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क्या देश के टुकड़े-टुकड़े करके ही दम लेंगे कांग्रेस और उसके साथी ?

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आजादी के समय बंटवारे का दंश झेल झुका भारत आज जिस मुहाने पर खड़ा है, वहां हालात 1947 से भी बदतर बनाने की कोशिशें हो रही हैं। देश के बंटवारे का मोटे तौर पर तीन तात्कालिक कारण माना जा सकता है। पहला- मुस्लिम लीग और उसके नेता मोहम्मद अली जिन्ना, दूसरा- अंग्रेजों की फूट डालो की नीति और तीसरा- कांग्रेस और विशेष रूप से जवाहर लाल नेहरू का स्वार्थ। इसमें तीसरा कारण अगर प्रभावी नहीं होता तो कोई भी ताकत, चाहे कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न रही हों, भारत को बांट नहीं पाता। लेकिन, आज के हालात तो उन दिनों की तुलना में बहुत ही खराब हैं। अब कांग्रेस के साथ एक परिवार ही नहीं, कुछ और परिवार एवं उनके स्वार्थी नेता भी सक्रिय हैं। 

नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस की लिस्ट पर हल्ला बोल
एनआरसी में असम के लगभग 40 लाख लोगों को अवैध करार दिए जाने के खिलाफ कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस गोलबंद हो गई है। जबकि, यह कवायद भारत में अवैध तरीके से रह रहे घुसपैठियों को कानूनी तरीके से निकालने की है। टीएमसी अध्यक्ष और पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इसे बंगाली अस्मिता से जोड़कर तुष्टिकरण में लग गई हैं तो कांग्रेस भी इसके खिलाफ आवाज बुलंद कर रही है। गौरतलब है कि अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों का मुद्दा असम की बहुत पुरानी और बड़ी समस्या है। इसीलिए एनआरसी की पूरी कार्रवाई सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में हो रही है। इतिहास में जाएं तो असम में बांग्लादेशी घुसपैठियों के बसने के पीछे भी कांग्रेस का ही हाथ है। 1961 में बंगाली शरणार्थियों के नाम पर घुसे लोगों की संख्या मात्र 6 लाख थी, जो बढ़कर ढाई करोड़ तक पहुंच गई। उनमें से भी अब 1971 के बाद के घुसपैठियों को निकाला जाना है। उस समय जवाहर लाल नेहरू ने बंगाली शरणार्थियों को असम में रहने देने के लिए राज्य सरकार पर यह कहकर दबाव बनाया कि उनकी बात नहीं मानने पर राज्य को केंद्रीय सहायता कम कर दी जाएगी।

पश्चिम बंगाल से हिंदुओं के सफाए की साजिश ?
आज पश्चिम बंगाल के 38 हजार गांवों से 8 हजार से अधिक गांव ऐसे हैं, जहां बहुसंख्यक आबादी यानि एक भी हिंदू नहीं रह गया है। आशंका है कि वहां रहने वाले या तो मजबूरन अपना पुश्तैनी घर छोड़ गए हैं या कुछ ने हालात से समझौता करके धर्म परिवर्तन कर लिया है। राज्य के तीन जिलों मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तरी दिनाजपुर में हिंदू अल्पसंख्यक बन चुके हैं। इसका बहुत बड़ा कारण बांग्लादेशी घुसपैठिए हैं, जिसके चलते ममता असम में नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस की लिस्ट जारी होने के बाद से परेशान हैं। आंकड़े बताते हैं कि 1951 की तुलना में 2011 तक पश्चिम बंगाल में मुस्लिम आबादी लगातार बढ़ती गई है और हिंदुओं की जनसंख्या तुलनात्मक रूप से कम हो रही है। इस दौरान राष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम आबादी जहां 0.8 प्रतिशत के दर से बढ़ी है, वहीं पश्चिम बंगाल में 1.77 प्रतिशत की दर से बढ़ी है। वहीं, हिंदुओं की आबादी राष्ट्रीय स्तर पर 0.7 प्रतिश कम हुई है, लेकिन पश्चिम बंगाल में यह गिरावट 1.94 के खतरनाक स्तर पर रही है। जिस मानसिकता के चलते अपने ही देश में हिंदू अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं, वही मानसिकता बांग्लादेशी घुसपैठियों के बाद रोहिंग्या मुसलमानों को भी भारत में बसाने का षड़यंत्र भी रच रही है। यही नहीं, पिछले कुछ वर्षों से ममता सरकार लगातार वहां हिंदुओं को पूजा-पाठ में भी बाधा डालने की कोशिश कर रही है और कई बार तो इसके लिए अलदात को भी दखल देना पड़ा है। 

सरकारी शिक्षा में इस्लामीकरण की साजिश
वोट बैंक के लिए कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां तुष्टिकरण की हद पार कर चुकी हैं। इसका ताजा और सबसे खतरनाक उदाहरण उत्तर प्रदेश में देखने को मिला है। यहां पूर्वांचल के कई सरकारी स्कूलों के नाम के साथ इस्लामिया जोड़कर उसका इस्लामीकरण कर दिया गया था। अभी तक की जांच में गोरखपुर, देवरिया, सुल्तानपुर जैसे अनेक जिलों में ऐसे सरकारी स्कूल सामने आए हैं, जिनके नाम के आगे इस्लामिया शब्द जोड़ दिया गया था, जैसा कि मुस्लिम देशों में होता है। इन सरकारी स्कूलों के संचालकों को पुरानी सरकारों ने इतना बढ़ावा दे रखा था कि इन्होंने रविवार की छुट्टी को खत्म करके शुक्रवार की छुट्टी घोषित कर दी थी, जो कि पूरी तरह से मजहबी व्यवस्था है। यहां ये जान लेना आवश्यक है कि पिछले साल बीजेपी की सरकार बनने से पहले वहां समाजवादी पार्टी और बहुजन समाजवादी पार्टी की सरकारें रही हैं जो प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से दशकों से कांग्रेस की सहयोगी रही हैं और उनकी नीति वोट बैंक के लिए कुछ भी करने की रही है।

खतना, ट्रिपल तलाक और हलाला पर संविधान से किनारा
कांग्रेस और उसकी सहयोगी पार्टियां खतना और ट्रिपल तलाक जैसी कुरीतियों को मिटाने के खिलाफ खड़ी हैं। ये कुप्रथा भारत के संविधान की भावना के विरुद्ध है और इसलिए मोदी सरकार इसे खत्म करना चाहती है। लेकिन, मुस्लिम वोट बैंक को बचाने के लिए विपक्षी पार्टियों ने संविधान को भी नजरअंदाज कर दिया है। कांग्रेस नेता और वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट तक में कहा कि ”होते रहना चाहिए महिलाओं का खतना।” क्योंकि, कांग्रेस मानती है कि ‘खतना’ शरिया का हिस्सा है। इसी तरह कांग्रेस मुस्लिम महिलाओं की रक्षा के लिए लाए गए ट्रिपल तलाक बिल को राज्यसभा से पास नहीं होने दे रही। मुस्लिमों में बहुविवाह, मुताह निकाह और हलाला जैसी गंदगी पर भी वो शरिया को संविधान से ऊपर मानती है, जिसके चलते मुस्लिम लीग के नक्शे कदम पर चलने वाले कट्टरपंथी ताकतों का हौसला बढ़ता जा रहा है। हद तो ये हो गई कि जब AIMPLB ने संविधान के विरुद्ध जाकर देश भर में शरिया कोर्ट बनाए जाने की बात कही तो कर्नाटक के एक कांग्रेसी मंत्री जमीर अहमद ने उसका भी समर्थन कर दिया और राहुल गांधी ने उसका मौन समर्थन किया।

देशद्रोहियों के साथ दिखने की होड़
जेएनयू में 9 फरवरी, 2016 की ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ और ‘कितने अफजल मारोगे, हर घर से अफजल निकलेगा’ जैसे देश विरोधी नारेबाजी हो या हिंदू ‘पाकिस्तान’ और हिंदू ‘तालिबान’ जैसी बयानबाजी कांग्रेस और उसके समर्थकों ने देश की प्रतिष्ठा धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। हद तो ये है कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अपने पिता के ननिहाल की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए जेएनयू में ये तक कह चुक हैं- “केंद्र सरकार छात्रों की आवाज नहीं सुन रही है। जो लोग छात्रों की आवाज दबा रहे हैं, वह सबसे बड़े राष्ट्र विरोधी हैं।” यही नहीं, कांग्रेस ने गोपाल कृष्ण गांधी को उपराष्ट्रपति उम्मीदवार बनाने से पहले एक बार भी नहीं सोचा कि आतंकवादियों को लेकर उनकी सोच कितनी घिनौनी है। जब मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन की फांसी की खबर सुनने के लिए पूरा देश इंतजार में था, तब गोपाल कृष्ण गांधी ने उस आतंकवादी की सजा का विरोध किया था। इसी कड़ी में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का नाम भी लिया जा सकता है, जिनके देश से फरार इस्लामिक प्रचारक जाकिर नाइक के साथ गहरे ताल्लुकात रहे हैं और ओसामा बिन लादेन के प्रति उनकी सहानुभूति जगजाहिर है। जबकि, खुद सोनिया गांधी के आतंकवादियों के मारे जाने पर फूट-फूट कर रोने की बात कांग्रेस नेता ही सार्वजनिक तौर पर स्वीकार कर चुके हैं। इस कड़ी में मणिशंकर अय्यर जैसे नेताओं का भी नाम लिया जा सकता है, जो मोदी जी के विरोध के लिए पाकिस्तान तक से गुहार लगाकर लौट चुके हैं। हालांकि तकनीकी रूप से वो अभी कांग्रेस से अलग चल रहे हैं।

कश्मीर पर उल्टा राग, आतंकियों का मिला साथ
कांग्रेस के देश विरोधी रवैये से आतंकी संगठन लश्कर ए तैयबा भी प्रभावित रहा है। यही कारण है कि उसने कांग्रेस पार्टी के उस बयान का समर्थन किया था, जिसमें पार्टी ने कश्मीर में सेना की कार्रवाई पर सवाल उठाए थे। लश्कर प्रवक्ता अब्दुल्ला गजनवी ने प्रेस रिलीज जारी कर कहा था, ”भारतीय सेना कश्मीर में मासूम लोगों को मार रही है और गुलाम नबी आजाद ने भी इस बात को स्वीकार किया है।” इससे पहले गुलाम नबी आजाद ने कहा था- “जम्मू-कश्मीर में सेना का निशाना आतंकवादियों पर नहीं, आम नागरिकों पर ज्यादा होता है।” दरअसल जवाहर लाल नेहरू ही वो नेता थे, जिन्होंने कश्मीर समस्या पैदा किया और आज भी कांग्रेस के अंदर से ही कश्मीर की आजादी की मांग उठाई जाती है। मसलन सैफुद्दीन सोज जैसे कांग्रेसी नेता खुलेआम इस मांग को जायज ठहरा चुके हैं। उन्होंने हाल ही में कहा था- “कश्मीरी पाकिस्तान के साथ जुड़ना नहीं चाहते, उनकी पहली इच्छा आजादी है।” यही कारण है कि कांग्रेस के चलते आज तक संविधान में अनुच्छेद 370 मौजूद है और कांग्रेस एवं उसके सहयोगी उसे हटाने की मांग का विरोध करते हैं।

कुल मिलाकर आज हालत एक तरह से 1947 से भी अधिक विस्फोटक हैं। केरल छोड़कर मुस्लिम लीग भले ही भारत में कहीं नहीं दिखता हो, लेकिन वह मानसिकता अभी भी मौजूद है। उस समय अकेले कांग्रेस और उसके एक प्रभावी नेता के चलते देश बंट गया था। आज कांग्रेसी मनोदशा वाली कई पार्टियां उसका साथ दे रही हैं। उस समय कांग्रेस के एक परिवार का स्वार्थ था, आज उसके साथ स्वार्थी नेताओं का जमावड़ा है, जो अपने निहित स्वार्थ के लिए राष्ट्रहित को दरकिनार कर रहे हैं। इसका अंजाम ये हो रहा है कि मुस्लिम लीग की मानसिकता वाले देशद्रोहियों को अपना मंसूबा साधने का मौका मिल रहा है।

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