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हिंदुओं को बदनाम करने के लिए एजेंडा चला रहे कुछ मीडिया घराने और तथाकथित सेक्यूलरवादी

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23 जुलाई, 2018 को टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपने आर्टिकल ‘Maharashtra ‘godman’ forces men into unnatural sex, held’ में फकीर आसिफ नूरी के अपराध की कहानी छापी, लेकिन स्टोरी की तस्वीर में हिंदू साधु का वेश डालकर दिखाया गया है।

सबसे खास ये है कि इस स्टोरी का राइटर Mohammed Akhef नाम का व्यक्ति है जिसने जानबूझकर हिंदुओं के विरुद्ध एजेंडे के तहत ये आर्टिकल लिखा है। साफ है हिंदुओं को बदनाम करने के लिए कुछ मीडिया घराना और कुछ पत्रकार लगातार जुटा हुआ है।

सवाल उठता है कि मोहम्मद आकिफ नाम के पत्रकार ने एक हिंदू साधु की तस्वीर क्यों छापी जबकि अपराधी एक मुसलमान- आसिफ नूरी है। आसिफ नूरी को फकीर भी लिखा जा सकता था, लेकिन बाबा लिख दिया। इतना ही नहीं आर्टिकल में दैवीय शक्तियों की बात की गई है जबकि एक मुसलमान दैवीय शक्तियों में यकीन नहीं रखता है, वहां इल्म भी लिखा जा सकता था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। जाहिर है यह एक साजिश के तहत किया गया ताकि हिंदू धर्म को बदनाम किया जा सके।

दरअसल खबर ये है कि महाराष्ट्र के बुल्ढाना का रहने वाले आसिफ नूरी को पुलिस ने अप्राकृतिक रेप के केस में गिरफ्तार किया। उसने एक लड़के का रेप किया था। जाहिर है वह मुसलमान मौलाना है, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने जो तस्वीर लगाई वह हिंदू साधु की थी। खबर लिखने वाला मोहम्मद आकिफ नाम का पत्रकार है, उसने पत्रकारीय मर्यादा का भी खयाल नहीं रखा और यह माना जा सकता है कि हिंदू विरोध उसका एजेंडा हो सकता है, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया जैसे ग्रुप में क्या संपादक भी इसी स्तर पर उतर आए हैं जो हिंदू धर्म को बदनाम करने की साजिश में शामिल हो गए हैं। हालांकि जब लोगों ने अखबार के एजेंडे को पकड़ लिया तो कमेंट बॉक्स में जबरदस्त रिएक्शन दिया, जिसके बाद अखबार ने साधु की तस्वीर हटा ली, लेकिन फिर भी मौलाना की तस्वीर नहीं लगाई गई।

बहरहाल ये कोई पहला मामला नहीं है जो टाइम्स ऑफ इंडिया ने ऐसा कारनामा किया है। अकरम अली नाम के मौलवी ने महिला और उसकी बेटी का रेप किया। लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने मौलवी अकमल अली को स्वामी बताकर अखबार में छापा।

इसी तरह गुरुग्राम में 10 बच्चों के अब्बू मौलाना दीन मोहम्मद ने महिला का रेप किया, लेकिन टाइम्स ऑफ इंडिया ने हिंदू ऋषि, की तस्वीर लगाकर लिखा कि तांत्रिक रेप के आरोप में गिरफ्तार हुआ। जाहिर है टाइम्स ऑफ इंडिया जैसा अखबार समूह हिंदुओं के विरुद्ध एजेंडा चला रहा है। दुखद पहलू ये है कि ऐसे अखबार खुद को निष्पक्ष होने का ढिंढोरा पीटते हैं।

कठुआ कांड पर मीडिया ने जान बूझकर हिंदू विरोधी झूठ का प्रोपेगेंडा चलाया
आपको याद होगा कि बीते दिनों Justice for Asifa  अभियान कैसे War against Hindu बन गया था। इसके पीछे भी इसी तरह के निष्पक्ष मीडिया का हाथ था। मासूम आसिफा को मुसलमान की बेटी बनाने वाले यही मीडिया के लोग थे जो खुद को निष्पक्ष कहते फिरते हैं।  

रेपिस्ट का धर्म ढूंढने में आता है आनंद
रेपिस्ट का धर्म ढूंढकर पूरे हिंदू समुदाय को रेपिस्ट ठहराने की एक साजिश रची गई। सीबीआई जांच से भागने वाला सेक्यूलर जमात अपनी गंदी हरकतों पर उतर आया था। बिना सबूत बिना किसी पुख्ता जांच, बिना किसी कोर्ट के आदेश के यह साबित करने की कोशिश की गई कि हिंदुस्तान बलात्कारियों का देश है और हिंदू वहसी और दरिंदे हैं।

बेशर्मी का नंगा नाच करते हैं वामपंथी पत्रकार
कठुवा में बच्ची के साथ बलात्कार हुआ भी है इस बात पर अब भी संदेह है। दरअसल पीड़ित बच्ची के पिता को भी कुछ साल पहले संपत्ति विवाद में मार दिया गया था। उसका जो पिता बनकर सामने आया था वह भी फर्जी निकला। हालांकि तथाकथित सेक्यूलर मीडिया ने इस खबर को भी दबा दिया, लेकिन हिंदुओं को दोषी ठहराने की पुरजोर कोशिश होती रही। 

एक आरोपी के कारण पूरा हिंदू समुदाय ‘बलात्कारी’ कैसे?
बार-बार यह साबित करने की कोशिश की गई कि आरोपी हिंदू हैं और पीड़ित बच्ची मुसलमान। वामपंथी पत्रकारों की जमात यह साबित करने में लगी रही कि इसमें भाजपा का हाथ है। लेकिन इस दौरान वे बड़ी सफाई से यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि भाजपा को सपोर्ट करने वाले सभी हिंदू हैं और सभी भाजपाई बलात्कारी हैं। दरअसल इस सोच के पीछे वामपंथ की अस्तित्व खोती राजनीति से अधिक उनकी सोच है, जो बेहद ही ओछी है। मान लिया जाए कि इस मामले में कोई सच्चाई है भी और आरोपी दोषी भी हैं, लेकिन क्या इससे पूरा हिंदू समुदाय ही बलात्कारी हो जाता है या फिर भाजपा में जो भी हैं वे बलात्कारी हैं?

सफेद झूठ का खुला षडयंत्र है कठुआ मामला
पूरे हिंदू समुदाय को बदनाम करने के लिए कहा गया कि बलात्कारियों के समर्थन में लोग सड़कों पर तिरंगा लहरा रहे हैं। जाहिर है यह देश को बदनाम करने की बड़ी साजिश है। बलात्कारियों के समर्थन में कोई प्रदर्शन नहीं हुआ था। प्रदर्शन कर रहे लोग मामले की सीबीआई जांच की मांग कर रहे थे, तो क्या हत्यारों को पकड़ने के लिए सीबीआई जांच की मांग करना गलत है? गांव वालों का कहना है कि उन्हें महबूबा मुफ्ती की पुलिस पर भरोसा नहीं है, तो क्या ऐसा कहना असंवैधानिक है?

मंदसौर में हिंदू बच्ची से रेप पर मीडिया और सेक्यूलरों ने खामोशी ओढ़ ली
मोहम्मद इरफान ने 7 साल की बच्ची को उठाया और उसका रेप किया, उसे मारने की कोशिश की, जब उसे लगा कि बच्ची मर गई है तो इसने उसे झाड़ियों में फेंक दिया और भाग गया।

भागने से पहले उसने बच्ची की गुप्तांग दांतों से काटा, उसकी अंतड़ियां निकालीं, बच्ची की गर्दन, कान, गाल को भी दांतों से काटा। इलाज कर रहे डॉक्टर भी बच्ची की हालत देखकर कांप रहे थे। 

हालांकि इस दरिंदे को अब गिरफ्तार तो कर लिया गया, पर देश की मीडिया में पूरी तरह सन्नाटा छाया रहा, बुद्धिजीवियों की जुबानों पर ताले लगे रहे, सेक्यूलरवादियों ने अपने मुंह को हाथों से ढक रखा था, लेकिन क्यों? जाहिर है ये कोई कठुवा की असिफा का मामला नहीं है, बल्कि हिंदू बच्ची से रेप का मामला है, इसलिए मीडिया बुद्धिजीवी, बॉलीवुड के सेक्यूलर लोग खामोश हैं। जाहिर है इस खबर को देश का तथाकथित सेक्यूलर ब्रिगेड दबाने में लग गया।

जाहिर है इस मामले ने तथाकथित बुद्धिजीवियों और सेक्यूलरवादियों की चुप्पी ने एक बार साफ कर दिया कि अगर पीड़ित कोई हिंदू होगा तो ये अपनी जुबान नहीं खोलेंगे, ये तो सिर्फ और सिर्फ आसिफा, अखलाक और जुनैद के लिए ही जुबान खोलेंगे। 

अर्थला मस्जिद में हिंदू बच्ची से रेप पर भी नहीं खुली थी जुबान

तीन महीने पहले की ही बात है, दिल्ली की एक 11 वर्ष की बच्ची अपने घर से कुछ खरीदने बाहर निकलती है और वापस नहीं लौटती है.. जब घर वाले पुलिस की मदद लेते हैं तो पुलिस घटना की कड़ियां जोड़ते हुए उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद पहुंचती है। यहां अर्थला इलाके के एक मदरसे से बच्ची को बेहद बुरी हालत में बरामद किया गया।  जांच में पता लगा कि बच्ची नशे की दवाई दी गई और इस हिन्दू बच्ची से मौलवी शाहबाज खान और 17 साल के एक युवक ने 5 दिनों तक रेप किया।

घटना के विरोध में लोग सड़कों पर उतरे और थाने का घेराव किया। लोग आरोपियों को सख्त सजा देने के लिए लगातार अपनी मांग बुलंद करते रहे,  लेकिन इस पूरे मामले पर तथाकथित सेक्यूलर मीडिया खामोश रही। राहुल गांधी भी इसलिए ही शायद चुप रह गए कि पीड़ित हिंदू थी और आरोपी मुस्लिम समुदाय से? लोग यह भी सवाल करते रहे कि क्या पीड़ित मुस्लिम होती और आरोपी हिंदू समुदाय से, तो राहुल इसी तरह चुप रहते?

हिंदू बच्ची से रेप के विरुद्ध राहुल गांधी ने क्यों नहीं निकाला कैंडल मार्च?
जम्मू के कठुवा में रेप की पुष्टि भी नहीं हुई थी, लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने विरोध प्रदर्शन किए, बहन प्रियंका के साथ मिलकर कैंडल मार्च तक निकाला। मंदिर को बदनाम करने का काम किया और हिंदुओं को निशाना बनाया, लेकिन यहां एक मौलवी द्वारा एक हिंदू बच्ची के बलात्कार पर चुप रहे। मस्जिद से सटे हुए मदरसे में रेप किया गया, लेकिन किसी की जबान तक नहीं खुली। सवाल उठ रहा है कि देश के एक बड़े पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष आखिर एक जैसे मामले में दोहरा रवैया कैसे अपना सकते हैं? सवाल यह भी कि राहुल गांधी धर्म देखकर ही अपनी जुबान खोलते और बंद रखते हैं?

मौलवी द्वारा हिंदू बच्ची के रेप पर सेक्यूलरों की खामोशी क्या कहती है?
राजस्थान में एक दलित हिंदू बच्ची से रेप, अर्थला में मदरसा-मस्जिद में रेप, सासाराम में मेराज आलम द्वारा रेप, मुंबई में एक मुस्लिम द्वारा रेप… ये सभी घटनाएं एक चरित्र की हैं, लेकिन मीडिया ने इसे नहीं दिखाया। दरअसल फर्क सिर्फ यह है कि इन तीनों जगहों पर पीड़ित हिंदू समुदाय से है और बलात्कार का आरोपी मुस्लिम समुदाय का। लेकिन मीडिया के इस तथाकथित सेक्यूलर धड़े को मुस्लिमों में कोई बुराई नहीं दिख रहा है। हालांकि किसी एक भी हिंदू का नाम आ जाए तो मीडिया की नजर में पूरा समुदाय बलात्कारी हो जाता है और हिंदू धर्म ही कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है। दरअसल ये वही कुनबा है जो असम, बंगाल, कश्मीर में हिंदू महिलाओं पर हो रहे अत्याचार-बलात्कार पर भी खामोश रहता है।

बॉलीवुड के कलाकारों ने अपने गले में क्यों नहीं टांगी विरोध की तख्ती?
15-16 अप्रैल,2018 को पूरे देश ने देखा कि किस तरह बॉलीवुड से जुड़े कुछ अभिनेता और अभिनेत्रियों ने कठुआ कांड को पूरे हिंदू समुदाय से जोड़ दिया था। करीना कपूर खान, श्रुति सेठ आलम, जावेद अख्तर और फरहान अख्तर जैसे लोगों को भारतीय होने में भी शर्म आ रही थी। बॉलीवुड का यह धड़ा भारत को ‘बलात्कारी देश’ तक कह रहा था। इन्हें हिंदू धर्म में सिर्फ बुराइयां नजर आ रही थीं। देव स्थान को ‘बलात्कार का स्थान’ घोषित करने की आतुरता थी। परन्तु मंदसौर, अर्थला, सासाराम और राजस्थान की घटनाओं पर सब खामोश हैं। कहीं कोई विरोध की तख्ती नहीं, कोई शर्मिंदगी नहीं, कोई न्याय की मांग नहीं। सवाल उठ रहे हैं कि क्या ये सिर्फ और सिर्फ इसलिए कि पीड़ित हिंदू समुदाय से है।

अपने ही देश में हिंदुओं को नीचा दिखाने की साजिश कर रहे सेक्यूलरवादी!
बलात्कार जैसे घृणित अपराध को धर्म की नजरों से देखना कतई सही नहीं है, लेकिन सवाल उठ रहा है कि क्या कठुआ कांड में पूरे हिंदू समुदाय को बदनाम करने की साजिश रची गई थी? अगर नहीं तो मस्जिद में रेप पर ये खामोशी क्यों? सासाराम में मेराज आलम द्वारा रेप किए जाने पर चुप्पी क्यों? मंदसौर में काफिर समझकर बच्ची से रेप पर मौन क्यों? 

दरअसल देश में ऐसी शक्तियां लगातार सक्रिय हैं जो लगातार दुष्प्रचार कर रही हैं। तथाकथित सेक्यूलर पत्रकार या फिर देश के भीतर के विभाजनकारी तत्व हों, सभी देश को बदनाम करने के एजेंडे पर चल रहे हैं। इस एजेंडे के चेहरे भी कमोबेश वही हैं जिन्हें कठुआ कांड में पूरा हिंदू समुदाय दोषी नजर आता है, लेकिन हिंदुओं को प्रताड़ित किए जाने के बाद भी ये खामोश रहते हैं। ये वही धड़ा है जो कठुआ कांड के आरोपियों की सीबीआई जांच और नार्को टेस्ट की मांग को खुद ही खारिज कर देता है और हिंदू समुदाय को बलात्कारी और हिंदू धर्म को नीचा दिखाने का कुत्सित प्रयास करता है।

जाहिर है ऐसे प्रकरण बताते हैं कि तथाकथित सेक्यूलरवादियों का दोहरा चरित्र है और यह पीड़ित के मुसलमान होने पर ही अपनी जुबान खोलते हैं। 

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