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मंदसौर में हिंदू बच्ची से रेप पर मीडिया, बुद्धिजीवियों और सेक्यूलरों की जुबानों पर ताले क्यों!

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मध्य प्रदेश का मंदसौर जल रहा है, लेकिन राहुल गांधी नदारद हैं। मंदसौर के लोग हजारों की संख्या में लोग सड़कों पर हैं, लेकिन मीडिया मौन है। तथाकथित बुद्धिजीवियों और सेक्यूलरवादियों की जुबानों पर ताले लगे हैं। बॉलीवुड के सेक्यूलरों को भी आज हिंदुस्तानी होने पर शर्म नहीं आ रही है। जानते हैं क्यों? क्योंकि वहां एक 7 साल की हिंदू बच्ची के साथ बलात्कार हुआ है और रेप करने वाला एक मुसलमान है।

इस तरह की बातें आपको हैरत में जरूर डालती होंगी। आप सोचते होंगे कि यह तो अपराध है, इसमें हिंदू-मुस्लिम क्यों?  दरअसल ये सीमा रेखा हमने नहीं बल्कि कांग्रेसी, वामपंथी और तथाकथित सेक्यूलरवादियों ने खींची हैं।

आरोप है कि इरफान नाम के दरिंदे ने बच्ची का रेप उसे ‘काफिर’… यानि दूसरे धर्म का समझकर किया था।

मोहम्मद इरफान ने 7 साल की बच्ची को उठाया और उसका रेप किया, उसे मारने की कोशिश की, जब उसे लगा कि बच्ची मर गई है तो इसने उसे झाड़ियों में फेंक दिया और भाग गया।

भागने से पहले उसने बच्ची की गुप्तांग दांतों से काटा, उसकी अंतड़ियां निकालीं, बच्ची की गर्दन, कान, गाल को भी दांतों से काटा। इलाज कर रहे डॉक्टर भी बच्ची की हालत देखकर कांप रहे हैं। बच्ची के प्राइवेट पार्ट गंभीर रूप से जख्मी है और जान बचाने के लिए उसकी आंतें भी काट दी गई हैं।

हालांकि इस दरिंदे को अब गिरफ्तार तो कर लिया गया है, पर देश की मीडिया में पूरी तरह सन्नाटा है, बुद्धिजीवियों की जुबानों पर ताले हैं, सेक्यूलरवादियों ने अपने मुंह को हाथों से ढक रखा है, लेकिन क्यों? जाहिर है ये कोई कठुवा की असिफा का मामला नहीं है, बल्कि हिंदू बच्ची से रेप का मामला है, इसलिए मीडिया बुद्धिजीवी, बॉलीवुड के सेक्यूलर लोग खामोश हैं। जाहिर है इस खबर को देश का तथाकथित सेक्यूलर ब्रिगेड दबाने में लग गया है।

वकीलों ने आरोपी इरफान का केस लड़ने से भी मना कर दिया है और लोग उसकी फांसी की मांग पर अड़े हैं। सूबे के सीएम शिवराज सिंह चौहान ने भी कह दिया है कि मामला फास्ट ट्रैक कोर्ट में चलाया जाएगा और जल्द से जल्द दोषी को फांसी दी जाएगी।

हालांकि इस मामले ने तथाकथित बुद्धिजीवियों और सेक्यूलरवादियों की चुप्पी ने एक बार साफ कर दिया है कि अगर पीड़ित कोई हिंदू होगा तो ये अपनी जुबान नहीं खोलेंगे, ये तो सिर्फ और सिर्फ आसिफा, अखलाक और जुनैद के लिए ही जुबान खोलेंगे। 

अर्थला मस्जिद में हिंदू बच्ची से रेप पर भी नहीं खुली थी जुबान

दो महीने पहले की ही बात है, दिल्ली की एक 11 वर्ष की बच्ची अपने घर से कुछ खरीदने बाहर निकलती है और वापस नहीं लौटती है.. जब घर वाले पुलिस की मदद लेते हैं तो पुलिस घटना की कड़ियां जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद पहुंचती है। यहां अर्थला इलाके के एक मदरसे से बच्ची को बेहद बुरी हालत में बरामद किया गया। मुस्लिम बहुल इलाके का यह मदरसा एक मस्जिद के परिसर का ही हिस्सा है। जांच में पता लगा कि बच्ची नशे की दवाई दी गई और इस हिन्दू बच्ची से मौलवी शाहबाज खान और 17 साल के एक युवक ने 5 दिनों तक रेप किया।

घटना के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे और थाने का घेराव किया। लोग आरोपियों को सख्त सजा देने के लिए लगातार अपनी मांग बुलंद करते रहे,  लेकिन इस पूरे मामले पर तथाकथित सेक्यूलर मीडिया खामोश रही। राहुल गांधी भी इसलिए ही शायद चुप रह गए कि पीड़ित हिंदू थी और आरोपी मुस्लिम समुदाय से? लोग यह भी सवाल करते रहे कि क्या पीड़ित मुस्लिम होती और आरोपी हिंदू समुदाय से, तो राहुल इसी तरह चुप रहते?

हिंदू बच्ची से रेप के विरुद्ध राहुल गांधी ने क्यों नहीं निकाला कैंडल मार्च?
जम्मू के कठुवा में रेप की पुष्टि भी नहीं हुई थी, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने विरोध प्रदर्शन किए, बहन प्रियंका के साथ मिलकर कैंडल मार्च तक निकाला। मंदिर को बदनाम करने का काम किया और हिंदुओं को निशाना बनाया, लेकिन यहां एक मौलवी द्वारा एक हिंदू बच्ची के बलात्कार पर चुप रहे। मस्जिद से सटे हुए मदरसे में रेप किया गया, लेकिन किसी की जबान तक नहीं खुली। सवाल उठ रहा है कि देश के एक बड़े पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आखिर एक जैसे मामले में दोहरा रवैया कैसे अपना सकते हैं? सवाल यह भी कि राहुल गांधी धर्म देखकर ही अपनी जुबान खोलते और बंद रखते हैं?

‘सिलेक्टिव सेक्यूलरिज्म’ की पोल खोलता है अर्थला मदरसा बलात्कार कांड!
दिल्ली की बच्ची का मौलवी ने रेप किया, लेकिन सूबे के सीएम अरविंद केजरीवाल खामोश रहे। उन्होंने न तो पीड़ित परिवार से मुलाकात की और न ही किसी तरह की सहायता की ही घोषणा की। दिल्ली महिला आयोग की अध्यक्ष स्वाति मालीवाल ने भी इस मामले पर अनशन नहीं किया और न ही फेसबुक और ट्विटर पर अलका लांबा के आंसू ही छलके।

दरअसल ये सिलेक्टिव सेक्यूलरिज्म की पोल खोलने का वो नमूना है जो बलात्कार जैसे घृणित अपराध में भी धर्म देखता है। बच्ची हिंदू समुदाय से है, इसलिए ही शायद बलात्कारी मौलवी को फांसी देने की भी मांग लेकर कोई ‘महिलावादी गैंग’ भी सामने नहीं आया। हैरतपूर्ण बात यह भी है कि कठुआ कांड पर जिस तरह से हिंदू समाज का हर व्यक्ति इंसाफ की मांग लेकर सामने आया उस तरह से मुस्लिम समुदाय की ओर से कोई सामने नहीं आया। 

मौलवी द्वारा हिंदू बच्ची के रेप पर सेक्यूलरों की खामोशी क्या कहती है?
राजस्थान में एक दलित हिंदू बच्ची से रेप, अर्थला में मदरसा-मस्जिद में रेप, सासाराम में मेराज आलम द्वारा रेप, मुंबई में एक मुस्लिम द्वारा रेप… ये सभी घटनाएं एक चरित्र की हैं, लेकिन मीडिया ने इसे नहीं दिखाया। दरअसल फर्क सिर्फ यह है कि इन तीनों जगहों पर पीड़ित हिंदू समुदाय से है और बलात्कार का आरोपी मुस्लिम समुदाय का। लेकिन मीडिया के इस तथाकथित सेक्यूलर धड़े को मुस्लिमों में कोई बुराई नहीं दिख रहा है। हालांकि किसी एक भी हिंदू का नाम आ जाए तो मीडिया की नजर में पूरा समुदाय बलात्कारी हो जाता है और हिंदू धर्म ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। दरअसल ये वही कुनबा है जो असम, बंगाल, कश्मीर में हिंदू महिलाओं पर हो रहे अत्याचार-बलात्कार पर भी खामोश रहता है।

बॉलीवुड के कलाकारों ने अपने गले में क्यों नहीं टांगी विरोध की तख्ती?
15-16 अप्रैल,2018 को पूरे देश ने देखा कि किस तरह बॉलीवुड से जुड़े कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियों ने कठुआ कांड को पूरे हिंदू समुदाय से जोड़ दिया था। करीना कपूर खान, श्रुति सेठ आलम, जावेद अख्तर और फरहान अख्तर जैसे लोगों को भारतीय होने में भी शर्म आ रही थी। बॉलीवुड का यह धड़ा भारत को ‘बलात्कारी देश’ तक कह रहा था। इन्हें हिंदू धर्म में सिर्फ बुराइयां नजर आ रही थीं। देव स्थान को ‘बलात्कार का स्थान’ घोषित करने की आतुरता थी। परन्तु मंदसौर, अर्थला, सासाराम और राजस्थान की घटनाओं पर सब खामोश हैं। कहीं कोई विरोध की तख्ती नहीं, कोई शर्मिंदगी नहीं, कोई न्याय की मांग नहीं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि पीड़ित हिंदू समुदाय से है।

अपने ही देश में हिंदुओं को नीचा दिखाने की साजिश कर रहे सेक्यूलरवादी!
बलात्कार जैसे घृणित अपराध को धर्म की नजरों से देखना कतई सही नहीं है, लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या कठुआ कांड में पूरे हिंदू समुदाय को बदनाम करने की साजिश रची गई थी? अगर नहीं तो मस्जिद में रेप पर ये खामोशी क्यों? सासाराम में मेराज आलम द्वारा रेप किए जाने पर चुप्पी क्यों? मंदसौर में काफिर समझकर बच्ची से रेप पर मौन क्यों? 

दरअसल देश में ऐसी शक्तियां लगातार सक्रिय हैं जो लगातार दुष्प्रचार कर रही हैं। तथाकथित सेक्यूलर पत्रकार या फिर देश के भीतर के विभाजनकारी तत्व हों, सभी देश को बदनाम करने के एजेंडे पर चल रहे हैं। इस एजेंडे के चेहरे भी कमोबेश वही हैं जिन्हें कठुआ कांड में पूरा हिंदू समुदाय दोषी नजर आता है, लेकिन हिंदुओं को प्रताड़ित किए जाने के बाद भी ये खामोश रहते हैं। ये वही धड़ा है जो कठुआ कांड के आरोपियों की सीबीआई जांच और नार्को टेस्ट की मांग को खुद ही खारिज कर देता है और हिंदू समुदाय को बलात्कारी और हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास करता है।

जाहिर है ऐसे प्रकरण बताते हैं कि तथाकथित सेक्यूलरवादियों का दोहरा चरित्र है और यह पीड़ित के मुसलमान होने पर ही अपनी जुबान खोलते हैं। 

लाशों पर राजनीति करने वाले ‘लाल गिद्धों’ को पहचानिये!
2002 में दिल्ली के मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज की लड़की के साथ दिल्ली गेट के अंदर भरी दोपहरिया में रेप हुआ। इस खबर की पीड़िता का नाम और पता कभी मीडिया में नहीं आया।  2012 में दामिनी के साथ जब रेप और हत्या हुई तो पूरा देश सड़क पर आ गया। क्या आपको पता चला था कि बलात्कारी नाबालिग किस कौम से था?  सासाराम, मुंबई और सूरत जैसी घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं, लेकिन यह आप कहीं भी पीड़िता का नाम नहीं देखेंगे। लेकिन कठुआ मामले में पीड़िता का नाम बार-बार जाहिर किया गया। देश के सभी लोगों ने बच्ची के साथ अत्याचार पर रोष जाहिर किया है और सबने इसे मानवता के साथ अन्याय माना है। कठुआ में नाबालिग बच्ची के साथ भी वही अन्याय हुआ है, लेकिन इसे मजहब के आईने से देखा गया। बड़ी धूर्तता के साथ आसिफा को भारत की बेटी नहीं मुसलमान की बेटी बना दिया गया।

 ‘लाल गिद्धों’ ने बना दिया असंवेदनशीलता का तमाशा!
मासूम आसिफा को मुसलमान की बेटी बनाने वाले कौन हैं? क्या ये वही नहीं है जिसने गोधरा में 59 कारसेवकों को जलाने पर चुप्पी बना ली थी? क्या ये वही नहीं हैं जिसने गोधरा के बाद प्रतिक्रिया स्वरूप हुई घटना को मसाला लगा कर बेचा?  याद रखिये कि गोधरा के बाद की घटनाओं को इन्होंने बेचने की कोशिश तो जरूर की, लेकिन देश की जनता ने इसे खरीदा नहीं! सोशल मीडिया के दौर में अफवाहें फैलती हैं तो फरेबी पत्रकारों के ‘लाल एजेंडे’ की पोल भी खुलते देर नहीं लगती। 

 

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