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बंगाल में राष्ट्रपति शासन जैसे बने हालात

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जिस धरती से विश्वगुरु रवीन्द्रनाथ टैगोर ने दुनिया को शांति और विश्व बंधुत्व का संदेश दिया, जो धरती सांस्कृतिक चेतना का स्रोत रही हो वही धरती आज हिंसा, नफरत और साम्प्रदायिकता के लिए कुख्यात हो चुकी है। ममता बनर्जी की सरकार में पश्चिम बंगाल ने अपना गौरवशाली अतीत तो खो ही दिया है, समूचा प्रदेश अराजकता और बर्बर हिंसा की चपेट में है। बहुसंख्यक समुदाय के लोग दहशत में हैं। राजनीतिक विरोधियों को चुन-चुन कर मारा जा रहा है। ममता बनर्जी अपने ही देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के विरोध पर इस कदर उतर आई हैं कि वो अपनी जिम्मेदारी तक भूल गयी लगती हैं। विरोध का स्तर ये है कि बंगाल में लोकतंत्र का ताना-बाना टूटता जा रहा है। उदाहरणों से देखिए बंगाल में क्या कुछ हो रहा है।

1. सामान्य प्रशासनिक फैसला भी कोर्ट से, केंद्रीय मंत्री और आरएसएस प्रमुख को कार्यक्रम की इजाजत नहीं – केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो और आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का कार्यक्रम भी नहीं होने देने पर ममता अड़ गयीं। क्यों? मर्जी उनकी। वो मुख्यमंत्री हैं। चाहे तो किसी का कार्यक्रम होने दें ना चाहें तो ना होने दें। मतलब ये कि प. बंगाल में पूरी तरह से ममता बनर्जी की मनमानी चल रही है। हाल ये है कि आरएसएस को कार्यक्रम के लिए कोर्ट ने इजाजत दी और पुलिस कमिश्नर पर कोर्ट की अवमानना का मामला बनाया गया। इसी तरह केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो को अपने संसदीय क्षेत्र आसनसोल में सांसद मेला आयोजित करने से रोका जा रहा है।

2. पश्चिम बंगाल में पाकिस्तान के खिलाफ बोलना मना है – पश्चिम बंगाल देश का इकलौता राज्य बन गया है, जहां पाकिस्तान के खिलाफ बोलना सख्त मना है। सेना के पूर्व अधिकारी को भी ऐसा करने की इजाजत नहीं है। गौरतलब है कि 7 जनवरी को कोलकाता क्लब ने “द सागा ऑफ बलूचिस्तान” नाम के कार्यक्रम का आयोजन किया गया था। इस कार्यक्रम में सेना के पूर्व अधिकारी जी डी बख्शी समेत पाकिस्तान के पूर्व लेखक तारिक फतेह, पूर्व केंद्रीय मंत्री आरिफ मोहम्मद खान और कश्मीरी पंडित सुशील पंडित को भी बुलाया गया था। लेकिन पाकिस्तान मूल के लेखक तारेक फतेह ने बताया कि ममता सरकार के दबाव में इसे रद्द कर दिया गया है। रद्द करने की वजह ये बताई गई कि वो बंगाल में सौहार्द्रपूर्ण माहौल चाहते हैं। सवाल ये है कि क्या पाकिस्तान के खिलाफ बोलने से बंगाल में माहौल खराब हो जाता है। यह वही ममता है जिसने देश भर में पाकिस्कतान के खिलाफ माहौल बनने के बावजूद पाकिस्तानी गायक गुलाम अली का कार्यक्रम कोलकाता में करवाया था।

3. धुलागढ़ दंगों के दौरान सरकार पूरी तरह निष्क्रिय – धुलागढ़ में जिस तरीके से हिन्दुओं पर एक तरफा हमले हुए, हत्याएं हुईं और घर जलाए गये- ये बताने के लिए काफी है कि पुलिस ने दंगाइयों को एक समुदाय पर हमला करने की छूट दे रखी थी। कई दिनों तक यह एकतरफा हिंसा जारी रही, लेकिन ममता राज का खौफ देखिए कि मीडिया इसकी रिपोर्टिंग के लिए भी तैयार नहीं हुआ। जब दिल्ली से जी न्यूज़ ने अपनी कोलकाता रिपोर्टर को इसकी रिपोर्ट करने को भेजने की कोशिश की तो संपादक सुधीर चौधरी समेत पूरी टीम के खिलाफ ही एफआईआर दर्ज करा दी गयी।

4. दीदी राज नहीं, दंगाराज- ममता बनर्जी 2011 में पहली बार मुख्यमंत्री बनीं और एक तरफा दंगे तेज हो गये। सांप्रदायिक दंगों की संख्या 2012 तक 12 से बढ़कर 40 पहुंची थी, लेकिन 2013 में ये आंकड़ा सेंचुरी लगा गया। 2013 में सिर्फ फरवरी और अगस्त के बीच 42 बड़े दंगे हुए। उसके बाद 2014, 2015 और 2016 में भी ये आंकड़ा सवा सौ से ज्यादा रहा।

5. स्टेट के अंदर इस्लामिक स्टेट? – प. बंगाल के अंदर इस्लामिक सिटी या डोमेन बनाने की कवायद दिख रही है। वोट की खातिर मुस्लिम आबादी को संगठित तौर पर बसाया जा रहा है। सिर्फ मुसलमानों के लिए 400 से ज्यादा एनजीओ बनाकर उनकी मदद की जा रही है। मुस्लिम मेडिकल, टेक्निकल और नर्सिंग इंस्टीट्यूट खोले जा रहे हैं। 10 हजार से ज्यादा मदरसों को मान्यता दे दी गयी है। उनकी डिग्री को सरकारी नौकरी के काबिल बना दिया गया है। मस्जिदों के इमामों के लिए वजीफे, मुस्लिम नौजवानों को मुफ्त लैपटॉप और साइकिलें दी गयी हैं। वहीं हिन्दुओं के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है मानो वे दूसरे दर्जे के नागरिक हों।

6. प्रधानमंत्री के खिलाफ फतवा- भारत इकलौता देश है जहां के प्रधानमंत्री के खिलाफ वहीं का नागरिक फतवा जारी करने की हिम्मत रखता है। 7 जनवरी को कोलकाता की टीपू सुल्तान मस्जिद के शाही इमाम सैयद मोहम्मद नुरूर रहमानी बरकती ने सत्तारूढ़ टीएमसी के सांसद मो. इदरीस की मौजूदगी में फतवा सुनाया। प्रधानमंत्री का सिर मुंडकर उनका मुंह काला करने वाले को 25 लाख रुपये का इनाम देने का फतवा। इस फतवा के दौरान टीएमसी सांसद इदरिस भी मौजूद रहे। साफ तौर पर इस फतवे को ममता सरकार का समर्थन हासिल था।

7. सेना की मौजूदगी पर घिनौनी राजनीति – पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को अपनी ही सेना से डर लगता है। ममता ने सेना के नियमित अभ्यास पर संदेह कर न सिर्फ सेना का अपमान किया, बल्कि पूरे राष्ट्र का अपमान किया। जबकि बाद में सच्चाई यह निकली कि 28 और 30 नवंबर को होने वाला सेना का नियमित अभ्यास प्रशासन के आग्रह पर ही 2 दिसम्बर को हुआ था।

8. केन्द्रीय मंत्री पर पत्थर से हमला- ममता सरकार में केन्द्रीय मंत्री तक सुरक्षित नहीं है। राजनीतिक विरोध करने का खामियाजा उन्हें अपनी जान को जोखिम में डालकर भुगतना पड़ता है। केन्द्रीय मंत्री बाबुल सुप्रियो को पत्थर फेंककर मारा गया, जब वे अपने कार्यकर्ताओं की गिरफ्तारी का विरोध करने गए थे।

9. दुर्गा पूजा विसर्जन पर ‘तुगलकी फरमान’ और हाईकोर्ट से फटकार- दुर्गा पूजा विसर्जन के दौरान ममता बनर्जी की सरकार को कोर्ट से फटकार तक मिली। अल्पसंख्यकों की तुष्टिकरण में ममता बनर्जी इस कदर मदहोश हो चुकी हैं कि उन्होंने अगले दिन होने वाले मुहर्रम के लिए दुर्गा पूजा कि विजयादशमी पर एक समय के बाद पाबंदी लगा दी। इस पर फटकार लगाते हुए और आदेश रद्द करते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने कहा था कि “राज्य सरकार बुहसंख्यकों की कीमत पर अल्पसंख्यकों को खुश करने की साफ-साफ कोशिश कर रही है।“

10. बीजेपी कार्यकर्ता की मासूम बेटी को मारी गोली- ममता बनर्जी के राजनीतिक दुश्मनों के साथ प. बंगाल में कैसा सलूक होता है अगर आपको जानना हो तो माल्दा की उस घटना पर नजर डालिए। आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। आरोप है कि टीएमसी कार्यकर्ता बीजेपी कार्यकर्ता सुनील की हत्या करने उसके घऱ पहुंचे। वहां सुनील नहीं मिले तो उनके मासूम बच्चे की गोली मारकर हत्या कर दी।

उपरोक्त घटनाओं से साफ है कि ममता बनर्जी भारत के भीतर ही एक नया इस्लामिक स्टेट बनाने में जुटी हैं। राज्य की कानून व्यस्था ध्वस्त हो चुकी है। सत्ताधारी पार्टी राजनीतिक विरोधियों को पूरी तरह से खत्म करने के अभियान में जुटी हुई है। जबकि इस पर बोलने वाला कोई नहीं है। ऐसे में पश्चिम बंगाल में राष्ट्रपति शासन लागू करने के सिवा कोई विकल्प नहीं है। एक वक्त था जब राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के फैसले का दुरुपयोग हुआ करता था, लेकिन अब वो वक्त आने वाला है जब केंद्र सरकार राष्ट्रपति शासन न लगाने पर आरोप के कठघरे में होगी।  

– हरीश चंद्र बर्णवाल

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