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2019 के लोकसभा चुनावों के लिए राहुल गांधी का सफर शुरू होने से पहले ही खत्म, देखिए कैसे

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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ महागठबंधन बनाने में लगी पार्टियां आजकल ‘कहीं की ईंट कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा’ वाली कहावत को चरितार्थ कर रही हैं। इनके पास ना कोई न्यूनतम साझा कार्यक्रम है और ना ही नेतृत्व को लेकर कोई सहमति। बस इनके नेता प्रधानमंत्री मोदी के विरोध के नाम पर साथ आने की कोशिश में लगे दिखना चाहते हैं। लेकिन आए दिन ये खुद ही कुछ ऐसा कर जा रहे हैं या कह जा रहे हैं कि सारा भेद खुलकर रह जाता है। अब देखिए कि उत्तर प्रदेश में ही इन सबके बीच आपस में क्या चल रहा है।

अखिलेश यादव नहीं मानते कांग्रेस को राष्ट्रीय पार्टी
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने तो कांग्रेस के राष्ट्रीय पार्टी होने पर ही सवाल उठा दिया है। महागठबंधन की स्थिति में राष्ट्रीय पार्टी के रूप में कांग्रेस को मिलने वाली सीटों की संख्या को लेकर हुए सवाल पर अखिलेश ने खुद ये सवाल कर दिया कि क्या उत्तर प्रदेश में कांग्रेस राष्ट्रीय पार्टी है? अपने इस सवाल के साथ ही अखिलेश ने कांग्रेस को यह स्पष्ट संदेश दे दिया कि वह उम्मीदवारी के लिए राज्य में दो अंकों में सीटों की उम्मीद ना करे। गौर करने वाली बात है कि पिछले लोकसभा चुनावों में कांग्रेस सिर्फ सोनिया और राहुल की सीट पर ही जीत दर्ज कर पाई थी और पिछले साल के विधानसभा चुनावों में वो दहाई के आंकड़े तक भी नहीं पहुंच पाई थी। ये तमाम चुनाव राहुल गांधी के चेहरे के साथ लड़े गए थे इसलिए समाजवादी पार्टी कांग्रेस को उसकी औकात बताने में जुटी है।      

कांग्रेस को 8 से अधिक सीटें नहीं
कांग्रेस को यह भी साबित करना होगा कि वो जिस सीट पर दावेदारी कर रही है वहां किस प्रकार से उसका उम्मीदवार सपा या बसपा के उम्मीदवार पर भारी पड़ सकता है। इतना ही नहीं कांग्रेस का जो भी उम्मीदवार होगा उसे सपा या बसपा के संभावित उम्मीदवारों को अपने पक्ष में प्रचार के लिए भी तैयार करना होगा। यानि कांग्रेस को हर मोड़ पर परीक्षाओं के दौर से गुजरते रहना होगा। एक प्रकार से मानें तो कांग्रेस को सपा और बसपा के इशारों पर नाचते रहना होगा और पार्टी अगर नहीं नाची तो उसे बाहर का रास्ता दिखाने से भी परहेज नहीं होगा। इस तरह से सोनिया और राहुल के अलावा कांग्रेस के चार से पांच बड़े नामों वाले नेता ही चुनाव लड़ पाएंगे। कांग्रेस की जो स्थिति है उसमें कार्यकर्ता स्तर से संघर्ष कर उठे एक भी नेता को टिकट मिल पाएगा, इसका सवाल ही नहीं उठता।

दशकों से लड़ने वाले अचानक साथ कैसे 
यह सर्वविदित है कि सपा-बसपा-आरएलडी और कांग्रेस कोई जनता का भला करने के मकसद से मिलकर लड़ने का विचार नहीं कर रहीं। इन सबके अंदर छिपी बस एक इच्छा इन्हें हाथ मिलाने को मजबूर कर रही हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को सत्ता से दूर रखा जा सके। ये वही पार्टियां हैं जो अभी तक एक-दूसरे को फूटी आंखों नहीं सुहाती थीं। याद कीजिए जब यूपी के पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने सपा-बसपा पर ‘27 साल यूपी बेहाल’ नारे के साथ निशाना साधा था। फिर जब सपा और कांग्रेस ने अचानक चुनावी तालमेल किया था, तब भी दोनों ही पार्टियों ने मायावती को लेकर अलग-अलग राय जाहिर की थी। अखिलेश ने मायावती का मजाक उड़ाया था जबकि राहुल गांधी अखिलेश से सहमत नहीं थे। गौर करने वाली बात है कि मायावती ने उन दिनों कांग्रेस पर भी हमला करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी। जनता यह भी देख रही है कि आज सपा से नजदीकी दिखा रही ये वही मायावती हैं जिन्होंने गेस्ट हाऊस कांड में सपा पर अपनी मौत की साजिश रचने का आरोप लगाया था।    

भरभराकर गिरेगा खोखली नींव पर बन रहा गठबंधन 
दरअसल महागठबंधन का निर्माण एक खोखली नींव पर हो रहा है। इस कवायद में शामिल नेता जनता को दिखाना चाहते हैं कि वे एकजुट हैं। लेकिन सच ये है कि इनमें हर मुद्दे पर टकराव है। इनके बीच का विरोधाभास इससे पता चलता है कि एक तरफ तो ये प्रधानमंत्री का उम्मीदवार पहले तय नहीं करना चाहते, वहीं दूसरी तरफ राहुल गांधी खुद को प्रधानमंत्री उम्मीदवार बताने से नहीं हिचकते। इतना ही नहीं बसपा भी मायावती को अपने प्रधानमंत्री उम्मीदवार के रूप में पेश कर देती है। अलग-अलग पार्टियों के बीच टकराव दिखने का जनता में सही मैसेज नहीं जाएगा, ये सोचकर विपक्षी पार्टियां फूंक-फूंक कर कदम रखना चाहती हैं।  लेकिन इनके नेताओं की अपनी-अपनी सत्तापरक महत्वाकांक्षा है जो उभरकर सामने आ ही जाती है और इसके साथ ही उतर जाता है सच्चाई पर लगा पर्दा।    

कांग्रेस का हाल सियासत के भिखारी जैसा
सपा प्रमुख अखिलेश यादव को यह कहने में कोई संकोच नहीं कि कांग्रेस को वही सीटें मिलेंगी जो सपा-बसपा और आरएलडी के समझौते के बाद बचेंगी। यानि ये कह सकते हैं कि तीनों ही पार्टियां मिलकर कांग्रेस को अपना जूठन देने की बात कर रही हैं। लेकिन कांग्रेस की हालत देखिए कि अपने इस अपमान पर भी चुप रहना उसकी मजबूरी है। समाजवादी पार्टी दरअसल कांग्रेस से तीन साल पहले बिहार चुनावों को लेकर हुए सीटों के तालमेल में अपनी उपेक्षा का बदला लेना चाहती है, जिसमें सपा की उम्मीदवारी के लिए 243 में सिर्फ दो सीटें छोड़ी गई थीं। हैरानी नहीं होगी कल को अगर यूपी में कांग्रेस के लिए 80 में से सिर्फ सोनिया-राहुल की दो ही सीटें छोड़ी जाएं। जाहिर है सबसे ज्यादा 80 सीटों वाले राज्य में ही कांग्रेस दलदल में धंस चुकी है। राहुल गांधी का चुनावी सफर शुरू होने से पहले ही खत्म हुआ नजर आ रहा है।

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