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आकार पटेल स्पष्ट करें, क्या वो मुसलमानों की भावनाओं को नहीं भड़का रहे ?

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लेखक और स्तंभकार आकार पटेल ने 3 सितंबर को Times of India के लिए एक ब्लॉग लिखा। अचानक उनके इस तरह के ब्लॉग को लेकर कई सवाल उभरने लाजमी हैं क्योंकि इससे देश के मुसलमानों की स्थिति का एक नकारात्मक चित्रण उभरकर सामने आया है…जो जमीनी हकीकत से कहीं दूर है। ब्लॉग में आकार पटेल ने जिन मुद्दों को उठाया है Perform India उन पर कुछ सवालों को रखते हुए आकार से जवाब की अपेक्षा रखता है।   

ब्लॉग का शीर्षक – आकार पटेल ने ब्लॉग का शीर्षक ही मुसलमानों से ये प्रश्न करते हुए रखा कि क्या उन्होंने अपमान और पूर्वाग्रहों के साथ जीना सीख लिया है?

आकार से सवाल – क्या आकार ये बताएंगे कि किस तरह के अपमान की बात वो कर रहे हैं? क्या तीन तलाक जैसी कुप्रथा की शिकार होती रहीं मुस्लिम महिलाओं को सम्मान दिलाना अपमान की बात है? नरेंद्र मोदी सरकार ने तीन तलाक को खत्म करने के लिए ऐतिहासिक पहल कर मुस्लिम समाज में सदियों से चले आ रहे पूर्वाग्रह को दूर करने का काम किया,फिर इसमें पूर्वाग्रह के साथ जीने की बात कहां से आ गई?   

ब्लॉग के अंश –  मुसलमानों को संबोधित करते हुए आकार पटेल ने लिखा है कि मैं जानता हूं कि आपका हाल अच्छा नहीं है। आज आपको भारतीय मुसलमान कहकर पुकारा जाता है लेकिन अन्य किसी जाति या धर्म के लोगों के साथ तो ऐसा कतई नहीं होता है। मैंने तो किसी मुसलमान को खुद को भारतीय मुसलमान कहते नहीं सुना है।   

आकार से सवाल – क्या इस सवाल को उठाकर आपने खुद मुसलमानों को अलग श्रेणी में रखने की कोशिश नहीं की है? क्या देशवासियों के लिए सरकार की योजनाओं के भागीदार मुस्लिम नहीं बनते? अगर देश के मुसलमानों के लिए कभी भारतीय मुसलमान का संबोधन कहीं होता भी है तो क्या वो उसी तरह से नहीं जैसे कि देश के कई हिस्सों में बिहार से आने वालों को बिहारी, पश्चिम बंगाल से आने वालों को बंगाली और गुजरात से आने वालों को गुजराती कहकर भी संबोधित किया जाता है, जबकि हैं तो सभी भारतीय ही।  

ब्लॉग के अंश –ब्लॉग में आकार ने मुसलमानों से ये भी जानने की कोशिश की है कि क्या वो तब सुरक्षित महसूस करते हैं जब सुप्रीम कोर्ट लव जिहाद जैसे मुद्दों पर बहस की अनुमति देने पर विचार कर रहा होता है या फिर हाईकोर्ट वंदे मातरम के समर्थन में फैसला दे रहा होता है। क्या आपको नहीं लगता है कि अब हदें पार की जा रही हैं? आपको भले ही कुछ नहीं कहते हों लेकिन मेरे लिए तो यह सब असहनीय हो गया है।

आकार से सवाल – कानूनी प्रक्रिया के अपने कुछ मानदंड होते हैं। न्यायपालिका स्वतंत्र रूप से सिक्के के दोनों पहलुओं को देखकर अपनी राय देती है या फैसला सुनाती है। क्या आपको अपने कानून में विश्वास नहीं? क्या एक खास समुदाय को आप वंदे मातरम नहीं गाने के लिए प्रेरित कर रहे हैं?

और आखिर में जो बड़ा सवाल बनता है वो ये है कि आकार पटेल ने जिन मुद्दों को उठाया है वो कहां से प्रेरित हो सकते हैं? क्या इन्हें उठाने से पहले उन्होंने जमीनी स्तर पर वास्तविकताओं को आंका था? 

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