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एजेंडा पत्रकारों का ABP ओपिनियन पोल

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गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए ABP न्यूज चैनल ने सीएसडीएस के साथ मिलकर फाइनल ओपिनियन पोल किया है। हर विधानसभा चुनाव के पहले ऐसे ओपिनियन पोल करने की चैनल में एक परंपरा सी बन गई है। फरवरी-मार्च 2017 में उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव के लिए भी ऐसे ही ओपिनियन पोल हुए थे। ओपिनियन पोल के बहाने जिस तरह से आज जीएसटी के बाद गुजरात चुनाव को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है, वैसे ही नोटबंदी के बाद उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को भी एजेंडा पत्रकारों ने प्रधानमंत्री मोदी के लिए नाक की लड़ाई बना दिया था। इन दोनों चुनावों के ओपिनियन पोल्स के तुलनात्मक अध्ययन करने पर यह बात स्पष्ट होती है कि ओपिनियन पोल एजेंडा चलाने वाले पत्रकारों के हाथ की कठपुतली बन गये हैं। आइए, इसे समझने की कोशिश करते हैं।

गुजरात पर ABP का तथाकथित फाइनल सर्वे- ABP न्यूज ने लोकनीति-सीएसडीएस के साथ मिलकर 23 नवंबर से 30 नवंबर के बीच गुजरात के 50 विधानसभा क्षेत्रों के 200 बूथों पर 3,655 मतदाताओं से चुनाव के बारे में राय जानी। इसके आधार पर एजेंडा पत्रकारों ने निष्कर्ष निकाला कि भाजपा और कांग्रेस को बराबर-बराबर 43 प्रतिशत मत मिल रहा है। उनके मुताबिक भाजपा को 91-99 सीटें मिलेंगी वहीं कांग्रेस को 78-86 सीटें मिलेंगी।ABP न्यूज ने लोकनीति-सीएसडीएस के साथ मिलकर ऐसा ही ओपिनियन पोल उत्तरप्रदेश विधानसभा चुनाव के लिए जनवरी 2017 में भी किया था। उत्तर प्रदेश के इस ओपिनियन पोल के निष्कर्षों और मार्च में आये वास्तविक परिणाम की तुलना करने पर यह साफ हो जाता है कि ABP का गुजरात के लिए किया गया फाइनल ओपिनियन पोल भी एजेंडा पत्रकारिता का एक नमूना भर है।

यूपी विधानसभा के लिए जनवरी में आया था ABP न्यूज का सर्वे– 11 फरवरी से शुरू होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए यह सर्वे 17 जनवरी से 25 जनवरी के बीच 65 विधानसभा क्षेत्रों की 322 बूथों के 6,481 मतदाताओं की राय पर आधारित था। उत्तर प्रदेश के लिए किये गए इस सर्वे के निष्कर्ष भी गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए ताजा सर्वे के निष्कर्षों के समान ही था। सर्वे के नतीजों का दूर-दूर तक वास्तविक नतीजों से कोई मेल नहीं था। क्या यह तथ्य यह स्थापित करने के लिए काफी नहीं कि इस तरह का फाइनल ओपिनियन पोल ABP की एजेंडा पत्रकारिता का एक हिस्सा है? उत्तर प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में एसपी-कांग्रेस गठबंधन को 187 -197 सीटें और भाजपा को 118-128 सीटें मिलने का निष्कर्ष निकाला गया था।
परन्तु, 16 मार्च 2017 को चुनाव आयोग द्वारा घोषित किया गया परिणाम इसके ठीक उल्टा निकला, भाजपा 403 सीटों में 325 सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आयी।

लेकिन, 30 जनवरी को ABP के इस ओपिनियन पोल के निष्कर्षों का फायदा एजेंडा पत्रकारों ने जमकर उठाया, जैसा कि 4 दिसंबर को आये गुजरात के फाइनल ओपिनियन पोल को लेकर उठा रहे हैं। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के परिणाम आने तक इन पत्रकारों ने नोटबंदी को आधार बनाकर प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का एजेंडा चलाए रखा।गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए ABP न्यूज का ताजा सर्वे भी प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का एजेंडा चलाने वाले पत्रकारों द्वारा जबरदस्ती तैयार किया गया एक हथियार है। ये पत्रकार प्रधानमंत्री मोदी का विरोध करने के लिए मुद्दों को मनमाने ढंग से गढ़ रहे हैं। अभी हाल ही में संपन्न हुए उत्तर प्रदेश के नगर निगमों के चुनाव नतीजों के दिन (1 दिसंबर) भी इन पत्रकारों ने मोदी विरोध के अवसर को तलाशने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी।
एजेंडा पत्रकारों ने उत्तर प्रदेश नगर निगम चुनाव को राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया- नगर निगम के चुनाव स्थानीय मुद्दों के कारण, क्षेत्रीय महत्त्व रखते हैं लेकिन एजेंडा पत्रकार सुबह से ही परिणामों पर पल-पल नजर बनाये हुए थे। वो उसका राष्ट्रीय परिपेक्ष्य में प्रभाव समझाने के लिए चैनेलों पर डटे रहे। जब नतीजे आने शुरू हुए तो ठीक उसी समय कुछ पत्रकारों ने भाजपा को हराने के नए-नए एंगल तलाशने शुरू कर दिए और प्रचंड जीत के बावजूद भाजपा को हारा हुआ दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। ऐसे ही कुछ पत्रकारों के हैरान करने वाले कमेंटस को आप भी देखिए-
दिबांग- निकाय चुनाव रुझान में भाजपा को नुकसान, बसपा को उभार -वरिष्ठ टीवी पत्रकार और ABP न्यूज के प्राइम टाइम एंकर दिबांग ने शुरुआती रुझान देखकर ही भाजपा को हरा दिया। उन्होंने ट्वीट करते हुए हेडर ही लिखा कि इस चुनाव में भाजपा को नुकसान हुआ है। दिबांग ने यह भी नहीं देखा कि आंकड़े तेजी से बदल रहे हैं। खुद उन्होंने जो आंकड़ा दिया, उसके मुताबिक 16 सीटों में बसपा को सिर्फ 4 सीटें ही मिल रही थी, जबकि भाजपा को 11 सीटें मिलती दिख रही थी।ABP न्यूज के संपादक मिलिंद खांडेकर को भी निकाय चुनाव के दौरान जो सबसे बड़ी खबर नजर आई, वह बसपा की वापसी नजर आ रही थी। इन्होंने 2 ट्वीट किए, एक ट्वीट में यह याद दिलाया कि पिछली बार भी भाजपा के 12 मेयर जीते थे और दूसरे ट्वीट में बसपा की वापसी का ऐलान कर दिया।

ABP न्यूज के एंकर अखिलेश आनंद ने तो साफ कह दिया था कि भाजपा की इस प्रचंड जीत को पार्टी के लिए किसी लहर के रूप में देखना ठीक नहीं रहेगा।
ABP के एक और पत्रकार पंकज झा ने तो बाकायदा हाथी की कीमत ही निकालनी शुरू कर दी और बताने का प्रयास किया कि किस तरह अभी भी बसपा में दमखम है।

आजकल कई पत्रकार आलोचना के धर्म को छोड़कर जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी के विरोध का एजेंडा चलाने के लिए तथ्यों को तोड़ मरोड़ कर भ्रम और भय की तस्वीर खींच रहे हैं, वह देश के विकास के लिए सबसे बड़ी बाधा है। संविधान ने अभिव्यक्ति की आजादी विरोध का एजेंडा चलाने के लिए नहीं दी है।

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