर स्वायत्तता समाप्त करने का आरोप लगाया। जिसका सोशल मीडिया में काफी मजाक भी उड़ाया गया।

सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल
29 सितम्बर 2016 को पाकिस्तान के खिलाफ सेना द्वारा की गई सर्जिकल स्ट्राइक पर सवालिया निशान लगाते हुए बयान दिया कि पाकिस्तान किसी भी तरह की सर्जिकल स्ट्राइक से इंकार कर रहा है, इसलिए सरकार को सर्जिकल स्ट्राइक के सबूत देने चाहिए।

उच्च न्यायालय के फैसले को जनविरोधी बताना
4 अगस्त 2016 को दिल्ली उच्च न्यायालय ने जब यह आदेश दिया कि उपराज्यपाल केन्द्र शासित प्रदेश दिल्ली के प्रशासनिक मुखिया हैं और राज्य के प्रशासन में सरकार के निर्णय में उनकी सहमति आवश्यक है। इस निर्णय पर आम आदमी पार्टी ने कहा की यह जनविरोधी फैसला है। 

मुख्यमंत्री आवास के आसपास धारा 144 लागू करना
धरने और प्रदर्शन की राजनीति से सत्ता पर काबिज होने वाले केजरीवाल को जनता के धरने ओर प्रदर्शन से इतना डर लगने लगा कि उन्होंने 3 अगस्त 2016 को यह फरमान जारी कर दिया कि मुख्यमंत्री के सरकारी आवास पर धारा 144 लागू रहेगी। दूसरे ही दिन उपराज्यपाल ने इस आदेश को रद्द कर दिया। क्योंकि पुलिस कानून के तहत सीआरपीसी की धारा 144 लगाने का अधिकार डीसीपी या उससे ऊपर के स्तर के अधिकारियों के पास होता है और दिल्ली पुलिस उपराज्यपाल के अधीन काम करती है।

एसीबी में अपने अधिकारी को नियुक्त करना
दिल्ली पुलिस की एंटी करप्शन ब्रांच में किसी भी अधिकारी को नियुक्त करने का अधिकार दिल्ली के संविधान के तहत उपराज्यपाल के पास है। इस शक्ति का उपयोग करते हुए उपराज्पाल ने एमके मीणा को एसीबी का मुखिया बना दिया, लेकिन केजरीवाल ने उपराज्यपाल की इस नियुक्ति को मानने से इंकार कर दिया और अपने एक अधिकारी एसएस यादव की नियुक्ति कर दी और यह आदेश दिया कि वह केन्द्र या राज्य किसी अधिकारी के जांच के लिए स्वतंत्र है। केजरीवाल के इस आदेश को बाद में उच्च न्यायालय ने असंवैधानिक करार कर दिया।


डीडीसीए जांच के लिए सुब्रमण्यम कमेटी का गठन

21 दिसम्बर 2015 को केजरीवाल ने दिल्ली सरकार की कैबिनेट बैठक में डीडीसीए की जांच करने के लिए एक सदस्यीय गोपाल सुब्रमण्यम कमेटी को गठन करने का फैसला लिया। यह फैसला बौखलाहट में उस घटना के बाद लिया था जिसमें उनके मुख्य सचिव राजेन्द्र कुमार के दफ्तर पर सीबीआई ने भ्रष्टाचार की आरोपों की जांच के छापा मारा था। जबकि संविधान के अनुसार दिल्ली सरकार उपराज्यपाल की सहमति से ही किसी भी जांच समीति का गठन कर सकती है। बाद में दिल्ली उच्च न्यायालय ने केजरीवाल के इस फैसले को भी असंवैधानिक करार कर दिया।

इससे साफ होता है कि केजरीवाल को सेना, संविधान, न्यायालय किसी पर भी भरोसा नहीं है। प्रश्न यह उठता है कि फिर केजरीवाल पर क्यों भरोसा किया जाए।

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